एक औषधीय प्रतिष्ठान ने नवरात्रोत्सव काल में हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करनेवाला विज्ञापन प्रसारित किया था । उसे देखकर एक धर्मप्रेमी ने पुलिस में परिवाद प्रविष्ट किया । इस संदर्भ में हुई न्यायालयीन प्रक्रिया के विश्लेषण से संबंधित लेख यहां दे रहे हैं ।

१. हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करने के प्रकरण में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के इंदौर खंडपीठ ने हिन्दूद्रोही महेंद्र त्रिपाठी को निर्दाेष मुक्त किया !
एक औषधीय प्रतिष्ठान ने हिन्दुओं के नवरात्रोत्सव की अवधि में एक विज्ञापन प्रसारित किया । इस विज्ञापन में प्रस्ताव दिया गया था, ‘गर्भनिदान परीक्षण किट (kit) एवं कंडोम निःशुल्क मिलेगा ।’ साथ ही इस विज्ञापन की पृष्ठभूमि पर डांडिया खेल रहे एक दंपति को दिखाया गया था । इस प्रतिष्ठान ने ‘वॉट्सएप’ एवं ‘फेसबुक’ के माध्यम से यह विज्ञापन प्रसारित किया । इस विज्ञापन के विरुद्ध एक हिन्दू धर्मप्रेमी ने पुलिस में परिवाद प्रविष्ट किया । उसमें उसने ‘धार्मिक भावनाएं आहत होने से भारतीय आपराधिक कानून के अनुच्छेद २९५ (अ) एवं ५०५ सहित सूचना प्रौद्योगिकी कानून के अनुच्छेद ६७ के अंतर्गत विज्ञापन प्रसारित करनेवाले के विरुद्ध अपराध पंजीकृत करने की मांग की । उसके अनुसार अपराध पंजीकृत किया गया । पुलिस के अन्वेषण के उपरांत विज्ञापन देनेवाले प्रतिष्ठान के मालिक महेंद्र त्रिपाठी के विरुद्ध आरोपपत्र निश्चित किया गया । उसके उपरांत इन आरोपों को निरस्त (रद्द) करने के लिए महेंद्र त्रिपाठी मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय गया । इस प्रकरण में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के इंदौर खंडपीठ ने सलमान खान प्रकरण के निर्णय का आधार लेकर त्रिपाठी के विरुद्ध पंजीकृत अपराध निरस्त कर त्रिपाठी को खुला छोड दिया ।
२. न्यायालय के इस निर्णय पर हिन्दू धर्मियों द्वारा उठाए गए कुछ प्रश्न !

उच्च न्यायालय के इंदौर खंडपीठ ने यह जो निर्णय दिया, उसके उपरांत धर्मप्रेमी हिन्दुओं के मन में अनेक प्रश्न उठते हैं । ‘क्या त्रिपाठी अन्य पंथियों के त्योहार-उत्सव के समय इस प्रकार का विज्ञापन प्रसारित करने का साहस दिखाते ?, साथ ही क्या अन्य पंथ के लोग इस विज्ञापन के विरुद्ध केवल पुलिस थाना अथवा न्यायालयीन अभियोग की प्रक्रिया कर शांत बैठते ?’ उसके उपरांत यह प्रश्न भी उठता है कि क्या अन्य धर्मियों की धार्मिक भावनाएं आहत करने के संदर्भ में न्यायालय इतनी सहजता से निर्णय देता ? तथा क्या न्यायालय को निर्णय देते समय सामाजिक बंधन महत्त्वपूर्ण लगते हैं ?
इसके साथ ही किसी एक धर्मी की धार्मिक भावनाएं आहत होने पर न्यायालय इतनी सहजता से धर्मद्रोहियों के अनुचित कृत्य का समर्थन क्यों करे ? न्यायालय को, समाज में कानून का भय बना रहे तथा लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान हो; इन बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है ।
३. ….तब भी क्या कर्मफलन्याय के अनुसार ईश्वर के दंड से छूट मिल सकती है ?
आज बडी संख्या में लोग कानून को महत्त्व नहीं दे रहे हैं, ऐसा ही दिखाई देता है । इसका एकमात्र कारण है ‘न्यायालयों द्वारा इस प्रकार से दिए जा रहे अनुचित निर्णय !’, ऐसा किसी ने कहा, तो उसमें आश्चर्य कैसा ? इस देश में आरोपियों को यह पक्का ज्ञात है कि देश का कानून धर्मद्रोहियों, कानून तोडनेवालों तथा अनैतिक आचरण करनेवालों की सहायता करनेवाला है । अधिवक्ताओं पर पैसा लुटा दिया, तो हम बडी सहजता से अभियोग से बाहर निकल सकते हैं । इस प्रकरण में न्यायालय को सर्वप्रथम उच्च न्यायालय के स्तर पर अभियोग निरस्त करने के स्थान पर त्रिपाठी जैसे धर्मद्रोही को अन्य आरोपियों की भांति निचले न्यायालय में ‘तारीख पे तारीख’ (अगली-अगली तिथियों पर सुनवाई रखना) तथा ‘अभियोग की प्रत्येक तिथि पर उपस्थित रहने’ की अनुमति देनी चाहिए थी । उसके कारण आरोपी पुनः ऐसा अपराध करने का साहस नहीं दिखाता ।
भले ही ऐसा हुआ हो; तथा ‘इस न्यायालय में वह निर्दाेष छूटा हो; परंतु ‘कर्मफलन्याय’ सिद्धांत के अनुसार ईश्वर आरोपी को तथा उसके साथ ही न्यायाधीश को उनके कर्माें का फल अवश्य देंगे’, यदि हिन्दू धर्मियों की ऐसी धारणा बने, तो उसमें अनुचित क्या है ? सरकार को भी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं एवं मतों का सम्मान करनेवाले कानून बनाने चाहिए, जिससे न्यायालय पर भी उसका अंकुश रहे ! कानून में ऐसे परिवर्तन लाए जाने
चाहिए । ऐसा नहीं हुआ, तो समाज में अशांति उत्पन्न होकर हिन्दुओं के द्वारा भी धर्मांधों जैसे कृत्य न हों, इसका दायित्व न्यायालय एवं प्रशासन पर आता है, इसका भान रखा जाए । धर्मप्रेमी हिन्दुओं की यही भावना है ।’ (२९.१२.२०२२)
– (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय
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