विश्वयुद्ध अटल होने के कारण स्वरक्षा एवं साधना को सर्वोच्च प्राथमिकता दें !

गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में सनातन के ३ गुरुओं के संदेश !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

‘वर्तमान में वैश्विक स्तर पर अत्यधिक उथल-पुथल हो रही है । वैश्विक स्तर पर विश्वयुद्ध अटल है तथा आगामी ५ से ७ वर्ष अत्यंत भीषण युद्धजन्य परिस्थिति सर्वत्र रहनेवाली है । यह काल अर्थात एक प्रकार से ‘संधिकाल’ (संक्रमण काल) है ।

आगे अत्यंत भयंकर आपातकाल आनेवाला है, यह पिछले २० वर्षों से ‘सनातन संस्था’ बता रही है । वह भयंकर काल अब आगे प्रत्यक्ष अनुभव करना पडेगा । इस संकटकाल में जीवित रहने और जीवन व्यतीत करने के लिए कौन-सी तैयारी करनी चाहिए ? साथ ही कौन-सी साधना करनी चाहिए ? इसका मार्गदर्शन सनातन संस्था ने समय-समय पर ग्रंथ, नियतकालिक, जालस्थल आदि के माध्यम से किया है । संस्था द्वारा किया गया यह मार्गदर्शन केवल पढने के लिए नहीं है, अपितु उसे आचरण में लाने का उचित समय अब आ गया है । इसलिए बिना किसी विलंब के प्राणरक्षा के लिए आवश्यक कृत्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, साथ ही यह ध्यान में रखते हुए कि संकटकाल में भगवान केवल भक्त की ही रक्षा करते हैं, कठोर साधना करें और भगवान के अनन्य भक्त बनें !

पिछले ५-७ वर्षों से, विशेषतः कोरोना महामारी के काल से ‘संपत्काल’ (अच्छा समय) समाप्त होकर ‘आपातकाल’ आरंभ हुआ । अब पिछले वर्ष से, अर्थात भारत-पाक युद्ध से युद्धकाल आरंभ हुआ है । प्रत्येक काल के नियम भिन्न होते हैं । संपत्काल में मनोरंजन, यात्रा, नौकरी-व्यवसाय को जैसे प्राथमिकता होती है, उसी प्रकार युद्धकाल में राष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन करना, जीवित रहने के लिए प्रयास करना और साधना करना इन्हें प्राथमिकता होती है । संधिकाल में साधना करने से अनेक वर्षों की साधना अल्प कालावधि में हो जाती है । इसलिए आगामी ५-७ वर्षों के कठिन काल में साधना पर अधिक बल देने से आपको बडा आध्यात्मिक लाभ होगा और ईश्वरीय संरक्षण प्राप्त होगा । इस भीषण युद्धकाल में केवल अपना विचार न करते हुए समाज के सात्त्विक हिन्दुओं (जीवों) की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है । ऐसी कठिन परिस्थिति में सात्त्विक हिन्दुओं (जीवों) की प्राणरक्षा हेतु निष्ठापूर्वक प्रयास करना, यही इस काल की वास्तविक समष्टि साधना सिद्ध होनेवाली है ।’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था