
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले नगरी, फोंडा, गोवा : युद्ध में विजय प्राप्त होने हेतु, साथ ही सैनिकोंसहित धर्मकार्य करनेवालों की रक्षा हेतु ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में २० एवं २१ मई को शतचंडी याग संपन्न हुआ । सनातन के संतों एवं साधकों ने इस यज्ञ की संकल्पपूर्ति हेतु श्री दुर्गादेवी के चरणों में मनोभाव से प्रार्थना की । उसके पश्चात यज्ञ में पूर्णाहुति अर्पित की गई । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणियां श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळजी एवं सद्गुरु नीलेश सिंगबाळजी, साथ ही श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी एवं सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी ने यज्ञ के यजमानपद का निर्वहन किया ।

२१ मई को आद्यहोम, सप्तशति पाठ, कन्यापूजन, सुहागन पूजन, ब्रह्मचारी पूजन, दंपति पूजन, गोमूजन इन धार्मिक अनुष्ठानों के उपरांत पूर्णाहूति आदि धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए । इसके उपरांत उपस्थित लोगों में प्रसाद का वितरण किया गया । सवेरे एवं दोपहर इन २ सत्रों में ये धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए । १०० पाठों का जाप तथा १० पाठों का हवन किया गया । एक पाठ का तर्पण तथा एक पाठ का मार्जन किया गया । तमिलनाडु के श्री. गुरुमूर्ति शिवाचार्य एवं श्री. अरुण कुमार गुरुमूर्ति सहित ३५ पुरोहितों ने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए । यज्ञ के समय उपस्थित साधकों ने देवी से भावपूर्ण प्रार्थना कर नामजप किया । उपस्थित साधकों ने मंत्र के पाठ के कारण आस-पास के पूरे परिसर में चैतन्यमय वातावरण का अनुभव किया ।
आपातकाल में देवताओं, ऋषि-मुनियों, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी तथा संतों की आज्ञा से यज्ञ !कालमहिमा के अनुसार वर्ष २०२५ आपातकाल है । इस काल में भले ही हमने कोई भी नियोजन किया हो, तब भी भविष्य में ईश्वर को जो अपेक्षित है अर्थात ही ईश्वर के नियोजन से ही घटनाएं होंगी । इस आपातकाल में जलप्रलयादि प्राकृतिक आपदा की घटनाएं हो सकती हैं । इस आपातकाल में सैनिकोंसहित देश-विदेशों में साधना करनेवाले साधकों तथा धर्मप्रेमियों के सर्व ओर सुरक्षा-कवच बनना आवश्यक है । इसके लिए देवताओं, ऋषि-मुनियों, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी तथा संतों की आज्ञा से यह शतचंडी याग संपन्न किया गया । इस याग से सैनिकों, साधकों तथा धर्मप्रेमियों के शरीर के साथ मन, बुद्धि एवं सूक्ष्म देह के सर्व ओर सुरक्षा-कवच निर्माण हो, साथ ही देवी की कृपा एवं आशीर्वाद सभी पर बना रहे; इसके लिए आदिशक्ति के चरणों में प्रार्थना की गई । |
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