ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका के युद्ध में, ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (होर्मुज स्ट्रेट) बंद कर देने से विश्व में ईंधन संकट उत्पन्न हो गया है । खाडी क्षेत्र के सभी तेल उत्पादक इस्लामी देशों को जोडनेवाले इस जलडमरूमध्य से विश्वभर में पेट्रोल, डीजल, गैस आदि ईंधन ले जानेवाले जहाजों का आवागमन होता है । ईरान द्वारा केवल भारत के ईंधनवाहक जहाजों को सुरक्षित मार्ग देने की बात वैश्विक चर्चा का विषय बन गई है । ईरान ने केवल भारत को ही यह छूट क्यों दी ? इसका उत्तर इतिहास में निहित है । एक समय ‘आर्यावर्त’ कहलानेवाले सनातन भारत का ‘आर्याणा’, अर्थात वर्तमान ईरान से तेल से भी अधिक गहरा ‘आर्य’ संबंध है । यह कथन केवल भावनात्मक नहीं है, इसके पीछे हजारों वर्षों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत है । यह विरासत ‘आर्य’ शब्द के चारों ओर बुनी गई है । इसका विस्तार से वर्णन करनेवाला यह लेख प्रस्तुत है ।

१. ‘ईरान’ अर्थात आर्यों का देश !
आज जिस देश को हम ईरान के नाम से जानते हैं, उसका मूल नाम ‘आर्य’ शब्द से जुडा हुआ है । जोरोस्टर के काल से, विशेष रूप से प्राचीन ससानियन साम्राज्य के समय, ईरानी लोग अपने देश को ‘आर्याणा’, ‘ईरान’, ‘ईरानजमीन’ अथवा ‘ईरान शहर’ कहते थे । ‘ईरान’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ही ‘आर्यों की भूमि’ होता है । अथवाथवा
ईसा पूर्व ५वीं शताब्दी में साइरस महान (Cyrus the Great) ने ईरान के पार्स प्रदेश में पर्शियन (अकेमेनियन) साम्राज्य की स्थापना की । आगे चलकर लैटिन भाषा के प्रभाव से ‘पर्शिया’ शब्द प्रचलित हुआ । ‘पार्सा’ (पारसी) जाति जिस क्षेत्र में रहती थी, उसे आज ‘फार्स’ (फारस) अथवा ‘पार्स’ प्रांत कहा जाता है । भारतीय संस्कृति का आधार ‘ऋग्वेद’ तथा पारसी संस्कृति का ग्रंथ ‘अवेस्ता’ (Vendidad) में आश्चर्यजनक समानता मिलती है । ‘अवेस्ता’ का ‘ऐर्यानाम’ वैदिक देव ‘आर्यमन’ का ही प्रतिबिंब माना जाता है । दोनों ही परंपराओं में ‘आर्य’ शब्द का अर्थ ‘सभ्य’, ‘उदात्त’, ‘कुलीन’ अथवा ‘प्रतिष्ठित’ होता है ।
पारसी धर्म के पवित्र ग्रंथ ‘अवेस्ता’ में १६ श्रेष्ठ और पवित्र भूमियों (देशों) का उल्लेख है, जो आर्यों के मूल निवास से संबंधित मानी जाती हैं । इनमें पहली भूमि ‘आर्यानाम वैजह’ (Airyanam Waijah) कहलाती है, जिसका अर्थ ‘आर्यों का उद्गमस्थान’ अथवा ‘आर्यों की भूमि’ है । अन्य १५ आर्यभूमियों का वर्तमान भूगोल देखने पर उनमें भारत (आर्यावर्त), पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे मध्य एवं दक्षिण एशियाई देश सम्मिलित हैं । इससे स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक दृष्टि से भारत और ईरान की उत्पत्ति एक ही भौगोलिक परिधि के आसपास रही है ।
२. राजा दरायस का ऐतिहासिक घोषणापत्र
ईरान के ‘नक्श-ए-रुस्तम’ स्थल पर स्थित शिलालेख में राजा दरायस प्रथम (Darius I) ने अपनी पहचान इस प्रकार दी है । ‘‘मैं दरायस, महान राजा, राजाओं का राजा… एक पारसी, पारसी का पुत्र, एक आर्य, आर्यों के वंश का ।’’ यह शिलालेख यह सिद्ध करता है कि ‘आर्य’ पहचान कोई विदेशी अवधारणा नहीं, बल्कि ईरान की मूल सांस्कृतिक पहचान थी ।
३. प्राचीन व्यापार मार्ग
भारत और ईरान के बीच व्यापार केवल वस्तुओं का नहीं, अपितु संस्कृति का सेतु भी था ।
३ अ. रेशम मार्ग (Silk Road) : प्राचीन काल से ही ईरान रेशम मार्ग का एक प्रमुख केंद्र रहा है । भारतीय व्यापारी अफगानिस्तान के रास्ते ईरान पहुंचकर वहां से आगे यूरोप तक जाते थे ।
३ आ. समुद्री व्यापार : सिंध, गुजरात और कोंकण तट से पर्शियन खाडी के ‘हॉर्मुज’ (Hormuz) और ‘सिराफ’ (Siraf) बंदरगाहों तक भारत का व्यापक समुद्री व्यापार होता था ।
३ इ. चाबहार बंदरगाह द्वारा आधुनिक ‘रेशम मार्ग’ का पुनर्निर्माण : वर्तमान में भारत सरकार ईरान के चाबहार बंदरगाह को एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित कर रही है । यह प्राचीन रेशम मार्ग का आधुनिक पुनरुत्थान है । पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों तक सीधे व्यापार के लिए यह एक रणनीतिक परियोजना है । जिस प्रकार प्राचीन काल में भारतीय व्यापारी ईरान के माध्यम से यूरोप तक पहुंचते थे, उसी प्रकार आज यह मार्ग ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) का प्रमुख भाग बन रहा है । इस नए मार्ग से रूस और यूरोप तक पहुंचने में समय और लागत लगभग ४० प्रतिशत तक कम होने की संभावना है ।
यह बंदर केवल ईंधन अथवा वस्तुओं के आवागमन का केंद्र नहीं है, अपितु यह ‘आर्यावर्त’ और ‘आर्याणा’, इन दो प्राचीन संस्कृतियों को पुनः जोडनेवाला एक सशक्त आधुनिक सेतु बन रहा है ।
४. भारत-ईरान के बीच ‘आर्य’ संस्कृति का सनातन संबंध !

