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मुंबई, ४ अप्रैल (वार्ता.) – भारत की स्वतंत्रता हेतु कार्यरत स्वातंत्र्यवीर सावरकर सहित अनेक क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने अंडमान के कारागार में बंदी बनाकर उन पर अमानवीय अत्याचार किए । इन अत्याचारों के एक भाग के रूप में, बैल के स्थान पर क्रांतिकारियों को कोल्हू में जोतकर उनसे नियमित ३० पाउंड अर्थात् लगभग १४-१५ किलो तेल निकालने के लिए विवश किया जाता था । क्रांतिकारियों द्वारा भोगे गए इन अत्याचारों का बोध वर्तमान पीढी को हो, इस हेतु ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ की ओर से ४ तथा ५ अप्रैल को कोल्हू चलाने का प्रत्यक्ष प्रदर्शन आयोजित किया गया था । ४ अप्रैल को प्रातः ११ बजे गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में इस उपक्रम का शुभारंभ हुआ ।
🇮🇳 Awakening Patriotism Through Experience
An impactful initiative by Swatantryaveer Savarkar National Memorial to highlight the brutal atrocities faced by revolutionaries in the Andamans 🌊
Live demonstration of the oil mill (Kolhu)
Participants operated it under harsh… https://t.co/G1HMA4a2Bc pic.twitter.com/JEj47eqL4V
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) April 4, 2026
इस अवसर पर ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ के कार्याध्यक्ष श्री. रणजित सावरकर, मुंबई उच्च न्यायालय की अधिवक्ता (श्रीमती) सिद्ध विद्या, हिन्दू जनजागृति समिति के प्रवक्ता श्री. नरेंद्र सुर्वे, स्मारक के कार्यवाह श्री. राजेंद्र वराडकर, शिल्पकार श्री. नीलेश ढेरे सहित अन्य राष्ट्रप्रेमी नागरिक उपस्थित थे । इस समय राष्ट्रप्रेमी नागरिकों ने पैरों और हाथों में बेडियां डालकर कर कोल्हू चलाकर देखा । विशेष है कि बालकों से लेकर अनेक वृद्ध व्यक्तियों ने भी इसका प्रत्यक्ष अनुभव लिया । विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी उपस्थित होकर कोल्हू चलाया तथा ‘वन्दे मातरम्’, ‘भारतमाता की जय’ के उद्घोष किए ।
इस प्रकार राष्ट्रप्रेमी नागरिकों ने लिया कोल्हू चलाने का अनुभव !
अंडमान स्थित कोल्हू के समान ही स्वातंत्र्यवीर सावरकर स्मारक में एक कोल्हू निर्मित किया गया है । इस कोल्हू में सूखे नारियल के टुकड़े डालकर उसे चलाने हेतु कहा गया । कोल्हू चलाते समय क्रांतिकारियों के हाथ-पैर में जिस प्रकार बेडियां डाली जाती थीं, वैसी ही बेडियां प्रदर्शन करनेवालों को पहनाई गई थीं । पंजीकरण कराकर आए राष्ट्रप्रेमियों को इस अवसर पर प्रमाणपत्र प्रदान किए गए ।
सत्ता हेतु क्रांतिकारियों के त्याग को छोटा, तो गांधी के त्याग को हिमालय के समान दर्शाया गया ! – रणजित सावरकर, कार्याध्यक्ष, स्वातंत्रवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक
