व्यक्ति में विद्यमान ‘ईश्वर के प्रति का भाव’, इस घटक को दर्शानेवाले ग्रहयोगों का विवेचन !

‘अध्यात्म में ईश्वर के प्रति आध्यात्मिक भाव का बहुत महत्त्व है । आध्यात्मिक भाव के कारण साधक ईश्वर का अस्तित्व अनुभव कर पाता है, साथ ही उसे जीवन की ओर देखने की सकारात्मक एवं व्यापक दृष्टि मिलती है । प्रत्येक साधक में विद्यमान भाव का स्वरूप भिन्न होता है । इस लेख में व्यक्ति में विद्यमान ‘भाव’, इस घटक को दर्शानेवाले ग्रहयोगों का विवेचन किया गया है ।  

(भाग १)

१. आध्यात्मिक भाव का महत्त्व

१ अ. ‘भाव’ का अर्थ है ईश्वर के अस्तित्व का भान : ‘भाव’ का अर्थ है ईश्वर को अनुभव करने की क्षमता  ! व्यक्ति में भाव जितना अधिक, उतना अधिक वह ईश्वर को अनुभव कर सकता है । प्रत्येक व्यक्ति उसकी प्रकृति के अनुसार ईश्वर को अनुभव कर सकता है । कोई देवता में, कोई गुरु में, कोई प्रकृति में, तो कोई स्वयं में ईश्वर को अनुभव करते हैं । कोई ईश्वर के सगुण रूप को, तो कोई निर्गुण रूप को अनुभव करते हैं ।

१ आ. व्यक्ति में भाव उत्पन्न होने की प्रक्रिया : सामान्य व्यक्ति अहं-केंद्रित जीवन व्यतीत करता है । अहंकार संकीर्णता, अज्ञान एवं भेद उत्पन्न करता है । उसके कारण व्यक्ति को पग-पग पर दुःख, असंतोष, अस्थिरता एवं अशांति का अनुभव होता है । सत्संग के कारण अथवा आत्मपरीक्षण के कारण व्यक्ति को भान होता है कि ‘अहं ही मेरे दुःख का कारण है’; जिससे वह उस तत्त्व की ओर ध्यान केंद्रित करता है जो आनंद का स्रोत है । आनंद के स्रोत का वह तत्त्व है ईश्वरीय तत्त्व ! ईश्वरीय तत्त्व सर्वव्यापी एवं सर्वज्ञ होने के कारण वह आनंदमय है । व्यक्ति जब इस सर्वव्यापी तत्त्व का अनुभव करने का प्रयास करता है, तब उसके अंतःकरण में आनंद का झरना प्रवाहित होता है । इस आनंद की अनुभूति करने के पश्चात व्यक्ति पुनः-पुनः ईश्वर का अनुभव करने का प्रयास करता है तथा उसके प्रयासों के कारण उसमें ‘भाव’ का घटक विकसित होता है ।

१ इ. व्यक्ति में विद्यमान भाव के कारण जीवन में उसे मिलनेवाले लाभ

१. भाव के कारण व्यक्ति का जीवन ईश्वर-केंद्रित होता है । उसका जीवन की ओर देखने का दृष्टिकोण परिवर्तित होता है । तब उसमें यह भाव उत्पन्न होता है कि ‘मैं सबकुछ ईश्वर के लिए कर रहा हूं’ अथवा ‘ईश्वर ही मुझसे सबकुछ करवा ले रहे हैं ।’

२. ‘जीवन में घटित होनेवाला प्रत्येक प्रसंग ईश्वर ने मुझे कुछ सिखाने के लिए तथा मेरी उन्नति के लिए घडा है’, ऐसा उसका दृष्टिकोण बन जाता है । इसीलिए जीवन के प्रसंगों की ओर वह सकारात्मकता से देखता है ।

३. ‘ईश्वर सर्वव्यापी है’, इस भान के कारण व्यक्ति निर्जीव वस्तुओं, वृक्ष-वनस्पतियों, पशु-पक्षियों, अन्य व्यक्तियों आदि में भी ईश्वर को देखने का प्रयास करता है । उसके कारण उसमें सभी के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है ।

