स्वयंभू शिवलिंग निर्मित होने का अध्यात्मशास्त्रीय आधार

१. ‘सृष्टिरचना में निर्मित सूक्ष्म बाधाएं दूर होकर यह रचना सहजता से कार्यरत रहे ।

२.  जहां शिवशक्ति की आवश्यकता है ।

३.  जहां भक्त की साधना के लिए प्रतिकूल काल है, जिससे ईश्वरीय अस्तित्व से वह अनुकूल हो ।

जहां स्वयंभू शिवलिंग की आवश्यकता है; परंतु वहां वह प्रकट न हो रही हो, तब उसे कालमहिमा समझें । उसी प्रकार ऐसा घटित होना संकटकाल का सूचक समझा जाता है ।

जहां पूर्ण अंधकार होता है, वहीं प्रकाश का महत्त्व समझ में आता है । महत्त्व ज्ञात होने के उपरांत ही प्रकाश का कार्य प्रारंभ होता है, ऐसा ही ईश्वरीय कार्य के विषय में कह
सकते हैं ।’

(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ – ‘भगवान शिव की उपासना का अध्यात्मशास्त्र’)