सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ‘इदं न मम ।’, इस लेखन का अध्यात्मशास्त्रीय विश्लेषण !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का लेखन  

१ अ. इदं न मम ।’ : ‘सूक्ष्म ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों को विभिन्न विषयों पर सूक्ष्म से प्राप्त हुआ ज्ञान, साथ ही विभिन्न ग्रंथों से लिया गया लेखन’, इनके कारण मेरे द्वारा ग्रंथलेखन होता है । श्रीमती अंजली गाडगीळजी (वर्तमान में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी) संगीत से संबंधित लेखन करती हैं, जबकि कला एवं अक्षर से संबंधित लेख श्रीमती जान्हवी शिंदे लिखती हैं । इसमें मेरा कुछ नहीं है ।
इदं न मम ।’ (अर्थात ‘यह मेरा नहीं है’)  (१२.२.२००७)

२. उक्त लेखन का अध्यात्मशास्त्रीय विश्लेषण !

श्री. राम होनप

२ अ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीे का ज्ञानकार्य : वर्तमान कलियुग में सर्वत्र रज-तम एवं अनिष्ट शक्तियों का प्रभाव अधिक है । सामान्य समाज की सात्त्विकता अल्प हुई है । उसके कारण समाजमानस पर सरल एवं अध्यात्मशास्त्रीय भाषा में साधना एवं धर्माचरण का महत्त्व अंकित करना महत्त्वपूर्ण है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी का ज्ञान के द्वारा सनातन धर्म को टिकाए रखने का कार्य अवतारी स्वरूप का
है । उनके इस आध्यात्मिक कार्य का लाभ वर्तमान एवं अगली पीढियों को ही होनेवाला है । यह ज्ञान दीर्घकाल तक टिका रहनेवाला है ।

२ आ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीे के संकल्प के कारण अनेक साधकों को ग्रंथलेखन की प्रेरणा मिलना तथा उससे साधकों की व्यष्टि साधना के साथ समष्टि साधना भी प्रभावकारी पद्धति से होना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के ज्ञानकार्य के संकल्प के कारण कुछ साधकों को सूक्ष्म से विभिन्न विषयों का ज्ञान मिलता है, साथ ही कुछ साधकों को नवीनतापूर्ण विषयों का लेखन सूझता है । यह कार्य करने हेतु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी साधकों को दिशा एवं शक्ति प्रदान करते हैं । इस प्रक्रिया से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी ऐसे साधकों की आध्यात्मिक क्षमता बढाकर उनकी आध्यात्मिक प्रगति करवा लेते हैं । उसके कारण उन साधकों की व्यष्टि साधना के साथ समष्टि साधना भी प्रभावकारी पद्धति से होती है ।

२ इ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजीे की अहंरहित अवस्था के कारण उनके द्वारा ज्ञानकार्य का श्रेय साधकों को दिया जाना : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के आशीर्वाद से कुछ साधकों द्वारा ज्ञानकार्य हो रहा है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी में ‘सबकुछ तो ईश्वर करते हैं’, इसका भान है तथा उनकी अवस्था अहंरहित है । जिस कारण सबकुछ सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के कारण होते हुए भी वे इस ज्ञानकार्य का श्रेय ज्ञानकार्य करनेवाले कुछ साधकों को देते हैं । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी की अहंरहित अवस्था के कारण उनके मन में ‘इदं न मम ।’ (अर्थात ‘यह मेरा नहीं है’), यह विचार आता
है । उसके कारण सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी का ज्ञानकार्य एवं उसकी प्रभावकारिता अनेक गुना बढ जाती है ।’

– श्री. राम होनप (सूक्ष्म से ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधक), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (ज्ञानप्राप्ति का दिनांक : ४.२.२०२६)

सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।