
‘मैंने वर्ष १९८२ तक सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ के रूप में व्यवसाय और शोध किया । वर्ष १९८३ से १९८६ के दौरान विभिन्न संतों के पास जाने पर अध्यात्म, संत, यह सब सत्य है, इसका मुझे विश्वास हो गया ।
१. वर्ष १९८७ से १९९१ (कर्मयोग, स्थूल देह से सेवा करने से देहबुद्धि का क्षय)
प.पू. भक्तराज महाराजजी (प.पू. बाबा) ने वर्ष १९८७ में गुरुमंत्र दिया, जिसके उपरांत मैंने साधना के लिए वास्तविक प्रयास प्रारंभ किए । उस समय मैं सभी भंडारों में जाकर सेवा करता था तथा बाबा के साथ अनेक स्थानों की यात्राएं भी करता था । जो कुछ करता था, उसके अलग फल की अपेक्षा नहीं रहती थी; क्योंकि सेवा से ही आनंद प्राप्त होता था ।
२. वर्ष १९९२ से २००८ (ज्ञानयोग, अध्यात्म का अध्ययन करने से बुद्धि सात्त्विक होना)
इस काल में (यद्यपि वर्ष १९९५ में बाबा ने देहत्याग किया, तथापि वे सूक्ष्म रूप से मार्गदर्शन करते रहे) मैंने उनसे सहस्रों प्रश्न पूछकर शंकाओं का समाधान किया । ‘प.पू. भक्तराज महाराजजी की सीख’ नामक ग्रंथ उनके द्वारा दिए गए ज्ञान पर आधारित है । इस समय अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया और ध्यान के माध्यम से भी अनेक बातें जानीं ।
३. वर्ष २००९ से आज तक (भक्तियोग, मन से भक्ति करने पर मन का सात्त्विक होना और भाव जागृत होना)
प.पू. भक्तराज महाराजजी के प्रति जो कृतज्ञता का भाव था, वह प.पू. दादाजी वैशंपायनजी और गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी जैसे संतों के मार्गदर्शन से और अधिक व्यापक हुआ । मेरे बडे भाई डॉ. वसंत आठवले (सद्गुरु वसंत आठवलेजी) के भक्तियोग विषय पर अप्रकाशित ग्रंथों के अध्ययन से इस प्रक्रिया को और गति मिली । इससे कर्मयोग और ज्ञानयोग की सीमाएं समझ में आईं और भक्तियोग के प्रति रुचि उत्पन्न हुई । भक्तियोग के अनुसार साधना करने से अधिक और भिन्न प्रकार का आनंद अनुभव हुआ । ऐसा भी लगा कि प्रारंभ से ही भक्तियोग का मार्ग अपनाना चाहिए था ।
४. अब तक की यात्रा का चिंतन इससे यह अनुभूति हुई कि जो हुआ, वह उचित ही हुआ ।
अ. यदि कर्मयोग और ज्ञानयोग का अध्ययन नहीं किया होता, तो भक्तियोग का महत्त्व समझ में नहीं आता ।
आ. समष्टि साधना के लिए अर्थात समाज में धर्मप्रसार हेतु तीनों योगमार्गों का ज्ञान आवश्यक है । मेरे साधनामार्ग के कारण यह स्वाभाविक रूप से संभव हो गया ।
इ. यह संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा गुरु की इच्छा से ही हुई है; क्योंकि उन्होंने कहा था, अध्यात्म का प्रसार करो ।
५. आगे की आध्यात्मिक यात्रा : आगे की यात्रा भी गुरु की इच्छा के अनुसार ही होगी ।
६. गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करने से कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग, इस क्रम में हुई साधकों की यात्रा
मेरी आध्यात्मिक यात्रा के अनुरूप ही साधकों की भी यात्रा हुई है और हो रही है ।
६ अ. कर्मयोग : अध्यात्म का प्रसार करना, सत्संग लेना, ग्रंथ-प्रदर्शनी लगाना, मंदिरों की स्वच्छता करना, ऐसी अनेक सेवाएं साधक वर्षों से कर रहे हैं ।
६ आ. ज्ञानयोग : अध्यात्म संबंधी ग्रंथों का अध्ययन, विशेषकर सनातन के ग्रंथों का तथा उसमें दिए ज्ञान को आचरण में लाना, यह साधकों के जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग बन गया है ।
६ इ. भक्तियोग : वर्ष २००९ से अनेक साधकों ने भावजागृति के प्रयास प्रारंभ किए हैं । वर्ष २०१० से अनेक साधकों को भावजागृति और श्रीकृष्ण के विभिन्न अनुभव होने लगे हैं ।
– डॉ. आठवले
(और इनकी सुनिए…) ‘कुंकुम इस्लामी देशों से आता है, तो क्या फिर हिन्दु तिलक लगाना बंद कर देंगे ?’ – Priyank Kharge
(और इनकी सुनिए…) ‘ वर्तमान काल में वैकुंठगमन इत्यादि कहना मुझे स्वीकार्य नहीं है, यह विशिष्ट वर्ग द्वारा थोपी गई बातें हैं । ’- Sharad Pawar
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
अपनी सहज बातचीत एवं सरल व्यवहार से भक्तों को सिखानेवाले प.पू. भक्तराज महाराजजी !
नादानुसंधाननादानुसंधान
साधको, शब्दशक्ति के माध्यम से संदेह फैलाने हेतु सक्रिय सातवें पाताल की बडी अनिष्ट शक्तियों की चाल पहचानकर साधना बढाओ !