भारत में कानून की धार में तीक्ष्णता नहीं रही ; जब तक हाथ-पैर तोडे नहीं जाएंगे तब तक लोग कानून का पालन नहीं करेंगे !– Karnataka High Court

अरब देशों की कठोर दण्डनीतियों पर कर्नाटक उच्च न्यायालय का निवेदन I

बेंगलुरु (कर्नाटक) — कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बलात्कार के आरोप में अभियुक्त २३ वर्षीय अभियान्त्रिकी छात्रा की प्रतिभूति याचिका निरस्त कर दी । इस अवसर पर न्यायालय ने कहा कि भारत में कानून की धार इसलिए कम हो गई है क्योंकि हम अपराधियों के साथ कडी कार्रवाई नहीं करते जिसके फलस्वरूप अपराध करना अत्यंत सरल हो गया है । यदि किसी का हाथ या पैर तोड दिया जाए तो सम्भवतः लोग कानून का पालन करना सीखें; क्योंकि यहां लोकतंत्र है एवं प्रत्येक नागरिक इसका दुरुपयोग करता है ।

उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. नटराज ने अरब देशों की कठोर दण्डनीतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लोग कानून का पालन करते हैं क्योंकि उन्हें ज्ञात होता है कि उन्हें किस प्रकार का दंड प्राप्त हो सकता है; परन्तु अब भारत में लोगों में कानून का भय शेष नहीं रहा । आज अपराध इस तरह हो रहे हैं मानो वे सामान्य क्रियाएं हों ।

“नमक खाया तो पानी भी पीना पडेगा”

(‘नमक खाया तो पानी भी पीना पडेगा’ का अर्थ: अनुचित कृत्य किया तो उसके परिणाम भी भोगने होंगे)

आरोपी छात्र अप्रैल २०२६ के प्रारंभ से न्यायिक कारावास में है । न्यायालय ने उसके प्रतिभूति निर्गमन के सम्बन्ध में आगे कहा कि यदि तुमने नमक खाया है तो तुम्हें पानी भी पीना होगा । उसे अभी ४ -५ दिन और कारागृह में रखा जाए । उसे कारागृह का अभ्यास हो जाने दीजिए । किसे ज्ञात है कि दंड मिलने पर भी पुन: कारागृह जाना पड जाए।

युवती ने लगाया था यौन शोषण का आरोप

आरोपी एवं पीडिता दोनों ‘मणिपाल संस्थान प्रौद्योगिकी’ के छात्र थे एवं वे परस्पर पूर्व परिचित थे । उनके मध्य पूर्व में सम्बन्ध भी थे; परन्तु उसके उपरांत युवती अभियुक्त से दूरी रखने लगी । आरोप के अनुसार सितंबर २०२३ में अभियुक्त ने वार्तालाप का मिथ्या कारण बताकर युवती को एक घर में बुलाया । वहां उसने युवती का यौन शोषण किया । पीडिता ने तत्पश्चात् राष्ट्रीय महिला आयोग से संपर्क किया । उसके उपरांत पुलिस में औपचारिक परिवाद प्रविष्ट करवाया गया । उच्च न्यायालय ने इस विषय में राज्य सरकार को ज्ञापन भेजा है एवं आगामी सुनवाई ८ जून को निर्धारित की गई है ।

संपादकीय भूमिका

जनता की अपेक्षा है कि बलात्कार करने वाले कट्टर मुसलमानों को इसी प्रकार का दण्ड दिया जाए । अब उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा मत व्यक्त किया जाना, यह सूचित करता है कि पुलिस की कानून-व्यवस्था पर पकड ढीली पड गई है ।