
‘वर्तमान में अधिकांश साधकों के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक कष्ट बढ गए हैं । कष्टों की प्रतिदिन बढनेवाली यह मात्रा आपत्काल निकट आने को दर्शा रही है । अतः साधक यह बात ध्यान में रखें कि इस आपत्काल से पार पाने के लिए स्वयं की साधना वृद्धि करना ही एकमात्र पर्याय है । सभी साधक अपना अधिकांश समय सत्संग में रहने का प्रयास करें । व्यष्टि साधना के, विशेष रूप से ‘भावजागृति के प्रयास किस प्रकार कर सकते हैं, इस बात की ओर ध्यान दें ।’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा । (१०.१०.२०२२)
| आध्यात्मिक कष्ट : आध्यात्मिक कष्ट होना, अर्थात व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन होना । यदि व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन ५० प्रतिशत या उससे अधिक मात्रामें हो, तो उसे तीव्र कष्ट कहा जाता है; नकारात्मक स्पंदन ३० से ४९ प्रतिशत होना अर्थात मध्यम कष्ट; तो ३० प्रतिशत से अल्प होना, अर्थात मंद आध्यात्मिक कष्ट होना । प्रारब्ध, पूर्वजों के कष्ट आदि अध्यात्मस्तरीय कारणों से आध्यात्मिक कष्ट होते हैं । आध्यात्मिक कष्ट का निदान संत एवं सूक्ष्म स्पंदन जाननेवाले साधक कर सकते हैं । |
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