
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात नववर्षारंभ ! अर्थात पुराने को त्यागकर नए को अंगीकार करना । सृष्टि में इस दिन से नया सृजन होता है । अर्थात पुनः एक परिवर्तन होता है । परिवर्तन सृष्टि का नियम ही है । प्रकृति में ६ ऋतुएं हैं । प्रत्येक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु आती है, यह भी एक परिवर्तन ही है । सूर्योदय होने के उपरांत दोपहर में सूर्य सिर पर आता है और संध्या को सूर्यास्त होता है तथा रात्रि प्रारंभ होती है । दिनभर परिवर्तन होता रहता है । सृष्टि में जिस प्रकार परिवर्तन होता है, उसी प्रकार व्यक्ति, समाज, संस्कृति, राष्ट्र आदि में भी कालानुसार परिवर्तन होता रहता है; उसे अच्छा या बुरा परिवर्तन अथवा बदलाव कहा जा सकता है, उदाहरणार्थ वातावरण में आज ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ (वैश्विक तापमान वृद्धि) के कारण जो परिवर्तन हुआ है, वह पृथ्वी और परिणामस्वरूप सृष्टि के विनाश का कारण बनने लगा है, यह कोई भी नकार नहीं सकता । ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ से बचने के लिए सभी देश अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं । उसमें भारत भी पीछे नहीं है ।

व्यक्ति में भी परिवर्तन होता रहता है । आयु के अनुसार प्रत्येक में बदलाव होता है । बालक, किशोर, युवा, अधेड, वृद्ध, ऐसे चरणों में मनुष्य में परिवर्तन होता है । समाज में परिवर्तन होने के लिए विभिन्न घटनाएं कारण बनती हैं, जिनमें काल सबसे महत्त्वपूर्ण घटक होता है । कालानुसार व्यक्ति, समाज आदि में परिवर्तन होते रहते हैं, उदाहरणार्थ १ सहस्र वर्ष पूर्व अर्थात मुसलमान आक्रमणकारियों और अंग्रेजों के भारत में आने से पहले भारत विश्वगुरु था । भारत का सकल राष्ट्रीय उत्पादन २८ प्रतिशत था । यहां प्रगल्भ एवं समृद्ध संस्कृति विद्यमान थी । भारत के प्राचीन स्मारकों और मंदिरों को देखने पर हम प्रत्येक को यह अनुभव होता है; किन्तु १ सहस्र वर्ष पश्चात जब आज हम उसका विचार करते हैं, तो ज्ञात होता है कि हमने वह सबकुछ खो दिया है । इसे आध्यात्मिक स्तर पर देखने पर इसे काल की महिमा ही कहना होगा । इस कालचक्र को समझना आवश्यक है । हिन्दू धर्मशास्त्रानुसार युग हैं – सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं वर्तमान कलियुग । इन युगों में व्यक्ति, समाज आदि की स्थिति भिन्न-भिन्न होती है, यह हमने पौराणिक ग्रंथों से पढा है । प्रत्येक युग में छोटे-छोटे युगों का भी चक्र चलता रहता है । इस युग-परिवर्तन को हम उत्क्रांति कह सकते हैं । उसमें सभी स्तरों पर परिवर्तन होता है, चाहे वह राज्यव्यवस्था हो, प्रशासन व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, व्यापार आदि में आमूल परिवर्तन होता है । पूर्वकाल में धर्माधिष्ठित राज्यव्यवस्था थी और अब धर्मनिरपेक्षता आई है ।
पूर्वकाल में प्राकृतिक खेती की जाती थी । कुछ समय पूर्व रासायनिक उर्वरकों का उपयोग होने लगा । आज उसके दुष्परिणाम ज्ञात होने पर समाज पुनः प्राकृतिक खेती की ओर मुडने लगा है । पूर्वकाल में भारत में गुरुकुल पद्धति थी । आज हम लिपिक (क्लर्क) तैयार करनेवाली शिक्षापद्धति देख रहे हैं । ऐसा परिवर्तन समाज में निरंतर चलता रहता है । इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए मनुष्य के लिए स्वयं में परिवर्तन लाना आवश्यक है । मनुष्य जन्म का उद्देश्य है, जिस ईश्वर से हम उत्पन्न हुए हैं, उसी ईश्वर में पुनः एकरूप होना अर्थात आध्यात्मिक उन्नति कर स्वयं को ईश्वरीय चैतन्य में परिवर्तित करना । ऐसा करने से जीव का कल्याण होता है ।
हमें अपने जीवन में यह शाश्वत परिवर्तन लाने के लिए साधना करनी चाहिए, अन्य परिवर्तन अशाश्वत हैं, यह ज्ञान होना चाहिए । ऐसा परिवर्तन यदि व्यक्ति में हुआ, तो उसका प्रभाव समाज, संस्कृति, राष्ट्र पर होता है और वह एक प्रकार का सतयुग होता है । कालानुसार और अनेक दूरदर्शी संतों के कथनानुसार, पुनः कलियुग के अंतर्गत एक सतयुग आनेवाला है । यह एक बडा परिवर्तन होगा । भारत पुनः विश्वगुरु पद पर आसीन होगा ।
– श्री. प्रशांत कोयंडे, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (१८.३.२०२५)
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संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !