अक्टूबर १९१७ में रूस में क्रांति हुई । पूरे विश्व में साम्यवादी क्रांति के विचारों की हवा बहने लगी । पीटर फ्राइर ब्रिटिश मार्क्सवादी लेखक था । उसने अपने लेख से तथाकथित क्रांति का बहुत अच्छा विश्लेषण किया । वह कहता है, ‘क्रांति के समय शोषितों के मन में शोषण करनेवालों के विरुद्ध क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक है; परंतु जब शोषित शोषकों के विरुद्ध विद्रोह करते हैं, उस समय उस क्रांति का नेतृत्व करनेवाले नेताओं में २ प्रकार के नेता होते हैं ।
पहलेवाले नेताओं को ‘ये शोषक नहीं होने चाहिए’, ऐसा लगता तो है; परंतु शोषण करनेवाले लोगों के जो जीवनमूल्य तथा जीवननिष्ठा होती हैं, वे इन नेताओं में भी होते हैं । ये शोषक नहीं चाहिए, इसलिए उन्हें हटाया जाना चाहिए तथा उनके स्थान पर हमें होना चाहिए, यह भावना उनमें होती है; परंतु उनकी जीवननिष्ठा एवं जीवनमूल्य तो शोषकों जैसे ही होते हैं ।’ तब फ्राइर ने ऐसा कहा, ‘क्रांति होती है, वह सफल भी होती है तथा उससे शोषकवर्ग का निर्मूलन भी होता है । शोषितों के नेता सत्ता में भी आ सकते हैं; परंतु उनके जीवनमूल्य वही रह जाते हैं, जो शोषकवर्ग के होते हैं । तब ये नए नेता सत्ता में आने के उपरांत ‘दोगुनी प्रतिशोध की भावना से’ उसी प्रकार का व्यवहार जारी रखते हैं । जनता पुनः शोषण की बलि चढ जाती है । केवल शोषण करनेवालों के चेहरे बदल जाते हैं; परंतु शोषण की प्रक्रिया जारी रहती है ।’ इतिहास में फ्राइर के इस वक्तव्य को प्रमाणित करनेवाले अनेक उदाहरण हैं । उनमें से, ब्रिटिश गुयाना में अफ्रीकी-अमेरिकन (नीग्रो) लोगों का उदाहरण मार्गदर्शक सिद्ध होगा ।

१. गुयाना में नीग्रो लोगों ने एक क्रांति के द्वारा देश को स्वतंत्रता दिलाई; परंतु आगे जाकर उनके द्वारा शोषक बनकर भारतीयों का उत्पीडन करना

एक समय में ब्रिटिश गुयाना में नीग्रो की जनसंख्या ३३ प्रतिशत, जबकि भारतीयों की ५२ प्रतिशत थी । अंग्रेजों के कार्यकाल में श्वेत लोग नीग्रो समुदाय पर अत्याचार करते थे । उसके कारण नीग्रो के मन में श्वेत लोगों के प्रति विद्वेष तथा अन्यों के मन में सहानुभूति की स्थिति थी । दूसरे विश्वयुद्ध के उपरांत अन्य देशों की भांति ब्रिटिशों ने गुयाना में सत्ता का हस्तांतरण किया । विदेशी सत्ताओं की सहायता से सरकार बनाए जाने के उपरांत नीग्रो लोगों ने अपनी वृत्ति पूरी बदल दी । श्वेत लोगों के प्रति द्वेष अब भारतीयों के प्रति प्रखर विरोध में परिवर्तित हुआ । सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों में नीग्रो बहुसंख्यक भारतीयों का खुलेआम उत्पीडन करने लगे । जो इतिहास ब्रिटिश गुयाना का है, वह तथा वैसे ही त्रिनिदाद एवं सूरीनाम का भी है । क्रांति के लिए शोषित समाज विद्रोह कर रहा है, इतना पर्याप्त नहीं है । उनके जीवनमूल्य शोषकों के जीवनमूल्यों की अपेक्षा भिन्न होने चाहिए । यदि ऐसा नहीं है, तो विजयी शोषित समाज स्वयं ही दोगुने आवेश से शोषक की भूमिका निभाता है ।
