धर्मांतरण विरोधी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर बाधा उत्पन्न करने का कांग्रेस का प्रयास !

मुंबई – महायुति सरकार द्वारा विधानसभा में पारित ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम २०२६’ विधेयक पर कांग्रेस ने आपत्ति व्यक्त की है । कांग्रेस सचिव सचिन सावंत ने इस अधिनियम के नाम में ही अंतर्विरोध होने का तर्क देते हुए ‘यह विधेयक संविधान के विरुद्ध है’, ऐसा अज्ञानतापूर्ण वक्तव्य दिया है । इस अवसर पर उन्होंने धर्मांतरण विरोधी विधि में अवरोध उत्पन्न करने का प्रयास किया, साथ ही उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की चौपाइयों की त्रुटिपूर्ण व्याख्या भी की । उन्होंने आरोप लगाया कि इस अधिनियम के प्रावधान धार्मिक ध्रुवीकरण करने वाले हैं । (‘लव जिहाद’ एवं अन्य माध्यमों से हिन्दुओं का अनियंत्रित धर्मांतरण होते समय मौन रहने वाले कांग्रेस नेता सचिन सावंत को क्या ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक’ पर बोलने का नैतिक अधिकार है ? – संपादक)
सावंत ने कहा कि मतों की राजनीति के लिए अल्पसंख्यकों को लक्ष्य बनाने के प्रयास में भाजपा न केवल ‘हिन्दू धर्म का तुष्टीकरण’ कर रही है, अपितु अपनी मनुवादी विचारधारा को भी रेखांकित कर रही है । उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि महिलाओं एवं अनुसूचित जाति-जनजाति के प्रति भाजपा की मानसिकता वर्णभेदी है ।
| ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम २०२६’ विधेयक के विषय में सचिन सावंत के विचार : “भाजपा की ओर से यह परिकल्पना स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की जाती है कि महिलाएं एवं अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग प्रलोभन में आकर धर्मांतरण अथवा ‘लव जिहाद’ का लक्ष्य होते हैं । ‘ढोल, गवार, क्षूद्र तथा नारी, सकल ताडन के अधिकारी’ यह मानसिकता वास्तव में मनुस्मृति से आई है ।”
(विशेष टिप्पणी : यह पंक्ति ‘मनुस्मृति’ की नहीं, अपितु गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ के ‘सुंदरकांड’ से है । जब समुद्र श्री राम को मार्ग नहीं देता एवं अंततः शरणागत होता है, तब वह अपनी जडता के विषय में यह कथन करता है । ‘ढोल, गवाँर, सूद्र, पसु, नारी । सकल ताडना के अधिकारी ।। ’ यहां ‘ताड़न’ शब्द का अर्थ सामान्यतः ‘दंड देना’ लिया जाता है ; किंतु विद्वानों के अनुसार ‘ताडन’ का अन्य अर्थ ‘निरीक्षण करना, संवर्धन करना अथवा मार्गदर्शन करना’ भी है । जिस प्रकार ढोल से सुमधुर ध्वनि प्राप्त करने हेतु उस पर ध्यान देना आवश्यक है, उसी प्रकार इन घटकों का उचित मार्गदर्शन कर संरक्षण करना चाहिए, यह इसका वास्तविक अर्थ है । यदि सावंत के मतानुसार अर्थ लिया जाए, तो शासन इस विधेयक के माध्यम से उपरोक्त घटकों का ‘उत्पीडन’ रोककर उनका ‘रक्षक’ ही सिद्ध हुआ है, क्या ऐसा नहीं है ?) |
सावंत के अनुसार यह विधेयक नागरिकों का अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार छीनने वाला है । १८ वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति को यदि मतदान का अधिकार है, तो उन्हें स्वयं का निर्णय लेने से रोकना अनुचित है । बल पूर्वक धर्मांतरण का विरोध होना चाहिए; किंतु इस विधेयक में प्रयुक्त ‘भोला भाला व्यक्ति’ यह संज्ञा अस्पष्ट है । सरकार को इसकी व्याख्या स्पष्ट करनी चाहिए । यदि किसी वयस्क व्यक्ति को केवल धर्मांतरण का परामर्श दिया जाता है, तो अन्य व्यक्ति को अपराधी घोषित करना अयोग्य है । सावंत ने प्रश्न उपस्थित किया कि यदि सरकार का यह मत है कि ‘व्यक्ति एवं परिवार आर्थिक दुर्बलता के कारण धर्मांतरण का शिकार होते हैं’, तो इस दुर्बलता को दूर करने हेतु शासन क्या प्रयास करेगा ? (‘भोला भला व्यक्ति’ जैसे शब्दों पर तकनीकी विवाद उत्पन्न करने की अपेक्षा प्रलोभन एवं कपट से होने वाले हिन्दुओं के धर्मांतरण को रोकना अधिक महत्वपूर्ण है । हिन्दुओं की रक्षा हेतु लिए गए निर्णय को ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ कहना कांग्रेस की पुरानी नीति का ही अंग है ! – संपादक)
संपादकीय भूमिकाधर्मांतरण रोकने हेतु निर्मित विधि (कानून) को ‘असंवैधानिक’ सिद्ध करना एक प्रकार से धर्मांतरण करने वाली शक्तियों को प्रोत्साहन देने के समान है ! अतः वास्तव में यह कृत्य ही संविधान विरोधी है ! किंतु अपने उद्भव काल से ही धर्मांधों का तुष्टीकरण करने वाले कांग्रेस के नेताओं को बलपूर्वक धर्मांतरण का दंश झेलने वाले हिन्दुओं की वेदना का आभास कैसे होगा ? |
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