भारतीय श्रमिकों को अपराधी प्रवृत्ति का बताकर विपक्ष का आरोप

ताइपेई (ताइवान) — ताइवान में स्थानीय चुनावों के समय भारतीय श्रमिकों को बाहर निकालने का विषय उठाकर उनका विरोध किया जा रहा है । एक निर्दलीय उम्मीदवार ने भारत-विरोधी पोस्टर भी लगाए हैं । इनमें पगडी पहने एक सिख व्यक्ति की तस्वीर पर बडे अक्षरों में ‘NO’ अर्थात प्रतिबंध का चिन्ह बनाया गया था । ऐसे पोस्टरों के माध्यम से भारत से आनेवाले प्रवासी मजदूरों का विरोध करने एवं उन्हें देश से बाहर निकालने की मांग की जा रही है । ताइवान भारत के साथ हुए श्रमिक सहयोग समझौते के अंतर्गत भारतीय श्रमिकों को बुलाने की तैयारी कर रहा है । ऐसे समय में यह विवाद सामने आने से इसे गंभीरता से देखा जा रहा है । इस समझौते के अनुसार लगभग १ सहस्र भारतीय मजदूर इस वर्ष के अंत तक ताइवान पहुंचेंगे । इसके उपरांत यदि व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रही एवं उद्योगों की मांग बढी, तो यह संख्या आगे बढाई जा सकती है ।
१. ताइवान कई वर्षों से श्रमिक संकट का सामना कर रहा है । वहां जन्मदर लगातार घट रही है, जनसंख्या वृद्ध हो रही है तथा युवाओं की संख्या कम होती जा रही है । इसका प्रभाव विशेष रूप से कारखानों, कृषि, निर्माण कार्य और वृद्धों की देखभाल जैसे क्षेत्रों पर पड रहा है । इसी कारण ताइवान लंबे समय से इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलीपींस evam थाईलैंड जैसे अन्य एशियाई देशों से मजदूर बुलाता रहा है । अब उसने भारत को भी इस सूची में सम्मिलित करने का निर्णय लिया है ।
२. ताइवान की विपक्षी पार्टी कुओमिनतांग भारतीय मजदूरों को बुलाने का विरोध कर रही है । सांसद हुआंग चिएन-पिन ने भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकडों का विवरण दिया । उन्होंने संसद में कहा था कि भारत में वर्ष २०२२ में महिलाओं के विरुद्ध ४ लाख ४५ सहस्र से अधिक अपराध प्रविष्ट किए गए थे, जिनमें ३१ सहस्र से अधिक बलात्कार की घटनाएं सम्मिलित थीं । ऐसी स्थिति में भारतीय मजदूरों की अधिक कठोर जांच एवं निगरानी की जानी चाहिए । भारतीय मजदूर यहां महिलाओं के साथ बलात्कार कर सकते हैं ।
३. ताइवान की स्थानीय राजनीतिक पार्टी न्यू पावर पार्टी के नेता वांग यी-हेंग ने इन पोस्टरों की आलोचना की । उन्होंने कहा कि भारतीय ध्वज एवं पगडी पर प्रतिबंध का चिन्ह लगाना अज्ञानता को दर्शाता है । पगडी केवल कपडा नहीं, अपितु श्रद्धा एवं सम्मान का प्रतीक है ।
यह नस्लभेद है ! — भारतीय
ताइवान में रहनेवाले एक भारतीय ने सामाजिक माध्यम पर इसे ‘नस्लीय भेदभाव’ बताया । उन्होंने कहा कि किसी नीति का विरोध करना अलग बात है; लेकिन किसी समुदाय की पहचान एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को लक्ष्य बनाना गलत है ।
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