सभी पाठकों, शुभचिंतकों तथा धर्मप्रेमियों से नम्र निवेदन !

१. धनतेरस का महत्त्व : ‘२९.१०.२०२४ को ‘धनतेरस’ है । ‘धन’ अर्थात शुद्ध लक्ष्मी ! इस दिन मनुष्य के पोषण हेतु सहायता करनेवाले धन (संपत्ति) की पूजा की जाती है । व्यापारियों की दृष्टि से धनतेरस से नववर्ष आरंभ होता है, वे इस दिन तिजोरी की पूजा करते हैं । सत्कार्य हेतु धन अर्पण करना, यही श्री लक्ष्मी की सच्ची पूजा है । धर्मशास्त्र कहता है कि ‘मनुष्य स्वयं की संपत्ति का १/६ भाग प्रभु कार्य हेतु व्यय करें ।’
धनतेरस के शुभमुहूर्त पर भगवद्कार्य के लिए, अर्थात भगवान के धर्मसंस्थापना के कार्य हेतु धन अर्पित करें । धन का उपयोग सत्कार्य के लिए होने पर धनलक्ष्मी लक्ष्मी रूप में सदैव साथ में रहेंगी ।
२. सत्कार्य हेतु अर्थात धर्मप्रसार के कार्य हेतु धन का विनियोग हो, इसलिए ‘सत्पात्र को दान’ करें ! : वर्तमान में धर्म की स्थिति विकट है । धर्मशिक्षा के अभाव में हिन्दुओं का धर्माभिमान नष्ट हो गया है । इसलिए ‘धर्म के पुनरुत्थान का कार्य करना’ इस काल का प्रधान भगवद्कार्य है, जिसे करना आवश्यक है । धर्मप्रसार करनेवाले संत, साथ ही राष्ट्र और धर्म की रक्षा हेतु कार्य करनेवाली संस्था अथवा संगठन के कार्य हेतु दान करना, कालानुसार सर्वश्रेष्ठ दान है । विगत अनेक वर्षाें से सनातन संस्था धर्मजागृति का कार्य निरपेक्ष भाव से कर रही है । अर्पणदाताओं द्वारा सनातन संस्था को किए दान (अर्पण) का सदुपयोग धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होगा, यह सुनिश्चित है !
– श्री. वीरेंद्र मराठे, प्रबंधकीय न्यासी, सनातन संस्था. (२४.९.२०२४)
धनत्रयोदशी के निमित्त दान करने के
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