गांधी जी का चरखा चलाना तथा क्रांतिकारियों का कोल्हू चलाना लोगों को समान प्रतीत होता है । अंडमान में क्रांतिकारियों को ८ घंटे कोल्हू चलाना पडता था । इसके कारण अनेक लोगों ने आत्महत्या की तथा कुछ विक्षिप्त हो गए । क्रांतिकारियों का मनोबल क्षीण हो एवं इसे देखकर कोई भी क्रांति के कार्य में सहभागी न हो, इसलिए उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं । क्रांतिकारियों द्वारा सही गई पीडा को अनुभव कर ‘स्वतंत्रता की रक्षा का उत्तरदायित्व हमारा है’, यह भान जागृत करने हेतु हमने यह प्रदर्शन आयोजित किया है । जवाहरलाल नेहरू को कारागार में पंचतारांकित होटल के समान सुविधाएं प्राप्त थीं । उन्हें आम फल, मधु तथा सिगरेट उपलब्ध होती थी । उनके लिए यूरोप से रसोइया बुलाया गया था तथा टेनिस खेलने की व्यवस्था थी । इसके विपरीत, अंडमान में कालापानी का दंड भोगते समय क्रांतिकारियों को जली हुई रोटियां तथा स्वादहीन सब्जी दी जाती थी । भारत की स्वतंत्रता के पश्चात क्रांतिकारियों का यह त्याग यदि जनता के संज्ञान में आता, तो सत्ता प्राप्त नहीं होती; इसीलिए सत्ता हेतु क्रांतिकारियों के त्याग को चींटी समान तथा गांधी के त्याग को हिमालय के समान प्रदर्शित किया गया । सत्ता के लोभ में क्रांतिकारियों के त्याग का दमन किया गया ।
‘विमर्श’ (नैरेटिव्ह) के माध्यम से क्रांति कार्य को गौण स्थान दिया गया ! – अधिवक्ता सिद्ध विद्या
जब मैंने यहां कोल्हू चलाया, तब यहां पंखा चल रहा था तथा भय का वातावरण नहीं था; परंतु जब क्रांतिकारी कोल्हू चलाते थे, तब उनके पैरों में बेडियां होती थीं । कोल्हू में डाले जानेवाले नारियल क्रांतिकारियों को स्वयं हाथों से छीलने पडते थे । इससे क्रांतिकारियों ने राष्ट्र हेतु कितना त्याग किया, इसका अनुभव हुआ । वर्तमान समय में विमर्श (नैरेटिव्ह) रचकर उनके क्रांति कार्य को गौण स्थान दिया गया है ।
हमें चरखा दिखाया जाता है; परंतु तेल का कोल्हू नहीं ! – नरेंद्र सुर्वे, प्रवक्ता, हिन्दू जनजागृति समिति
जब मैंने बेडियां पहनकर तेल का कोल्हू खींचने का प्रयास किया, तब मैं ३-४ मिनट से अधिक उसे नहीं खींच सका । अंडमान में तो क्रांतिकारियों को ८ घंटे कोल्हू खींचना पडता था । दिनभर में उन्हें १५ किलो तेल निकालना अनिवार्य था । हमें चरखा तो दिखाया जाता है; परंतु तेल का कोल्हू नहीं दिखाया जाता । ‘दे दी आजादी बिना खड्ग बिना ढाल’, ऐसा हमें बताया जाता है । इस भ्रम से बाहर निकलकर युवाओं को क्रांतिकारियों द्वारा देश के लिए किए गए त्याग को समझना चाहिए । इसके लिए युवाओं को ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’ में आकर कोल्हू खींचकर देखना चाहिए ।
क्रांतिकारियों ने जो स्वतंत्रता दिलाई है, उसे अक्षुण्ण रखने हेतु स्वतंत्रता का महत्त्व समझना आवश्यक ! – श्रीमती मंजिरी मराठे, कोषाध्यक्ष, स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक’
लाखों क्रांतिकारियों ने खून बहाया, तब देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई । अनेक लोगों को क्रांतिकारियों के त्याग का ज्ञान नहीं है । क्रांतिकारियों ने जो स्वतंत्रता दिलाई है, उसे बनाए रखने के लिए स्वतंत्रता का मूल्य समझना आवश्यक है । उसी हेतु इस प्रदर्शन का आयोजन किया गया है ।
राष्ट्र हेतु सही गई यातनाओं की कल्पना होती है ! – श्री. प्रदीप कबरे, मराठी अभिनेता एवं निर्देशक
स्वयं को ‘सावरकर प्रेमी’ कहने की अपेक्षा स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने राष्ट्र हेतु क्या त्याग किया, इसे समझें । अंडमान में कोल्हू चलाने की प्रक्रिया से उनके मानसिक संकल्प के दर्शन होते हैं । इससे उनके द्वारा राष्ट्र हेतु सही गई यातनाओं का बोध होता है ।
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