साधको, आनेवाले आपातकाल का सामना करने के लिए श्रद्धा के बल पर साधना में आनेवाली बाधाओं पर विजय प्राप्त करो !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

‘वर्तमान में संपूर्ण विश्व आपातकाल की सीमा पर खडा है । युद्ध, प्राकृतिक आपदाएं, कोरोना जैसी महामारी आदि विभिन्न माध्यमों से आपातकाल कभी भी आ सकता है । आज तक ईश्वर ने हमारी साधना होने के लिए इस काल को रोककर रखा है; परंतु वह आज नहीं तो कल आनेवाला ही है । इस भयंकर आपातकाल में केवल साधना होगी, तभी हम टिक पाएंगे ।

परंतु केवल बौद्धिक स्तर पर साधना का महत्त्व समझकर साधना करनेवाले कुछ साधक श्रद्धा के अभाव के कारण संदेह, माया का आकर्षण, आर्थिक लोभ अथवा परिस्थिति के कारण साधना छोड रहे हैं । उन्हें लगता है कि ‘मुझे साधना समझ में आ गई है । मैं बाहर रहकर भी अपनी साधना कर सकता हूं ।’ जिन साधकों के मन में संदेह हैं, उन्हें अपने मन की शंकाओं का उचित प्रकार से समाधान करवा लेना चाहिए । माया का आकर्षण, आर्थिक लोभ अथवा परिस्थिति के कारण यदि साधना में खंड पड रहा हो, तो उसके विषय में भी मार्गदर्शन लेकर उसका हल निकालना चाहिए । ‘मुझे साधना समझ में आ गई’, ऐसा लग रहा हो, तब भी अंतर्मुखता और आगे के चरणों की साधना, यह नियमित रूप से अन्य लोगों से ही सीखनी पडती है । उन्हें भी आगे के चरणों की साधना सीखने पर बल देना चाहिए ।

मन में संदेह रखनेवाले कुछ लोग साधना से दूर चले जाते हैं, साथ ही वे अन्य लोगों से नकारात्मक चर्चा कर उनके मन में भी संदेह उत्पन्न करते हैं । इसका गंभीर परिणाम साधकों पर और समष्टि कार्य पर होता है । इससे पापकर्म घटित होता है । साधकों को ऐसे लोगों से सावधान और सतर्क रहना चाहिए ।

साधको, आपातकाल की तीव्रता और ‘यह साधना का अंतिम अवसर हो सकता है’, इसे ध्यान में रखते हुए श्रद्धा के बल पर साधना में आनेवाली बाधाओं पर उसी समय विजय प्राप्त करो !’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले (२२.५.२०२६)