‘मैं रामभक्त नहीं हूं, अपितु मैं संविधान का भक्त हूं’, ऐसा वक्तव्य कर्नाटक के कांग्रेस के मंत्री प्रियंक खडगे ने दिया । स्वयं की ‘धर्मनिरपेक्षतावादी’ छवि को अधिकाधिक चमकाने हेतु हिन्दुओं के देवताओं के विरोध में किया गया यह विषवमन है । लगभग ८० के दशक से भारत की राजनीति ‘धर्मनिरपेक्षतावाद’, इस शब्द के आसपास घूमने लगी । उस काल में यदि कोई यह पूछता कि ‘सफल राजनीतिक जीवन के क्या मापदंड हैं ?’; तो उत्तर यही था कि ‘नेता चाहे गुंडा हो, सुशिक्षित हो अथवा उद्यमी हो; वह धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए ।’ कांग्रेसियों ने इसका अचूक पालन किया । नेहरू के काल से कांग्रेस भारतीय राजनीति में ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीति का ‘ट्रेंड’ लाई । इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल में उसे पाल-पोसकर बडा किया । सोनिया गांधी के कांग्रेस पर प्रभुत्वकाल में कांग्रेस का धर्मनिरपेक्षतावाद उच्चतम शिखर पर पहुंचा । कांग्रेसियों पर इसका प्रभाव इतना था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव में छिपा हिन्दुत्व सामने आने पर कांग्रेसियों ने उन्हें हाशिये पर डाल दिया । घटना ऐसी है कि जब ६ दिसंबर १९९२ को बाबरी ढांचा गिराया जा रहा था, तब कहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पूजापाठ कर रहे थे । उनके सहयोगी रोषपूर्वक बोल रहे थे कि ‘ढांचा गिराया जा रहा है’, उस समय राव ने उनकी अनदेखी की तथा इस कारण ढांचा गिरा दिया गया । इस घटना की सच्चाई पर अनेक लोगों के भिन्न-भिन्न मत हैं; किंतु उसके कारण राव की ‘धर्मनिरपेक्ष’ छवि कलंकित हो गई तथा अंत तक वे उसे धो नहीं पाए । गांधी परिवार की छत्रछाया से कांग्रेस को बाहर निकालने में राव का बडा योगदान था; परंतु कांग्रेसियों की दृष्टि में उनकी यह चूक उन्हें केवल जीवनभर ही नहीं, अपितु उनकी मृत्यु के उपरांत भी महंगी पडी । उनकी मृत्यु के उपरांत सरकारी शिष्टाचार के अनुसार उनका सम्मान नहीं किया गया । इतना ही नहीं, सोनिया गांधी, राहुल गांधी एवं प्रियांका गांधी ने तो उन्हें श्रद्धांजली देना भी टाल दिया । अन्य समय पर हिन्दुओं को मानवता का उपदेश देनेवाले कांग्रेसियों ने राव के साथ जो व्यवहार किया, उस विषय में कांग्रेसी सदैव ही मौन रहते हैं । तथापि राव से संबंधित इस प्रसंग का तथा उसके उपरांत की घटनाओं का यहां उल्लेख करने का कारण यही है कि खडगे तथा उनके दल को ‘धर्मनिरपेक्षता’ की महान परंपरा प्राप्त है । उसके कारण केवल खडगे ही नहीं, अपितु लगभग सभी कांग्रेसियों का संविधान-भक्त होना स्वाभाविक ही है; परंतु प्रश्न यही है कि कांग्रेसी किस संविधान को मानते हैं ? संविधान के रचनाकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा लिखे गए संविधान को अथवा जिस संविधान में १०० से भी अधिक संशोधन किए गए, उस संविधान को ? रोचक बात यह है कि संविधान के प्रथम पृष्ठ पर प्रभु श्रीराम का चित्र है, उस विषय में खडगे का क्या कहना है ? ‘संविधान के भक्त खडगे इस पुस्तक की पूजा तो निश्चित ही करते होंगे । तो क्या उसकी पूजा करते समय उसपर अंकित श्रीराम के चित्र पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं ? स्वयं को संविधान के तारणहार माननेवाले इन लोगों ने कितनी बार संविधान के सिद्धांतों को पैरों तले रौंदा, इसका कोई हिसाब नहीं है । इसलिए खर्गे ने संविधान की भक्ति का जो चोगा ओढ रखा है, उसे फाड देने का यही उचित समय है !
राजनीति की दिशा ही बदल गई !
