हमारे उपास्यदेवता की विशेषता तथा उनकी उपासना से संबंधित अध्यात्मशास्त्रीय जानकारी ज्ञात होने पर देवता के प्रति श्रद्धा निर्माण होती है । यह उद्देश्य ध्यान में रखकर इस लेख में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (६ (स्मार्त) व ७ (वैष्णव) सितंबर) के निमित्त श्रीकृष्ण भगवान की कुछ विशेषताएं तथा उनकी उपासना से संबंधित उपयुक्त अध्यात्मशास्त्रीय जानकारी दी जा रही है ।

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ।।
अर्थ : सभी दुखों का हरण करनेवाले, भक्तों की पीडा, क्लेश दूर करनेवाले, शरणागतों को अभयदान देनेवाले तथा भक्तों को असीम आनंद प्रदान करनेवाले, वासुदेव श्रीकृष्ण को मेरा नमस्कार है !
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण की निराले गुण विशेषताओं को स्मरण कर उन्हें नमन किया है । ऐसा करने से भक्त में श्रीकृष्ण के प्रति भाव निर्माण होकर वह उनकी कृपा का पात्र बनता है ।
प्रार्थना : हे श्रीकृष्ण, आप धर्मसंस्थापक देवता हैं । मैं राष्ट्ररक्षा और धर्मजागृति के लिए जो कार्य कर रहा हूं, उसके लिए बुद्धि और शक्ति प्रदान करें ।
‘श्री’ अक्षर का अर्थ : ‘श्रीकृष्ण’ शब्द में ‘श्री’ अर्थात शक्ति, सौंदर्य, सद्गुण, वैभव इत्यादि का संग्रह । हमारे नाम के पूर्व जो ‘श्री’ लगाते हैं, उसमें ‘श्री’ के उपरांत लाघव चिन्ह(.) होता है; क्योंकि वह ‘श्रीयुत’ का संक्षिप्त रूप है । हम श्रीयुत हैं अर्थात ‘श्री’ से युक्त हैं अर्थात हममें भगवान का अंश है । इसके विपरीत ‘श्रीकृष्ण’ नाम में ‘श्री’ के उपरांत लाघव चिन्ह(.) नहीं होता; क्योंकि ‘श्रीकृष्ण’ स्वयं ही भगवान हैं ।
श्रीकृष्ण की विशेषताएं !
कुशल राजनीतिज्ञ, महान तत्त्ववेत्ता, समाजरक्षा का ध्येय रखनेवाले, सामाजिक कर्तव्यों के प्रति दक्ष, अन्याें के कल्याण के लिए ही सबकुछ करनेवाले, अन्याय सहन न करनेवाले, दुर्जनों का नाश करनेवाले तथा अर्जुन को गीता बतानेवाले, ये श्रीकृष्ण की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं ।
श्रीकृष्ण को तुलसी क्यों चढाते हैं ?

देवताओं के पवित्रक अर्थात देवता के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण । जिस वस्तु में किसी विशेष देवता के पवित्रक आकर्षित करने की क्षमता अन्य वस्तुओं की अपेक्षा अधिक होती है, ऐसी वस्तु उस देवता को चढाने पर, सहजता से उनकी मूर्ति में देवता का तत्व आता है तथा उसके कारण देवता के चैतन्य का लाभ हमें शीघ्र होता है । तुलसी में कृष्णतत्त्व भरपूर होता है । काली तुलसी श्रीकृष्ण के मारक तत्त्व की, तो हरे पत्तों की तुलसी श्रीकृष्ण के तारक तत्त्व की प्रतीक है । इसलिए श्रीकृष्ण को तुलसी चढाते हैं ।
श्रीकृष्ण की कितनी परिक्रमा करें ?
श्रीकृष्ण इच्छा, क्रिया तथा ज्ञान इन तीनों शक्तियों के स्तर पर कार्य करते हैं । उसके दर्शक के रूप में श्रीकृष्ण की न्यूनतम तीन अथवा तीन गुना उस संख्या में परिक्रमा करें । प्रत्येक परिक्रमा के उपरांत देवता को नमस्कार करें, तदुपरांत अगली परिक्रमा करें । अधिक परिक्रमा करनी हो, तो न्यूनतम संख्या से गुणा कर उस संख्या में करें । परिक्रमा हो जाने पर प्रक्षेपित होनेवाला चैतन्य अल्प कालावधि में संपूर्ण देह में प्रक्षेपित होता है ।
संदर्भ : सनातन-निर्मित लघुग्रंथ ‘श्रीकृष्ण’
श्रीकृष्ण की पूजा कैसे करें ?

भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के पूर्व उपासक स्वयं को मध्यमा से दो सीधी रेखाओं वाला अथवा खडा तिलक लगाएं । श्रीकृष्ण की पूजा के समय उनकी प्रतिमा को तिलक लगाने के लिए गोपीचंदन का उपयोग करते हैं । श्रीकृष्ण की पूजा के समय उन्हें छोटी उंगली की साथवाली, अर्थात अनामिका से तिलक लगाएं । श्रीकृष्ण को हल्दी-कुमकुम लगाते समय प्रथम हल्दी तथा उसके उपरांत कुमकुम दाएं हाथ के अंगूठे तथा अनामिका की चिमटी में लेकर चरणों पर चढाएं । अंगूठा तथा अनामिका को जोडकर जो मुद्रा बनती है उसके कारण पूजक के शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है, जिससे भक्तिभाव निर्माण होने में सहायता होती है ।
श्रीकृष्ण को कृष्णकमल क्यों चढाते हैं ?

कृष्णकमल के फूलों में श्रीकृष्ण के पवित्रक आकर्षित करने की क्षमता सबसे अधिक होने के कारण यह फूल श्रीकृष्ण को चढाते हैं । देवता के चरणों में फूल विशेष संख्या में तथा विशेष आकार में चढाने पर उन फूलों की ओर देवता का तत्व शीघ्र आकर्षित होता है । इसके अनुसार श्रीकृष्ण को फूल चढाते समय तीन अथवा तीन गुना संख्या में एवं लंबगोलाकार आकार में चढाएं । श्रीकृष्ण को इत्र लगाते समय चंदन का इत्र लगाएं ।
श्रीकृष्ण के तारक तथा मारक तत्त्व के लिए उपयोग की जानेवाली उदबत्ती
श्रीकृष्ण की पूजा करते समय उनके तारक तत्त्व अधिक आकर्षित करने के लिए चंदन, केवडा, चंपा, चमेली, जाई, खस तथा अंबर में से किसी भी गंध की उदबत्ती लगाएं; तथा श्रीकृष्ण का मारक तत्त्व अधिक आकर्षित करने के लिए हिना अथवा दरबार गंध की उदबत्ती लगाएं । भक्ति के आरंभिक स्तर पर देवता के लिए २ उदबत्तियां लगाना अधिक योग्य है । भक्ति के अगले स्तर पर एक उदबत्ती लगाएं । उदबत्ती दाएं हाथ की तर्जनी अर्थात अंगूठे के साथवाली उंगली तथा अंगूठे के मध्य भाग में पकडकर घडी की सुई की दिशा में तीन बार घुमाएं ।
श्रीकृष्ण अर्थात ‘पूर्णावतार’!
श्रीकृष्ण एक ही समय में इच्छा, क्रिया तथा ज्ञान इन तीनों शक्तियों के स्तर पर कार्य कर सकते हैं; इसलिए उन्हें ‘पूर्णावतार’ कहा जाता है ।
जगद्गुरु कृष्ण
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् । अर्थात जगद्गुरु कृष्ण को वंदन है । सभी देवताओं में केवल कृष्ण को ही जगद्गुरु संबोधित किया है । इसका कारण है कि उन्होंने कर्मयोग, भक्तियोग तथा ज्ञानयोग इत्यादि योगमार्ग सिखाए हैं ।
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