सवा २ लाख सैनिकों की ‘चतुरंगिणी सेना’ बनाई जाएगी – Swami Avimukteshwarananda Saraswati

  • शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की काशी में घोषणा

  • प्रत्येक के हाथ में होगा परशु !

  • अगले १० महीनों में सेना का गठन

  • गौमाता, धर्म, शास्त्र एवं मंदिरों की रक्षा के लिए करेगी कार्य

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

वाराणसी (उत्तर प्रदेश) – ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यहां ‘चतुरंगिणी सेना’ के गठन की घोषणा की । इस सेना में कुल २ लाख १८ सहस्र ७०० सदस्यों को सम्मिलित करने का लक्ष्य रखा गया है और देशभर के लोग इसमें भाग ले सकेंगे । “यह सेना गौसंरक्षण, धर्मसंरक्षण, शास्त्रसंरक्षण तथा मंदिरों की रक्षा के लिए कार्य करेगी”, ऐसा उन्होंने कहा । इस सेना के लिए २७ पदाधिकारियों की घोषणा भी की गई है । सेना के अध्यक्ष स्वयं शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती होंगे ।

रोको, थामो तथा कार्रवाई करो

सेना की कार्यप्रणाली के बारे में शंकराचार्य ने बताया कि पहले सूचना दी जाएगी तथा अनुचित कार्य के बारे में समझाया जाएगा । इसके उपरांत भी यदि नहीं माना गया, तो उसे रोका जाएगा । फिर भी प्रतिक्रिया न मिलने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी । “कार्रवाई” का अर्थ सीधा आक्रमण नहीं, अपितु कानूनी कार्रवाई करना, परिवाद प्रविष्ट करना या स्थानीय स्तर पर निर्णय प्रक्रिया अपनाना है, ऐसा उन्होंने स्पष्ट किया । यह सब कार्य संवैधानिक रूप से ही किए जाएंगे ।

१० महीनों में सेना का गठन

शंकराचार्य ने बताया कि यह चतुरंगिणी सेना अगले माघ मेले तक पूरी तरह तैयार होकर कार्यरत हो जाएगी । इसके लिए एक नारा भी घोषित किया गया है, जिसमें ‘गौसंरक्षण’ को मुख्य उद्देश्य बताया गया है ।

ऐसी होगी सेना !

१. एक दल में १० सदस्य होंगे । ऐसे २१,८७० दल बनने पर सेना पूर्ण होगी ।

२. भारत में लगभग ८०० जिले हैं । यदि प्रत्येक जिले में २७ दल, यानी २७० सदस्य तैयार हो जाएं, तो २ लाख १६ सहस्र सदस्य तैयार हो जाएंगे ।

३. यह सेना पीले वस्त्रों में दिखाई देगी और प्रत्येक सदस्य के हाथ में परशु होगा ।

चतुरंगिणी सेना का अर्थ

चतुरंगिणी सेना का अर्थ है चार भागों से बनी सेना – पैदल सेना, अश्वदल, रथदल एवं गजदल । प्राचीन भारत में इस प्रकार की सेना को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था । महाभारत एवं रामायण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है, जहां बडे युद्धों में इन चारों अंगों के संगठित उपयोग का वर्णन है । इसे वैदिक काल से विकसित सैन्य व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है, जो प्राचीन भारतीय युद्धकौशल एवं रणनीति की उन्नत अवधारणा को दर्शाता है ।