सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के ४ दिव्य अंशों का रामनाथी (गोवा) स्थित सनातन संस्था के आश्रम में आगमन !

रामनाथी (गोवा) – ४ मई २०२६ के पवित्र दिन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के ४ दिव्य अंशों का रामनाथी (गोवा) स्थित सनातन संस्था के आश्रम में आगमन हुआ । श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी द्वारा लाए गए ४ शिवलिंगों का साधकों ने भोलेनाथ के जयघोष एवं वेदमंत्रोच्चार के साथ भावपूर्ण स्वागत किया । इस समय श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी ने शिवलिंगों का पूजन एवं औक्षण किया । इसके उपरांत श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के ४ दिव्य अंश श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी को सौंप दिए । ज्योतिर्लिंगों का पूजन होने के पश्चात उनमें जडत्व अर्थात चैतन्य आने का अनुभव श्रीचित्शक्ति श्रीमती गाडगीळजी को हुआ, वहीं उस समय ग्रीष्म ऋतु होने पर भी वातावरण में प्रत्यक्ष रूप से शीतलता अनुभव हो रही थी । इसके उपरांत सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने अपने निवास कक्ष में ही सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के ४ दिव्य अंशों के दर्शन लिए ।
२ अप्रैल २०२६ के दिन का एक विशेष महत्त्व !
मूर्तिभंजक महमूद गजनवी सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को तोडकर अनेक दिनों की यात्रा के पश्चात गजनी पहुंचा, वह दिन था १ अप्रैल १०२६ । ठीक १००० वर्ष उपरांत अर्थात २ अप्रैल २०२६ के दिन सनातन संस्था को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दिव्य अंश प्राप्त हुए । स्वयं शिवशंकर ने ही यह दिन चुना था, इसमें कोई संशय नहीं ! – श्री. विनायक शानभाग
तंजावुर स्थित वेदप्रचाररत्न वेदकुलपति जी.के. सीतारामन् गुरुजी ने मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दिव्य अंशों में से ४ दिव्य अंश सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के धर्मसंस्थापना के कार्य हेतु किए अर्पित !
भगवान सोमनाथ महादेव के उदय की कथा

‘दक्ष प्रजापति की अश्विनी सहित २७ कन्याएं थीं । उनका विवाह अत्रि और अनसूया के पुत्र सोम (चंद्र) से हुआ । उन २७ कन्याओं में रोहिणी सबसे सुंदर थी । सोम का उस पर विशेष स्नेह था । इससे ईर्ष्या कर अन्य सपत्नियों ने सोम के विषय में अपने पिता दक्ष से शिकायत की । दक्ष ने सोम को समझाने का प्रयास किया; परंतु उसका कोई लाभ नहीं हुआ । बार-बार शिकायतें सुनकर क्रोधित हुए दक्ष ने सोम को क्षयरोग का शाप दे दिया । परिणामस्वरूप सोम का स्वास्थ्य गिरने लगा । संपूर्ण प्रकृति में उसके दुष्परिणाम दिखाई देने लगे । तब सभी देवताओं ने सोम को शापमुक्त करने की विनती की । दक्ष ने उनकी विनती अस्वीकार करते हुए कहा, ‘प्रभास में सरस्वती नदी का समुद्र से संगम हुआ है ।
‘वहां जाकर सोम (चंद्रमा) भगवान शिव की आराधना और तपस्या करें ।’ उसी के अनुसार सोम ने प्रभास में लंबे समय तक शिव की आराधना की । इससे भगवान शिव प्रसन्न हुए । उन्होंने सोम को एक वरदान दिया, ‘शुक्ल पक्ष में सोम की वृद्धि होगी और वह प्रकाशमान रहेगा ।’ इस प्रकार प्रभास में सोम को अपना तेज (भास) वापस मिला । इसलिए उस स्थान को ‘प्रभास’ के नाम से जाना जाता है । इस स्थान पर सोम ने एक मंदिर बनाकर ज्योतिर्मय लिंग की स्थापना की ।
स्कंद पुराण के प्रभास खंड की जानकारी के अनुसार, सोम को यह स्पर्शलिंग समुद्र से प्राप्त हुआ था । स्पर्शलिंग का वर्णन इस प्रकार है –
सूर्यबिम्बसमप्राख्यं सर्पमेखलमण्डितम् ।
कुक्कुटाण्डसमानं तद् भूमिमध्ये व्यवस्थितम् ।।
– स्कन्दपुराण, प्रभासखण्ड, अध्याय २१, श्लोक ८२
अर्थ : यह लिंग चारों ओर से सर्पों से घिरा हुआ तथा सूर्यबिंब के समान अत्यंत तेजस्वी था । वह मुर्गी के अंडे के आकार का था और भूमि के मध्य स्थित था। (साभार : ‘प्रभासतीर्थ दर्शन सोमनाथ’ ग्रंथ से)
१. महमूद गजनवी द्वारा टुकडे किए गए सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अंशों को श्रद्धालु पुजारियों द्वारा १ हजार वर्षों तक सहेजकर रखना
