संपादकीय : इच्छामृत्यु और जनहित !

मुंबई महानगरपालिका में इच्छामृत्यु के लिए ८५ आवेदन आने का समाचार हाल ही में प्रसारित हुआ है । मुंबई में पिछले कुछ महीनों से इच्छामृत्यु के लिए आनेवाले आवेदनों में वृद्धि हो रही है, ऐसा इस समाचार में उल्लेख किया गया है । विशेष बात यह है कि इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करनेवाले अधिकांश व्यक्तियों को किसी भी गंभीर प्रकार की बीमारी नहीं है; किन्तु भविष्य में ऐसे किसी रोग के उत्पन्न होने पर मृत्यु सुगम हो, इस भावना से अधिकांश लोगों ने ये आवेदन किए हैं । महाराष्ट्र के अन्य जिलों तथा भारत के विभिन्न राज्यों में इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करनेवालों के सटीक आंकडे उपलब्ध नहीं हैं; किन्तु मुंबई में जो स्थिति है, वैसी स्थिति कम-अधिक मात्रा में महाराष्ट्र व देश में भी होगी, इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता ।

२४ मार्च को हरीश राणा का दिल्ली के एक अस्पताल में इच्छामृत्यु के माध्यम से निधन हुआ । न्यायालय द्वारा इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई, यह भारत का पहला ही उदाहरण है । चंडीगढ में अपने घर की चौथी मंजिल से गिरने के कारण हरीश राणा के सिर में गंभीर चोट लगी थी और वे १३ वर्ष से कोमा (अचेत अवस्था) में थे । उपचार का कोई प्रतिसाद न मिलने और उनकी पीडा देख न पाने के कारण उनके पिता ने सर्वोच्च न्यायालय में इच्छामृत्यु के लिए याचिका प्रविष्ट की थी । सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें इसके लिए अनुमति प्रदान की । इसमें व्यक्ति के उपचार और भोजन बंद कर उसे मृत्यु की ओर ले जाया जाता है ।

हरीश राणा के समान असाध्य रोगों से पीडित व्यक्तियों द्वारा इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करना समझ में आता है; किन्तु किसी भी प्रकार की बीमारी न होने पर भी नागरिक यदि भविष्य के संभावित संकट की चिंता से इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करने लगे, तो सरकार को इस विषय में निश्चित ही एक नीति निर्धारित करनी होगी ।

जिस प्रकार भविष्य में दुर्घटना होने पर आर्थिक प्रावधान के रूप में जीवन बीमा लिया जाता है, उसी प्रकार रोगग्रस्त होने पर पीडा न सहनी पडे, इसके लिए पहले से ही उपाय करना, ऐसा इन लोगों का उद्देश्य प्रतीत होता है । इससे पहले वर्ष १९७३ में मुंबई के ‘केईएम’ अस्पताल में परिचारिका के रूप में कार्यरत अरुणा शानबाग के साथ एक सफाई कर्मचारी ने अत्याचार कर उन्हें मारने का प्रयास किया था । इस अत्याचार में उनके मस्तिष्क में अल्प रक्त प्रवाह होने से वे मरणासन्न स्थिति में चली गई थीं । लगभग ३६ वर्ष तक उनके इसी अवस्था में रहने के कारण उनकी सहेली पिंकी विराणी ने अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु की याचिका प्रविष्ट की थी; किंतु ‘केईएम’ अस्पताल में अरुणा शानबाग की अन्य सहकर्मियों ने बताया कि अरुणा उन्हें पहचानती हैं और प्रतिक्रिया भी देती हैं, उन्होंने उनकी देखभाल करने की भी तैयारी दर्शाई । इसलिए न्यायालय ने पिंकी विराणी की इच्छामृत्यु याचिका को अस्वीकार कर दिया था । आगे वर्ष २०१५ में अरुणा शानबाग का प्राकृतिक निधन हुआ ।

इस प्रकरण के उपरांत ही वास्तविक रूप से भारत में इच्छामृत्यु विषय पर पहली बार चर्चा प्रारंभ हुई थी । इसलिए भविष्य में इच्छामृत्यु के संबंध में आनेवाली याचिकाओं पर क्या निर्णय लिया जाए, इसकी स्पष्ट व्यवस्था होना आवश्यक था । वर्ष २००५ में ‘कॉमन कॉज’ नामक सामाजिक संस्था ने सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार के अंतर्गत इच्छामृत्यु को अनुमति देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका प्रविष्ट की थी । इस याचिका पर वर्ष २०१८ में न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय दिया । इसमें इंजेक्शन देकर जीवन समाप्त करनेवाली इच्छामृत्यु को न्यायालय ने अनुमति नहीं दी; किन्तु असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति का उपचार और भोजन बंद कर प्राकृतिक मृत्यु के समान इच्छामृत्यु की अनुमति दी है । हरीश राणा को इसी निर्णय के आधार पर इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई ।

कानून में नैतिकता का समावेश आवश्यक !

