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नई देहली – सर्वोच्च न्यायालय ने ७ दिसंबर को असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों से संबंधित नागरिकता कानून की धारा ६ए से जुडी १७ याचिकाओं पर सुनवाई की । न्यायालय ने केंद्र सरकार से १ जनवरी १९६६ से २५ मार्च १९७१ के मध्य असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों को दी गई नागरिकता का आंकडा मांगा है । मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली ५ सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र एवं असम सरकार को यह जानकारी उपलब्ध कराने के लिए ११ दिसंबर तक की समय सीमा दी है ।
याचिकाओऺ की सुनवाई के समय सर्वोच्च न्यायालय ने संपूर्ण देश में घुसपैठियों की समस्या पर टिप्पणी की । न्यायालय ने कहा, ‘हम घुसपैठियों को अनिश्चित काल तक भारत में रहने की अनुमति नहीं दे सकते । इससे देश के मूलभूत ढांचे पर भारी दबाव पडेगा । केंद्र सरकार ने कितने घुसपैठियों को नागरिकता दी है ? तथा कितने लोगों को वापस भेजा गया है ? यह जानकारी उपलब्ध कराई जाए ।
पीठ ने पूछे प्रश्न !
- १९६६ से १९७१ तक साढे पांच वर्ष की कालावधि में कितने लोगों की पहचान विदेशी के रूप में की गई ?
- केंद्र सरकार द्वारा अब तक कितने विदेशी न्यायाधिकरण (‘फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल’) बनाए जा चुके हैं ? (इन उप-न्यायालयों में अप्रवासियों की नागरिकता की सुनवाई होती है ।)
- कितने प्रकरण लंबित हैं तथा कितने का निपटारा हो चुका है ?
- जब बांग्लादेश के साथ बंगाल की लंबी सीमा लगती है, तो सरकार ने बंगाल को नागरिकता अधिनियम की धारा ६ए को कक्षा के बाहर रखकर असम के साथ अलग व्यवहार क्यों किया ?
- क्या ऐसे कोई आंकडे हैं, जो यह सिद्ध करते हों कि बंगाल में घुसपैठ असम से अल्प है ? ऐसी धारणा क्यों है कि यह समस्या असम में है, बंगाल में नहीं ?
स्थानीय बंगाली नागरिकों तथा बांग्लादेशी घुसपैठियों में समानता के कारण घुसपैठियों की पहचान करना कठिन है ! – केंद्र सरकार का उत्तर
इस पर भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने कहा कि इस समस्या का जन्म असम में हुआ; क्योंकि वहां की संस्कृति बांग्लादेश से बहुत भिन्न है । वहां अप्रवासियों को पहचानना सहज था; किंतु बंगाल के मूल निवासियों तथा घुसपैठियों के अन्न, वस्त्र एवं संस्कृति बहुत समान हैं, इसलिए उन्हें पहचानना कठिन है ।
नागरिकता अधिनियम की धारा ‘६ए’ क्या है ?वर्ष १९८५ में असम समझौते के अंतर्गत भारत आने वाले लोगों की नागरिकता से संबंधित एक विशेष प्रावधान के रूप में धारा ‘६ए’ को नागरिकता अधिनियम में जोडा गया था । इसमें कहा गया है कि जो लोग २५ मार्च १९७१ से पूर्व १ जनवरी १९६६ को अथवा उसके उपरांत बांग्लादेश सहित अन्य भागों से असम आए थे तथा तभी से वहां रह रहे हैं, उन्हें मानवाधिकार के आधार पर भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए अनुच्छेद १८ के अंतर्गत स्वयं को पंजीकृत करना होगा । उसके आधार पर असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों को नागरिकता देने की अंतिम तिथि २५ मार्च १९७१ निश्चित की गई । अब इस धारा की संवैधानिक वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है । |
संपादकीय भूमिकासरकार को घुसपैठियों को देश से निष्कासित करने के साथ-साथ उन सरकारी संस्थाओऺ के उत्तरदायी अधिकारियों को भी आजीवन कारावास में डालना चाहिए जिन्होंने घुसपैठ की अनुमति दी थी ! |
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