
वर्तमान में सर्वत्र ‘सनातन’का उद्घोष चल रहा है । महाकुंभक्षेत्र में कदम-कदम पर ‘सनातन’ सुनने को मिल रहा है । वर्तमान में हिन्दुत्वनिष्ठ संस्थाओं, संगठनों, धार्मिक-आध्यात्मिक संस्थाओं आदि सभी के मुख से ‘सनातन धर्म’, ‘सनातन राष्ट्र’, ‘सनातन संस्कृति’ जैसे शब्द सुनने को मिल रहे हैं । ‘सनातन’ शब्द से हिन्दुओं को मानो एक नई प्रेरणा मिल रही है । ‘सनातन संस्था’ के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने ३४ वर्ष पूर्व ही अर्थात वर्ष १९९० में ‘सनातन भारतीय संस्कृति संस्था’ इस नाम से संस्था की स्थापन कर जनमानस पर ‘सनातन’ शब्द का अनन्यसाधारण महत्त्व अंकित किया । विशेष बात यह है कि उस समय अर्थात ३४ वर्ष पूर्व ‘सनातन’ का अर्थ ‘पुराना’, यह अर्थ प्रचालित था । उस काल में इस शब्द का उच्चारण करना भी हीनतापूर्ण माना जाता था । कोई इस शब्द का बहुतकुछ प्रयोग नहीं करते थे । उसमें भी सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने समाज को ‘सनातन’का वास्तविक अर्थ समझाया । उसके परिणामस्वरूप वर्तमान में ‘सनातन’ शब्द हिन्दुओं के जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है । ‘हिन्दुओं के मन में एवं हृदय में ‘सनातन’ का ध्वज गाडनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी इस पृथ्वी पर लोककल्याणकारी हिन्दू राष्ट्र का भी ध्वज गाड देंगे’, यह सनातन के साधकों की दृढ श्रद्धा है !
जिस प्रकार गंगा, यमुना एवं सरस्वती इस त्रिवेणी संगम का महत्त्व कालातीत है, उसके अनुसार ‘सनातन, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एवं हिन्दू राष्ट्र’, इस दैवी त्रिवेणी संगम का महत्त्व युगों-युगों तक बना रहेगा ! उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी सद्गुरुद्वयी की प्रयागराज की दैवी यात्रा उसीकी प्रतीति है । ऐसे महान तीनों अवतारी गुरुओं के चरणों में चाहे कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, अल्प ही है !
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