‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ एवं ‘स्पिरिच्युअल साइन्स रिसर्च फाउंडेशन’ की ओर से दावोस (स्विट्जरलैंड) के ‘हाउस ऑफ पायोनियर्स’ में ‘भारतीय ज्ञानप्रणाली’ विषय पर शोधनिबंध का प्रस्तुतीकरण !
फोंडा (गोवा) – दावोस, स्विट्जरलैंड के ‘हाउस ऑफ पायोनियर्स’ में एक विश्व स्तरीय परिषद का आयोजन किया गया था । इस परिषद में ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के प्रतिनिधि उपस्थित थे । इस परिषद में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय को स्वास्थ्य, चैतन्य एवं मनुष्य कल्याण के सर्वांगीण (अर्थात केवल शारीरिक नहीं, अपितु मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तरों से संबंधित) दृष्टिकोण पर अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया था ।
‘हाउस ऑफ पायोनियर्स’ के ‘वर्ल्ड सिस्टमिक फोरम’ में ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ की ओर से श्री. शॉन क्लार्क (शोध समूह के सदस्य तथा ६७ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त साधक) एवं श्रीमती श्वेता क्लार्क ने समकालीन वैश्विक चुनौतियों की दृष्टि से ‘प्राचीन भारतीय ज्ञानप्रणालियों का महत्त्व’ विषय पर शोध निबंध प्रस्तुत किए ।उन्होंने इस परिषद में इस विषय के आध्यात्मिक शोध कार्य पर आधारित ३ प्रमुख सूत्र रखे ।

१. चिकित्सकीय उपचारों में आध्यात्मिक आयामों के समावेश की आवश्यकता !
आधुनिक चिकित्साशास्त्र किसी रोग की रोकथाम, निदान एवं उपचार करते समय उसके पीछे के आध्यात्मिक कारणों पर विचार नहीं करता । इस अत्यंत सूक्ष्म; परंतु मूलभूत पहलू की अनदेखी करने के कारण, चिकित्सकीय उपचार परिपूर्ण न होकर अधूरे रह जाते हैं ।
२. दैवी कण
दैवी कण अर्थात ‘सूक्ष्मतम सकारात्मक ऊर्जा के स्थूल रूप’ हैं । विज्ञान एवं तत्त्वज्ञान, इन विषयों के विशेषज्ञों से इस पहलू का सकारात्मक प्रत्युत्तर प्राप्त हुआ । इस अवसर पर उपस्थित मान्यवरों को दैवी कण दिखाए गए । इन मान्यवरों ने दैवी कणों के विषय में बहुत जिज्ञासा दिखाई तथा प्रश्न पूछकर अपनी शंकाओं का समाधान किया ।
| ‘हाउस ऑफ पायोनियर्स’ एक विश्व स्तरीय संगठन है तथा श्री. हांस मार्टिन हेयर्लिंग एवं श्री. हिमेश पटेल इस संगठन के संस्थापक हैं । यह संगठन वैश्विक स्तर पर मूल्य-आधारित (नैतिक) नेतृत्व एवं मानवता के कल्याण हेतु निरंतर दीर्घकालीन समाधान विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है । |
३. आध्यात्मिक स्तर पर व्यक्ति की चेतना शक्ति कैसे कार्य करती है ?
वर्तमान में आधुनिक विज्ञान केवल मस्तिष्क की गतिविधियां, तंत्रिका कोशिका एवं तंत्रिका के आवेग का अध्ययन करता है; परंतु इस शोध पद्धति की अनेक मर्यादाएं हैं । इस विषय में महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा किए गए शोध कार्य के अनुसार ‘व्यक्ति के मन के अधिकांश विचार, अनुभव एवं निर्णय लेने की प्रकिया मस्तिष्क की अपेक्षा उसके अतिसूक्ष्म अंतर्मन पर निर्भर होती है ।’ यह निष्कर्ष भारतीय ज्ञानप्रणालियों पर आधारित है । भारतीय ज्ञानप्रणाली के अनुसार मानवीय अनुभव एवं निर्णय लेने की प्रक्रिया मुख्य रूप से अवचेतन मन में घटित होती है, जो अत्यंत सूक्ष्म है । जब हम केवल मस्तिष्क का विचार करते हैं, तब हमारा दृष्टिकोण संकीर्ण होता है; परंतु जब हम आध्यात्मिक स्तर पर अवचेतन मन का अध्ययन करते हैं, तब मानवीय आचरण एवं चेतना को समझने की हमारी अपनी सीमाएं अधिक व्यापक एवं समृद्ध होती हैं ।
इन सत्रों की अवधि में ‘प्राचीन भारतीय ज्ञानप्रणाली किस प्रकार व्यक्ति के स्वास्थ्य, मानवीय चेतना, शाश्वत जीवनशैली एवं विकास में अनमोल योगदान दे सकती है ?’, इस विषय में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बहुत जिज्ञासा एवं रुचि दिखाई ।

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