
व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक सभी कृतियों की प्रविष्टि भगवान रखता है । साधना करनेवाले जीवों की साधना उनका प्रारब्ध और संचित नष्ट करने के लिए उपयोग की जाती है । इसीलिए साधकों की प्रगति की (आध्यात्मिक उन्नति की) गति अल्प होती है । इससे ध्यान में आता है कि ‘गुरुकृपायोग साधना में स्वभावदोष और अहं-निर्मूलन की प्रक्रिया को ६० प्रतिशत महत्त्व क्यों है ?’
पाप-पुण्य भोगने के लिए पुन: जन्म लेना न पडे, इसलिए प्रत्येक कर्म साधना के रूप में होना चाहिए !
कर्म सिद्धांत : भावना विवश की गई अच्छी कृति पुण्य खाते में जमा होती है, तो द्वेष के कारण की गई अनुचित कृति पाप खाते में जमा होती है । ‘पाप-पुण्य भोगने के लिए पुन: जन्म लेना पडता है’, यह कर्म का सिद्धांत है ।
प्रत्येक कर्म साधना होना चाहिए ! : संचित में केवल बुरे नहीं, अपितु अच्छे कर्म भी सम्मिलित होते हैं । इससे बचने के लिए न अच्छे कर्म चाहिए और न बुरे कर्म चाहिए । साथ ही कर्म साधना के रूप में न करने से संचित में कितनी वृद्धि हो रही है, यह हमें ज्ञात ही नहीं होता; इसलिए प्रत्येक कर्म साधना के रूप में होनी चाहिए ।
– (सद्गुरु) श्री. राजेंद्र शिंदे, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (२२.७.२०१८)
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