
षट्कर्म, आसन, मुद्रा, बंध एवं प्राणायाम, ये सभी साध्य होने के उपरांत साधक ‘प्रत्याहार’, ‘धारणा’, ‘ध्यान,’ ‘समाधि’ आदि की ओर मुड जाता है । हठयोग में प्रगति करते समय घंटानाद जैसा सूक्ष्म नाद सुनाई देने लगता है । इस नाद पर निरंतर ध्यान केंद्रित करना ‘नादानुसंधान’ है ! हठयोग में नादानुसंधान ध्यानसाधना का महत्त्वपूर्ण प्रकार है । स्वात्माराम ने हठयोग एवं राजयोग के मध्य का अंतर बताया है । राजयोग अर्थात समाधि, जिसमें मन जीवात्मा में विलीन होता है तथा जीवात्मा को परमात्मा में विलीन करना ही योगसाधना का अंतिम लक्ष्य है । (साभार : ‘समय निरामय’ पंचांग)
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