भारत के पवित्र १२ ज्योतिर्लिंगों में गुजरात का सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पहला शिवलिंग माना जाता है । चंद्रमा द्वारा स्थापित इस दैवीय शिवलिंग की विशेषता यह थी कि यह भूमि से कुछ ऊंचाई पर हवा में (अधर में) था । इसमें अत्यधिक सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा थी, जिसका लाभ शिवभक्तों को मिलता था । वर्ष १०२६ में क्रूर आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने इस सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया । उसने मंदिर को नष्ट कर दिया और उसके भीतर के शिवलिंग के टुकडे-टुकडे कर दिए । कुछ श्रद्धालु पुजारियों ने उस खंडित शिवलिंग के अवशेषों में से कुछ अंशों को अत्यंत गुप्त रूप से सुरक्षित रख लिया । वे शिवलिंग के इन अंशों को टूटे हुए रूप में नहीं देख सकते थे, इसलिए उन्होंने उन अंशों को सामान्यतः शिवलिंग की तरह दिखनेवाला अंडाकार (लंबगोल) आकार दिया । इन्हीं श्रद्धालु पुजारियों ने १ हजार वर्षों तक समस्त भक्तों के आस्था के केंद्र इस शिवलिंग के दिव्य अंशों को एक गुप्त स्थान पर सुरक्षित रखा । उन्होंने समय आने पर अपने प्राणों की आहुति देकर भी इनकी रक्षा की । आगे चलकर उनकी प्रत्येक पीढी ने इसे संजोकर रखा और इस रहस्य को भी सदा बनाए रखा ।
२. कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वतीजी द्वारा १०० वर्षों तक ज्योतिर्लिंग के दिव्य अंशों को छिपाकर रखने का निर्देश देना
वर्ष १९२४ में कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वतीजी ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दिव्य अंशों को सुरक्षित रखनेवाले पुजारियों से कहा था, ‘इन दिव्य अंशों को १०० वर्षों तक बाहर (समाज में) न लाएं और किसी को भी इस बारे में न बताएं ।’ उनके उपरांत कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वतीजी ने कहा था, ‘पवित्र ज्योतिर्लिंग के आकार लिए हुए इन दैवीय अंशों के बारे में अयोध्या का श्रीराम मंदिर बन जाने के उपरांत विचार करेंगे ।’
३. जगद्गुरु शंकराचार्य श्री विजयेंद्र सरस्वतीजी द्वारा शिवलिंग के अंश श्री श्री रविशंकर को सौंपने का निर्देश और अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने के उपरांत दर्शन के लिए उपलब्ध होना
वर्तमान जगद्गुरु शंकराचार्य श्री विजयेंद्र सरस्वतीजी ने निर्देश दिया कि ‘शिवलिंग के इन अंशों को गुरुदेव श्री श्री रविशंकरजी (‘आर्ट ऑफ लिविंग’ संस्था के संस्थापक) को सौंप दिया जाए ।’ उसी के अनुसार, श्रद्धालु पुजारियों के परिवार के अग्निहोत्री श्री सीतारामन् गुरुजी ने इस ज्योतिर्लिंग के कुछ दैवीय अंश गुरुदेव श्री श्री रविशंकरजी को सौंप दिए । जगद्गुरु शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वतीजी के संकल्प के अनुसार, ठीक १०० वर्ष उपरांत वैसा ही हुआ जैसा उन्होंने कहा था । ज्योतिर्लिंग के इन अंशों में इतनी अधिक ऊर्जा है कि इनके कारण चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) निर्मित हो गया है । श्री श्री रविशंकरजी ने ज्योतिर्लिंग के इन दिव्य अंशों के आध्यात्मिक महत्त्व और सामर्थ्य को पहचाना । उन्होंने वर्ष २०२५ में महाशिवरात्रि के अवसर पर इन दिव्य अंशों का अभिषेक किया और इन्हें भक्तों के दर्शन के लिए उपलब्ध कराया ।
– श्री. विनायक शानभाग, कांचीपुरम्, चेन्नई, तमिलनाडु. (१२.५.२०२६)
FSSAI Notice : खाद्य पदार्थों की बिक्री हेतु भ्रामक दावे : ८ संस्थानों को नोटिस
Ayush Malik Conversion : भागे हुए आरोपी तौफिक को बंदी बनाया ।
Gorakhpur Cyber Scam : ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर वृद्ध की ५ लाख रुपये की ठगी
विशेष न्यायालय ने पुलिस उपाधीक्षक की जमानत याचिका अस्वीकार कर दी !
तुलजापुर के छत्रपति संभाजी महाराज बसस्थानक (पुराना) में असुविधाओं के कारण यात्रियों को कष्ट ।
बाबर, अकबर, हुमायूं आदि आक्रमणकारियों का संग्रहालय बनाकर उनके अत्याचारों को प्रदर्शित किया जाए । – Sangeet Singh Som