४. ‘विश्व की प्रत्येक बात से ईश्वर स्वयं को ही व्यक्त कर रहे हैं’, इस भान के कारण व्यक्ति को सर्वत्र ईश्वर के ही दर्शन होते हैं, जिससे उसके आनंद में वृद्धि होती है ।

५. ईश्वर के आंतरिक सान्निध्य के कारण व्यक्ति को सूक्ष्म से ईश्वरीय ज्ञान अथवा संकेत मिलते हैं । इसलिए वह ईश्वर को अपेक्षित कृति कर पाता है ।

६. ‘मुझे जो आनंद मिल रहा है, वह अन्यों को भी मिले’, इसके लिए प्रयास करने से उसमें व्यापकता आती है ।

श्री. राज कर्वे
श्री. यशवंत कणगलेकर

२. ‘भाव’ घटक के विषय में ज्योतिषशास्त्रीय विवेचन

प्रत्येक व्यक्ति में भाववृद्धि करने की क्षमता होती है; परंतु केवल उस भाव का स्वरूप भिन्न होता है । जन्मकुंडली से व्यक्ति में विद्यमान भाव का स्वरूप जाना जा सकता है । भाव के ‘व्यक्त’ एवं ‘अव्यक्त’ ये २ मुख्य प्रकार हैं । उनसे संबंधित ग्रहयोगों का विवेचन आगे दिया गया है ।

२ अ. व्यक्त भाव : ‘व्यक्त भाव’ अर्थात व्यक्ति के नेत्र, वाणी, चेहरा, देहबोली आदि से व्यक्त होनेवाला भाव ! व्यक्त भाव मनःप्रधान एवं सगुण स्वरूप का होता है । यह भाव मन की संवेदनशीलता एवं कोमलता के कारण उत्पन्न होता है । व्यक्त भाव को दर्शानवाले कुछ ग्रहयोग आगे दिए हैं ।

२ अ १. ‘चंद्रमा’, ‘शुक्र’ एवं ‘बृहस्पति’ के परस्पर योग : ग्रहों में ‘चंद्रमा’ एवं ‘शुक्र’ ग्रह मन की भावनाओं से संबंधित हैं । चंद्रमा वात्सल्य, करुणा, सहानुभूति आदि भावनाएं दर्शाता है, जबकि शुक्र प्रेम, सुरक्षितता, स्नेह आदि भावनाएं दर्शाता है । चंद्रमा एवं शुक्र का ‘बृहस्पति’ ग्रह से शुभयोग हो, तो व्यक्ति में ईश्वर के प्रति प्रेम एवं स्नेह उत्पन्न हो सकता है । ऐसी स्थिति में इन ग्रहों का ‘नेपच्यून’ ग्रह के साथ शुभयोग हो, तो उससे व्यक्ति के भाव में और अधिक सूक्ष्मता एवं उत्कटता आ सकती है ।

२ अ २. ‘बुध’, ‘शुक्र’ एवं ‘बृहस्पति’ ग्रहों के परस्पर योग : ‘बुध’ ग्रह व्यक्ति के विचारों का स्वरूप दर्शाता है । जन्मकुंडली में बुध का ‘चंद्रमा’ एवं ‘शुक्र’ ग्रहों से योग हो, तो ऐसे व्यक्ति का झुकाव अधिकतर प्रेम, सौंदर्य, कलात्मकता, सृजनशीलता आदि की ओर होता है । ऐसी स्थिति में इन ग्रहों का यदि ‘बृहस्पति’ एवं ‘नेपच्यून’ ग्रहों के साथ शुभयोग हो, तो व्यक्ति प्रेम, सौंदर्य, कला आदि से ईश्वर का अनुभव करने का प्रयास करता है ।

२ अ ३. ‘पृथ्वी’ एवं ‘जल’ तत्त्व की राशियां : ऊपर दिए योग पृथ्वीतत्त्व की राशियों में (वृषभ, कन्या एवं मकर) तथा जलतत्त्व की राशियों में (कर्क, वृश्चिक एवं मीन) हो रहे हों, तो ऐसे व्यक्ति में ‘व्यक्त भाव’ उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है ।