२. क्रांति के उपरांत शोषण की प्रक्रिया पुनः आरंभ होने से क्रांति की आवश्यकता पुनः प्रतीत होना
नेताओं का दूसरा वर्ग ऐसा हो सकता है कि जिनके जीवनमूल्य भिन्न हैं । उन्हें शोषकों को हटाकर भिन्न जीवनमूल्यों के लिए क्रांति करानी है; उसके कारण उनके हाथ में सत्ता आने के कारण ये लोग केवल सत्ता के लालच में न आकर नई पद्धति से समाज की रचना करेंगे; परंतु फ्राइर ने ऐसा कहा है, ‘अब तक की विभिन्न क्रांतियों में यही अनुभव हुआ है कि शोषकों की अपेक्षा भिन्न जीवनमूल्य तथा भिन्न-भिन्न जीवननिष्ठाएं संजोनेवाले नेता बहुत दुर्लभ होते
हैं । क्रांति होने पर एक शोषकवर्ग भले ही हट जाए, तब भी नए नेतृत्व में शोषण की यह प्रक्रिया पुनः आरंभ हो जाती है तथा उसके कारण पुनः एक बार क्रांति की आवश्यकता प्रतीत होती है ।’ चीन की सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात करते समय माओ-त्से-तुंग ने यही बात कही तथा उसने अखंड क्रांति का सिद्धांत बताया ।
३. चीन में साम्यवादी सरकार की स्थापना
वर्ष १९४९ में चीन में राज्यक्रांति हुई । माओ-त्से-तुंग तथा उसके सहयोगियों ने आंतरिक युद्ध जीतकर वहां साम्यवादी शासन की स्थापना की । इस कार्यकाल में कुछ भव्य-दिव्य, चिरकाल टिका रहनेवाला तथा कुछ नया करने की माओ की ईर्ष्या एवं महत्त्वाकांक्षा थी । उससे ही उसने ‘हंड्रेड फ्लॉवर्स ब्लूम’ (चीनी बुद्धिजीवियों को आंदोलन में सम्मिलित होने का किया गया आवाहन) तथा ‘सांस्कृतिक क्रांति’, ऐसे २ प्रयोग किए; परंतु वास्तव में इन दोनों प्रयोगों में चीन में अधिक विध्वंस होकर अराजकता मच गई । इसके फलस्वरूप माओ को ये दोनों प्रयोग रोकने पडे । चेन-यू माओ का निकटतम सहयोगी था । जीवन की ढलती आयु में वे एक बार बातें कर रहे थे, उस समय चेन ने माओ से कहा, ‘मैन्स कैपेसिटी टू चेंज मटेरियल वर्ल्ड इज वेरी लिमिटेड.’ (भौतिक विश्व में परिवर्तन लाने की मनुष्य की क्षमता बहुत ही सीमित है ।)
४. भारत के साम्यवादी राजनीतिक दल वैचारिक दृष्टि से दिवालिया तथा पथभ्रष्ट

पूरे विश्व में हुई साम्यवादी क्रांतियों में वर्गविहीन समाजरचना स्थापित करने का स्वप्न अभी तक साकार नहीं हो पाया है । चीन की क्रांति के उपरांत भारत के मार्क्सवादी नेताओं ने क्रांति का असफल प्रयास किया । वर्ष १९५७ में केरल में मार्क्सवादी पहली बार सत्ता में आए । उसके उपरांत बंगाल एवं त्रिपुरा राज्यों में भी वे सत्ता में आए; परंतु तब भी साम्यवादीशासित राज्यों में मार्क्सवाद की दृष्टि से अपेक्षित क्रांति सफल नहीं हो पाई । वर्ष १९६४ में साम्यवादी दल में ही विभाजन होकर साम्यवादी दल ‘मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी’ (माकपा) एवं ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (भाकपा), इन २ भागों में बंट गया । माकपा ने ‘हम क्रांति से एकनिष्ठ हैं’, यह दावा करते हुए ‘क्रांति करानी हो, तो उसके लिए चुनावों की नहीं, अपितु बंदूक की नली की आवश्यकता है’, यह सूत्र बताया; परंतु वर्ष १९६७ में माकपा ने कांग्रेस से टूटे हुए गुट से सांठगांठ कर बंगाल में सत्ता हथियाई । इसके कारण चारू मजुमदार ने अलग होकर वर्ष १९६७ में नक्सली आंदोलन आरंभ किया । वह मार्क्सवादी विचारधारा का हिंसक रूप था ।