धर्मनिरपेक्षता पर आधारित राजनीति की दिशा वास्तव में बदली है, वर्ष २०१४ के चुनाव के उपरांत ! अब धर्मनिरपेक्षता का राग अलापनेवाले इन नेताओं की स्थिति ऐसी हो गई है कि ‘अब राम के बिना राजनीति में ‘राम’ नहीं है ।’ ये धर्मनिरपेक्ष नेता ‘हिन्दुत्व का सार्वजनिक समर्थन अर्थात प्रखर हिन्दुत्व की राजनीति तो नहीं कर सकते । इसलिए उन्होंने यह सिद्धांत अपनाया है कि सौम्य हिन्दुत्व की राजनीति करेंगे ।’ उसके कारण ही क्यों ना हो; परंतु बंगाल में वामपंथियों ने नवरात्रोत्सव मंडलों से भेंट की । इतना ही नहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी स्वयं को ‘जनेऊधारी हिन्दू’ कह रहे हैं । चुनाव के समय में वे अनेक मंदिरों में गए । राहुल गांधी यदि मंदिरों में जाकर हिन्दुओं के देवताओं के सामने माथा टेक सकते हैं, तो खडगे को ऐसा करने में क्या समस्या है ? क्या कांग्रेस के नेताओं में ही हिन्दुत्व के विषय पर मतभेद हैं ?
वर्ष २०१४ में लोकसभा चुनाव में हुई हार के उपरांत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी ने कहा था, ‘कांग्रेस बडे स्तर पर अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण करती है, इसलिए कांग्रेस हार गई ।’ एक एंटनी को छोडकर किसी अन्य कांग्रेसी नेता ने दल की हार का इतना वस्तुनिष्ठ आत्मपरीक्षण नहीं किया । कुछ दिन पूर्व ही उनके द्वारा दिए वक्तव्यों का कांग्रेस को गंभीरता से अध्ययन करना आवश्यक है । वे कहते हैं ,‘यदि भाजपा को हराना है, तो कांग्रेस को भारत के बहुसंख्यक समाज को अपना बनाना चाहिए ।’ उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की नीति की भी आलोचना की है । वे कहते हैं, ‘अल्पसंख्यक उनके धर्म का पालन करें तो कांग्रेस को चलता है; परंतु कोई मंदिर जाए अथवा तिलक लगाए, तो उसे ‘धर्मांध’ कहा जाता है । यह नीति उचित नहीं ।’ एंटनी हिन्दू नहीं, ईसाई हैं; इसलिए उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की सीमा लांघकर कांग्रेस की अनुचित नीति पर कटाक्ष किया । कांग्रेस को आईना दिखाया, इसके लिए उनका अभिनंदन किया जाना चाहिए । तथापि जिनके सिर पर धर्मनिरपेक्षता का भूत सवार है, उनके पास अपनी चूक में सुधार करने का समय कहां है ?
कांग्रेस के सच्चे धर्मनिरपेक्षतावादी !
स्वयं को संविधान का सेवक माननेवाले कांग्रेसी यदि संविधान के सिद्धांतों का उचित पद्धति से पालन करते, तो आज कांग्रेस का ही नहीं, पूरे भारत का आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चित्र भिन्न होता । इस पृष्ठभूमि पर यहां केरल के राज्यपाल तथा किसी समय में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे आरिफ मोहम्मद खान का उल्लेख करना होगा । वे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ का विरोध करते थे; परंतु शहाबानो प्रकरण में मुसलमानों का तुष्टीकरण करने हेतु कांग्रेस ने जो भूमिका अपनाई, उसे अस्वीकार कर आरिफ मोहम्मद खान ने भिन्न मार्ग अपनाया । धर्मनिरपेक्षता एवं संविधान का अनादर जितना कांग्रेस ने किया है, उतना अन्य किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं किया है ।
कांग्रेसी श्रीराम की तो छोडिए; संविधान की भक्ति भी नहीं करते; यह अब हिन्दू जान गए हैं । इसीलिए उन्होंने केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा । कर्नाटक में कांग्रेस नहीं जीती, अपितु वह अनुचित नीतियां अपनानेवाली भाजपा हारी । इसलिए कर्नाटक में मिली जीत से अभिभूत खडगे ऐसे वक्तव्य देना बंद करें । इससे उन्हें कोई लाभ तो होगा नहीं, उलटे भारी राजनीतिक हानि होगी, यह निश्चित है !



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