इच्छामृत्यु को अनुमति देते समय न्यायालय ने कुछ शर्तें और प्रतिबंध निर्धारित किए हैं । वर्तमान में संसद ने इस विषय में कोई कानून नहीं बनाया है, क्योंकि पूर्व में इसकी आवश्यकता ही अनुभव नहीं की गई; किन्तु वर्तमान में इच्छामृत्यु के लिए जिस प्रकार आवेदन आ रहे हैं, उनकी संख्या देखते हुए भविष्य में इस विषय पर मार्गदर्शक नीति निश्चित करनी ही पडेगी ।

इस विषय में वर्तमान संविधान पर आधारित कानून बनाने में सीमाएं आ सकती हैं, यह भी एक वास्तविकता है । जैसे कि हाल ही में न्यायालय द्वारा दिए गए एक निर्णय में यह कहा गया है कि विवाहित पुरुष का ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहना अपराध नहीं है । यह भले ही कानून की परिधि में आता हो, किन्तु नैतिकता की दृष्टि से उचित नहीं है ।

महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों में कुछ मंत्रियों और विधायकों के विवाहेत्तर संबंधों के प्रकरण तथा उनके वीडियो सामाजिक माध्यमों द्वारा प्रसारित हुए । वर्तमान कानून के अनुसार वे दंड के पात्र नहीं हैं । जिस समाज में वे बहुमत से निर्वाचित हुए हैं, उस समाज के सामाजिक मूल्यों और नैतिकता की रक्षा करना उनका कर्तव्य है; किन्तु कानून और नैतिकता ये दोनों भिन्न बातें हैं । वे हर बार समानांतर हों, ऐसा आवश्यक नहीं है । इसलिए जिस कानून के आधार पर न्याय दिया जाता है, वह कानून मूलतः नैतिकता के आधार पर होना, यही समाज व्यवस्था की दृष्टि से आवश्यक और हितकारी है । इसलिए इच्छामृत्यु का निर्णय भी केवल वर्तमान कानून की परिधि में देने के स्थान पर उसके नैतिक पक्ष अर्थात धर्मशास्त्र का विचार करना आवश्यक है । इस विषय में धर्मशास्त्र क्या कहता है, यह देखना महत्वपूर्ण है  ।

हिन्दू धर्मशास्त्र पर आधारित कानून आवश्यक !

वर्तमान न्याय व्यवस्था में ब्रिटिशकालीन कानूनों का संदर्भ तथा इंग्लैंड के निर्णयों का संदर्भ लिया जाता है; किन्तु हिन्दू धर्मशास्त्र का विचार नहीं किया जाता, यह दुर्भाग्यपूर्ण है । एक धर्मनिरपेक्ष देश की यह स्थिति केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं, समस्त मानवजाति के लिए हानिकारक है । महाभारत में कुरुसभा में एक हत्या के अपराध में निर्णय देते समय दुर्योधन ने चारों व्यक्तियों को मृत्युदंड की सजा दी; किन्तु युधिष्ठिर ने उन्हें उनके वर्ण के अनुसार दंड दिया । अर्थात अज्ञानी शूद्र की अपेक्षा ज्ञान होते हुए भी अपराध करनेवाले उच्च वर्ण के व्यक्तियों को अधिक दंड दिया गया । दंड व्यवस्था में यह सूक्ष्मता केवल हिन्दू धर्मशास्त्रों में ही देखने को मिलती है ।

मनुष्य जीवन का ईश्वरप्राप्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है । इसलिए इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय में न्याय देने के लिए धर्मशास्त्र का आधार लेना उचित होगा । यह केवल इच्छामृत्यु तक ही सीमित नहीं है, लिव-इन रिलेशनशिप हो, आत्महत्या हो अथवा विवाहेत्तर अनैतिक संबंध हों । वर्तमान कानून के अनुसार इनके सूक्ष्म विचार सीमित हैं, यह वास्तविकता है । इसलिए भविष्य में न्याय व्यवस्था हमारे प्राचीन और महान हिन्दू धर्मशास्त्रों पर आधारित होना आवश्यक है ।

जिस कानून के आधार पर न्याय दिया जाता है, वह कानून मूलतः नैतिकता के आधार पर हो, यही समाज व्यवस्था की दृष्टि से हितकारी है !