
गोवा के अधिकांश मंदिर अन्य राज्यों के मंदिरों की तुलना में अत्यंत प्रशस्त एवं स्वच्छ हैं । गोवा के जो कुछ प्रसिद्ध देवस्थान हैं, उनका इतिहास भी रोमांचकारी है । पुर्तगालियों ने गोवा पर ४५० वर्ष राज्य किया । पुर्तगालियों का जब गोवा में प्रभाव जमना आरंभ हुआ, तब सर्वप्रथम उन्होंने हिन्दुओं के मंदिरों को तोडना प्रारंभ किया । उस समय तिसबाडी (पणजी एवं परिसर) तहसील में स्थित मंदिरों पर पहला प्रहार हुआ । पुर्तगालियों की यह क्रूरता देखकर अन्य स्थानों के हिन्दू श्रद्धालु सतर्क हो गए । उन्होंने नदियों को पार कर अपने-अपने मंदिरों के देवताओं की मूर्ति जहां पुर्तगालियों का शासन नहीं था, उन स्थानों पर स्थानांतरित की अथवा उस मूर्ति में विद्यमान देवत्व को किसी पत्थर अथवा धातु के द्वारा स्थानांतरित किया । कुछ लोगों ने मूर्तियों को कुओं में छिपाकर रखा तथा उसके उपरांत उचित समय पर सुरक्षित रूप से मंदिर बनाकर उनकी पुनर्स्थापना की । इस प्रकार स्थानांतरित मूर्तियों के लिए निर्मित ये अधिकांश मंदिर आज गर्व से खडे हैं ।

मंदिर परिसर में सभागार, महाजनों के रहने के लिए कक्ष, देवस्थान का कार्यालय, सामग्री रखने के लिए कक्ष, इस प्रकार का स्वरूप इन देवस्थानों को मिला । अर्थात देवस्थानों की इस समृद्धि के पीछे उन मंदिरों के महाजनों एवं सेवकों का बहुत बडा योगदान है । देवस्थानों को समृद्ध बनाने के साथ ही संबंधित देवस्थानों ने सभी परंपराओं एवं धार्मिक अनुष्ठानों का पालन कर मंदिर की पवित्रता भी बनाए रखी । जिस प्रकार महाराष्ट्र के देवस्थानों को आधुनिकतावादियों का दीमक लगने से कुछ परंपराओं एवं विधियों का त्याग करना पडा, वैसी स्थिति गोवा के देवस्थानों पर अभी तक नहीं आई है ।
यहां कुछ ऐसे देवस्थान हैं, जहां २ समुदायों के मध्य मान-अपमान के कारण विवाद हैं । ‘देवता की पालकी विधि अथवा अन्य कुछ सेवाएं करने का सम्मान मिले’, ऐसा किसी को लगना स्वाभाविक है; परंतु ‘यह सम्मान मिलना हमारा अधिकार है’, ऐसा लगना अहंकार है । इस कारण यदि २ समुदायों में झगडा होने की स्थिति आती है, तो उसे टालना चाहिए । कुछ स्थानों पर तो ऐसे कुछ झगडों के कारण देवता की पारंपरिक विधि भी बंद हो गई है । ऐसी स्थिति में विचार करना चाहिए कि क्या यह ईश्वर को अच्छा लगेगा ?

वर्तमान में देवस्थानों का वैभव देखकर आगे जाकर गोवा की नई देवस्थान समितियों को क्या करना चाहिए ?, इस विषय पर राज्य के कुछ मान्यवरों ने अपने मत रखे हैं । उनमें ‘मठ एवं मंदिर लुटेरे हैं । मैं उन्हें पैसा नहीं देता’, ऐसा बोलनेवाले दत्ता दामोदर नायक भी इसमें पीछे नहीं हैं । वे कहते हैं, ‘‘देवस्थान समितियां बहुत बडा समाजकार्य कर सकती हैं । उन्हें विद्यालय-महाविद्यालय खोलने चाहिए तथा गांव-गांव में श्मशान घाट बनाने चाहिए ।’ यदि दत्ता नायक मंदिरों को पैसा नहीं देते हैं, तो उन मंदिरों को धन का उपयोग कैसे करना चाहिए ?, यह भी वे क्यों बता रहे हैं ?
देवस्थानों को भक्तों से अर्पण मिलता है । देवता को दान के रूप में अर्पण देने से अर्पणदाताओं को कुछ अनुभूतियां होती हैं । उसके कारण महाजन, कुल अथवा भक्त नियमितरूप से दान देते हैं । देवस्थानों में जमा होनेवाला धन भक्तों अथवा महाजनों द्वारा स्वयं अर्पित किया होता है; इसलिए दत्ता नायक द्वारा मठ एवं मंदिरों को ‘लुटेरे’ बोलना उनका अज्ञान दर्शाता है । पूरे वर्ष धार्मिक अनुष्ठानों, पुजारियों के मानदेय, बिजली-पानी का देयक, स्वच्छता, रंगकाम आदि कार्याें के लिए खर्च करना पडता है । वर्तमान समय की आवश्यकता को देखा जाए, तो देवस्थान धर्मशिक्षा के केंद्र बनने चाहिए । वर्तमान में हिन्दू समाज अपनी संस्कृति, धर्माचरण, वेदों की शिक्षा आदि धर्मशिक्षा से वंचित है । इस कारण हिन्दू शास्त्र के अनुसार त्योहार-उत्सव भी नहीं मनाते । अत: आज त्योहार-उत्सवों में अप्रिय घटनाओं का प्रवेश हुआ है । वर्तमान में अधिकांश समाज एवं भावी पीढी संतों के महान विचारों, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं श्रीकृष्ण की प्रेरणादायक कथाओं से पूर्णतः वंचित है । देवस्थान समाज को धर्मशिक्षा देने के लिए आगे आएं, तो उससे समाज धर्मशिक्षित होगा तथा साधना भी करने लगेगा ।
मंदिर शैक्षिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक केंद्र हैं !

गोवा में पहले भव्य-दिव्य मंदिर संस्कृति थी । ये मंदिर मराठी शिक्षा एवं संस्कृति के केंद्र थे । इन मंदिरों के माध्यम से गोवा राज्य भारतीय संस्कृति के साथ जुड गया । पुर्तगालियों ने इसे भांपकर हिन्दुओं की संस्कृति नष्ट करने के उद्देश्य से पहले मराठी भाषा में मिलनेवाली शिक्षा बंद की तथा उसके पश्चात मंदिर नष्ट किए । मंदिर तो शैक्षिक, सामाजिक एवं अध्यात्म के केंद्र हैं । मंदिरों में पहले विद्यालय चलते थे, वहां भजन, कीर्तन, पूजा-अर्चना होती थी । उसके कारण हिन्दू बच्चे बचपन से ही मंदिरों के साथ जुड जाते थे । मंदिर प्राचीन संस्था है, जिसमें भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का दर्शन होता है । मुखमंडप, सभामंडप, गर्भगृह एवं शिखर, इस प्रकार मंदिर की रचना होती है । इस रचना की मनुष्य के शरीर की रचना के साथ समानता होती है । मंदिर में स्थित मूर्ति अर्थात साक्षात् परमात्मा एवं मनुष्य की आत्मा का संबंध है ! – श्रीमती शेफाली वैद्य, ‘सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर’ तथा प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ
मंदिर जानेवाले हिन्दुओ, क्या आपके मन में ये प्रश्न उठते हैं ?
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