कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग इत्यादि जिस किसी भी मार्ग से साधना करें, तब भी ईश्वरप्राप्ति हेतु गुरुकृपा के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है । इसीलिए कहा गया है, ‘गुरुकृपा हि केवलं शिष्यपरममङ्गलम् ।’ अर्थात ‘शिष्य का परममंगल (मोक्षप्राप्ति) केवल गुरुकृपा से ही हो सकता है ।’ शीघ्र गुरुप्राप्ति हेतु तथा गुरुकृपा निरंतर होने हेतु परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने ‘गुरुकृपायोग’ नामक सरल साधनामार्ग बताया है ।
१. गुरुकृपायोग के ८ अंग
१. स्वभावदोष-निर्मूलन २. अहं-निर्मूलन ३. नामजप ४. सत्संग ५. सत्सेवा ६. भक्तिभाव जागृत करने हेतु प्रयास ७. सत् के लिए त्याग तथा ८. प्रीति (निरपेक्ष प्रेम)
(अधिक विवेचन हेतु पढिए – ग्रंथमाला ‘गुरुकृपायोग’)
२. साधक की दृष्टि से १४ विद्याओं तथा ६४ कलाओं के माध्यम से शिक्षा का बीजारोपण करना
‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां तथा उतने साधनामार्ग’, इस सिद्धांत के अनुसार परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने साधकों की विद्या ग्रहण करने की क्षमता तथा कला की रुचि के अनुसार उन्हें साधना सिखाई । आज परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में ‘ईश्वरप्राप्ति हेतु कला’ का ध्येय रखकर कुछ साधक चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्यकला, नाट्यशास्त्र आदि कलाओं के माध्यम से साधना कर रहे हैं । ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के माध्यम से साधना की दृष्टि से १४ विद्याएं तथा ६४ कलाओं की शिक्षा दी जानेवाली है ।
३. तीव्र गति से साधकों की हो रही आध्यात्मिक उन्नति !
अनेक संतों एवं गुरुओं के पास उनकी परंपरा को आगे बढाने हेतु एक भी शिष्य नहीं होता; परंतु इसके विपरीत परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन तथा उनकी कृपा के बल पर गुरुकृपायोग के अनुसार साधना कर १५.५.२०२४ तक १२७ साधक संत बने, तथा १,०५८ साधक संतपद प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर हैं ।
(संपूर्ण लेखन हेतु संदर्भ : सनातन का मराठी ग्रंथ ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी का अद्वितीय कार्य : खंड १’)

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