‘बकरीद’ तथा उर्स के अवसर पर विशाळगढ पर पशुओं की बलि देने के लिए न्यायालय की अनुमति !

(‘उर्स’ अर्थात किसी मुसलमान धर्मगुरु की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित उत्सव)

कोल्हापुर, २८ मई (वार्ता) – पुरातत्व विभाग तथा प्रशासन ने विशाळगढ पर उर्स’ एवं ‘बकरीद’ की पृष्ठभूमि पर पशुओं की बलि देने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था । इसके विरोध में विशाळगढ के ‘दरगाह ट्रस्टी’ ने ‘सर्किट बेंच’ (न्यायालय का एक अस्थायी स्थान, जहां उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति निश्चित कालावधि में आकर अभियोग चलाते हैं) में याचिका प्रविष्ट (दायर) की थी । न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोसले के समक्ष हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति ने वर्ष २०२४ को मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को यथावत रखते हुए ‘बकरीद’ तथा ‘उर्स’ के अवसर पर पशुओं की बलि देने की अनुमति दी । बलि देने के पश्चात मांस, साथ ही उससे उत्पन्न होने वाले पदार्थों का योग्य निपटारा करने की सतर्कता बरतें, ऐसा भी उस आदेश में उल्लेखित किया गया है । इस संदर्भ में मूल याचिका अभी भी प्रलंबित है एवं उस पर आगामी सुनवाई ८ जून को होगी, ऐसा न्यायालय ने घोषित किया ।

न्यायमुर्ति द्वारा निर्णय देने पर वहां उपस्थित एक शासकीय अधिकारी ने दरगाह ट्रस्ट के कुछ सदस्यों के साथ न्यायालय में ही विजय प्राप्त होने के भाव में हाथ मिलाया । सरकार पक्ष यदि ‘दरगाह ट्रस्टी’ के विरोध में लड रहा है, तो सरकारी अधिकारियों ने दरगाह ट्रस्ट के कुछ सदस्यों के साथ हाथ कैसे मिलाया? ऐसा प्रश्न इस निमित्त उपस्थित हो रहा है ।

इस याचिका में सरकार पक्ष की ओर से सरकारी अधिवक्ता शुभांगी देशमुख ने प्रत्यक्ष, तो मुंबई से अधिवक्ता नेहा भिडे ने ‘ऑनलाइन’ सरकार पक्ष का पक्ष रखा । इस सुनवाई के लिए ‘दरगाह ट्रस्टी’ के संचालक प्रतिनिधि, शाहूवाडी तहसीलदार सीमा सोनवणे, पुलिस निरीक्षक राजेंद्र सावंत्रे, साथ ही हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के प्रतिनिधि के रूप में हिन्दू एकता आंदोलन के जिलाध्यक्ष श्री. दीपक देसाई उपस्थित थे ।

सरकार पक्ष की ओर से तर्क (बहस) में उपस्थित किए गए कुछ सूत्र (बिंदु):

१. विशाळगढ परिसर में वहां के अतिक्रमणों के कारण इससे पूर्व दंगा हुआ है, साथ ही कानून-व्यवस्था का प्रश्न निर्माण हुआ है ।

२. विशाळगढ यह पुरातत्व नियम १९६२ के अंतर्गत धारा ८ (सी) के अनुसार स्मारक परिसर में भोजन पकाने पर प्रतिबंध है तथा उच्च न्यायालय के आदेशानुसार सार्वजनिक स्थान पर पशुबलि देने पर रोक है । कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए २७ मई से १ जून २०२६ तक गढ पर कडा पुलिस व्यवस्था तैनात किया गया है ।

३. विशाळगढ पर पशुबलि देने की अनुमति दी गई, तो गंभीर परिस्थिति निर्माण हो सकती है । सामाजिक माध्यमों (सोशल मीडिया) पर ‘रेहान मलिक के नाम पर आयोजित किए जाने वाले उर्स को अनुमति दें’ इस आशय की पोस्ट प्रसारित हो रही हैं । इस उर्स को मनाने का हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों ने विरोध किया है ।

४. गट (गट क्रमांक) १९ यह वधशाला (कसाईखाना) नहीं है । इसलिए वहां पशुबलि देने पर उससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं निर्माण हो सकती हैं, उनके पास वहां स्वच्छता रखने के लिए कोई सामग्री नहीं है, व्यवस्था नहीं है ।

५. यद्यपि गट क्रमांक १९ यह निजी भूमि है, फिर भी यह गढ पुरातत्व विभाग के अंतर्गत आता है, साथ ही वन विभाग के भी नियंत्रण में आता है ।

सुनवाई के समय न्यायमूर्ति द्वारा उपस्थित किए गए कुछ सूत्र (बिंदु):

१. यदि गट क्रमांक १९ में कुछ अनुचित घटित हो रहा है, वह वधशाला नहीं है, साथ ही उस स्थान पर योग्य कृत्य नहीं हो रहा है, ऐसा सरकार पक्ष का कहना है, तो अभी तक इस संदर्भ में सरकार पक्ष ने उस पर क्या कार्रवाई की ?

२. ३ जून २०२५ के पश्चात विशाळगढ परिसर में कानून-व्यवस्था का प्रश्न निर्माण करने वाली कोई घटना घटित हुई है क्या ?