प्रस्थापित व्यवस्था के विरुद्ध शीर्ष भूमिका अपनानेवाले इस विद्रोही आंदोलन ने उस समय अनेक लोगों को आकर्षित कर लिया था; परंतु मजुमदार की मृत्यु के उपरांत इस आंदोलन के अनेक टुकडे हुए । वर्ष २००४ में पूरे देश में फैले हुए ये समूह एक हो गए तथा उससे यह आंदोलन अधिक हिंसक हो गया; परंतु आज उसका पूर्ण परिवर्तित रूप सामने आया है । भारत के साम्यवादी दल वैचारिक दृष्टि से दिवालिया तथा पथभ्रष्ट हो चुके हैं । साम्यवादी दल तो अपने अस्तित्व की लडाई लड रहा है । ‘वर्ष २०५० में हम देहली की सत्ता हथियाएंगे’, ऐसा दावा करनेवाले माओवादी नेतृत्व ने तत्त्वज्ञान को बंदूक की नली में बंद कर दिया है । उसका स्थान अब केवल आतंकवाद ने लिया
है । वर्तमान में वर्ग संघर्ष एवं सामाजिक आंदोलन के स्थान पर क्रूरता, हिंसा, महिलाओं का यौन शोषण, सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय संपत्ति के विध्वंस पर बल दिया जा रहा है । लोकयुद्ध की संकल्पना विलुप्त होकर नक्सली आंदोलन फिरौतीवाद की ओर अग्रसर है । माओवादी संगठन में भी आंतरिक विद्रोह आरंभ हो चुका है ।
५. मानसिक क्रांति की आवश्यकता

शोषकों के विरुद्ध जब-जब नवजागृत शोषित समाज का विद्रोह होता है, उस समय यह ध्यान में रखनेयोग्य होता है कि उसमें केवल मन का आवेश एवं क्षोभ अनियंत्रित होती है । माओवाद भी इसी प्रकार की एक प्रतिक्रिया है । उसके कारण शोषितों के मन में तोडफोड, प्रतिशोध की भावना आदि भावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं; परंतु उससे पूरे समाज को साथ लेकर चलनेवाला कोई भी नया मार्ग तैयार नहीं हो सकता । शोषित स्वयं सफलता के उपरांत शोषक बन जाते हैं, यह प्रत्येक क्रांति के उपरांत का अनुभव है । अतः विद्रोह करना भले ही स्वाभाविक हो, तब भी उससे समस्या का समाधान नहीं मिल सकता । यदि सचमुच ही समस्या का समाधान निकालना है, तो सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से जो दुर्बल लोग हैं, उनका ध्यान रखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति समाज में उत्पन्न होनी चाहिए । उसके लिए ‘माओवादी’ क्रांति की नहीं, अपितु मानसिक क्रांति की आवश्यकता है ।
– श्री. रवींद्र माधव साठे, सभापति, ‘महाराष्ट्र राज्य खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग’ तथा सचिव सचिव, ‘सावरकर दर्शन प्रतिष्ठान’, मुंबई. (२.११.२०२४) (साभार : दैनिक ‘महाराष्ट्र टाइम्स’)
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