भारत और ईरान के बीच संबंध केवल ‘तेल’ तक सीमित नहीं था, यह ‘तारों’ और ‘खगोलीय गणित’ से भी जुडा था । ईरान पर लगभग वर्ष ६५१ के आसपास अरबियों का आक्रमण हुआ, जिससे वहां की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया; किन्तु उससे पूर्व की हजारों वर्षों की परंपरा दोनों देशों को एक सूत्र में बांधती है । आज भारत और ईरान के संबंध केवल भू-राजनीति अथवा ‘तेल के व्यापार’ तक सीमित नहीं हैं । यह संबंध ‘ऋग्वेद’ के सूक्तों से लेकर ‘अवेस्ता’ की गाथाओं तक तथा ‘आर्यावर्त’ से ‘आर्याणा’ तक फैले एक साझा सांस्कृतिक विरासत का परिणाम है । समय बदला, धर्म परिवर्तित हुए और सीमाएं भी बदलीं, फिर भी ‘आर्य’ शब्द से बुना यह संबंध आज भी उतना ही सुदृढ है ।
तेल आज की आवश्यकता हो सकती है; किन्तु ‘आर्य’ संस्कृति का संबंध सनातन है । वर्तमान अस्थिरता के समय में ईरान द्वारा भारत के जहाजों को दिया गया सुरक्षित मार्ग हो अथवा भारत द्वारा चाबहार में किया गया निवेश, ये सभी ‘तेल से भी अधिक घनिष्ठ’ इस सनातन संबंध के आधुनिक उदाहरण हैं ।
– श्री चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था (२४.३.२०२६)

तेल से भी अधिक सुदृढ संबंधों के कुछ उदाहरण
१. मौर्य साम्राज्य काल में (विशेषकर सम्राट चंद्रगुप्त और सम्राट अशोक के समय) भारत और पर्शिया के बीच राजनीतिक संबंध अपने चरम पर थे । दोनों साम्राज्यों ने एक-दूसरे के राजदरबार में राजदूत भेजे, जिससे प्रशासनिक प्रणालियों का भी आदान-प्रदान हुआ ।
२. केवल व्यापार और भाषा ही नहीं, अपितु संगीत पर भी इसका गहरा प्रभाव पडा । सितार वाद्य को अमीर खुसरो ने भारतीय वीणा और पर्शियन तंबूरा (पर्शियन में ‘तीन तारा’) के संयोग से विकसित किया । इस वाद्य में भारतीय और पर्शियन संगीत का सुंदर समन्वय दिखाई देता है ।
३. भारत के प्राचीन ग्रंथों में ‘मग’ अथवा ‘शाकद्वीपी’ ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है । ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार ये मूलतः पर्शिया के ‘मगी’ पुरोहित थे । उन्होंने सूर्य उपासना और ‘सौर सिद्धांत’ का व्यापक प्रचार किया । आज भी ईरान में उत्पन्न पारसी धर्म में ‘सूर्य’ को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है । पारसी लोग सूर्य को ‘मिथ्र’ (Mithra) कहते हैं (संस्कृत में सूर्य का एक नाम ‘मित्र’ है) ।
प्राचीन पर्शियन खगोलशास्त्र में ग्रहों की स्थिति के आधार पर ‘ज़ीज़’ (Zij) नामक सारणी बनाई जाती थी, जो भारतीय ‘सिद्धांत’ ग्रंथों से अत्यंत समान है ।
४. भारतीय परंपरा में २७ नक्षत्रों को महत्व दिया जाता है, जबकि पर्शियन परंपरा में राशिचक्र (Zodiac) को अधिक महत्त्व था । समय के साथ दोनों संस्कृतियों ने एक-दूसरे की पद्धतियों को अपनाया ।
५. ‘भृगु’ अथवा ‘नाडी’ ग्रंथों में जिस प्रकार कुंडली के स्थानों का विश्लेषण किया जाता है, वैसी ही पद्धति प्राचीन पर्शियन ‘अख्तर’ शास्त्र में भी मिलती है । ‘भृगु संहिता’ और ‘नाडी’ ग्रंथों में प्रयुक्त अनेक प्रतीक (जैसे मछली, सिंह, धनुष) केवल कल्पना नहीं हैं, वे आकाश में स्थित तारामंडलों का भारतीय रूपांतरण हैं । प्राचीन पर्शियन ग्रंथ ‘बुंदहिश्न’ (Bundahishn) में तारों का जो वर्गीकरण मिलता है, वह भारतीय नक्षत्र मंडल से बहुत मेल खाता है ।’
– श्री. चेतन राजहंस
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