२ आ. अव्यक्त भाव : ‘अव्यक्त भाव’ सहजता से व्यक्त नहीं होता; परंतु वह वृत्तिरूप से अंतःकरण में होता है । अव्यक्त भाव बुद्धिप्रधान एवं निर्गुण स्वरूप का होता है । यह भाव व्यक्ति की विचारशीलता, अंतर्मुखता, विवेक आदि के कारण उत्पन्न होता है । अव्यक्त भाव के कारण व्यक्ति में ईश्वर के समष्टि रूप के साथ एकरूप होने का आकर्षण उत्पन्न होता है । अव्यक्त भाव दर्शानेवाले ग्रहयोग आगे दिए हैं –

२ आ १. ‘बुध’, ‘बृहस्पति’ एवं ‘शनि’ ग्रहों के परस्पर योग : बुध ग्रह ‘विचार’, बृहस्पति ग्रह ‘ज्ञान’ एवं शनि ग्रह ‘त्याग’ दर्शाता है । इन ३ ग्रहों में होनेवाले परस्पर योग व्यक्तित्व में जिज्ञासा, चिंतनशीलता, विचारशीलता, सामंजस्य, अंतर्मुखता आदि विशेषताएं दर्शाते हैं । इन विशेषताओं के कारण व्यक्ति अंतर्मुख होकर जीवन का अर्थ ढूंढने के लिए प्रेरित होता है । वह निर्गुण ईश्वरीय तत्त्व का अनुभव करने का प्रयास करता है, साथ ही स्वयं को ईश्वर का अंश मानता है ।

२ आ २. ‘रवि’ ग्रह का ‘बृहस्पति’ एवं ‘शनि’ ग्रहों से योग : ‘रवि’ ग्रह व्यक्ति की आंतरिक आकांक्षाओं को दर्शाता है । ‘रवि’ ग्रह का ‘बृहस्पति’ एवं ‘शनि’ ग्रहों के साथ योग हो, तो व्यक्ति में सत्यनिष्ठा होती है । वह जीवन के सत्य सिद्धांतों को तथा उच्च आदर्शाें को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है । उसमें ज्ञानशक्ति होती है; जिससे उसमें अव्यक्त भाव उत्पन्न होता है ।

२ आ ३. ‘मंगल’ ग्रह का ‘बृहस्पति’ एवं ‘शनि’ ग्रहों से योग : ‘मंगल’ ग्रह कर्मप्रधान प्रवृत्ति को दर्शाता है । उसके कारण ‘मंगल’ ग्रह का ‘बृहस्पति’ एवं ‘शनि’ ग्रहों से योग हो, तो ऐसे व्यक्ति में समष्टिभाव होता है । वह समष्टि के हित हेतु कार्य करने के लिए प्रेरित होता है । इससे उसमें व्यापकता आती है । वह कर्म के माध्यम से ईश्वर की सेवा करने का प्रयास करता है ।

२ आ ४. ‘अग्नि’ एवं ‘वायु’ तत्त्वों की राशियां : ऊपर दिए योग यदि अग्नितत्त्व की राशियों (मेष, सिंह एवं धनु) तथा वायुतत्त्व की राशियों (मिथुन, तुला एवं कुंभ) में बन रहे हों, तो ऐसे व्यक्ति में ‘अव्यक्त भाव’ उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है ।

उक्त विवेचन से यह ध्यान में आता है कि प्रत्येक ग्रहयोग भाव के भिन्न पहलू दर्शाता है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर के प्रति भाव वृद्धिंगत करने की क्षमता होती है । व्यक्ति उसकी प्रकृति के अनुसार ईश्वर को अनुभव कर सकता है । प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण में ईश्वरीय तत्त्व सुप्तावस्था में वास करता है । उस ईश्वरीय तत्त्व की ओर ध्यान केंद्रित कर उसे अनुभव करने का प्रयास करने से आनंद की अनुभूति हो सकती है ।

३. उदाहरण

अ. सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी : इनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा-बृहस्पति एवं शुक्र-बृहस्पति, ये व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग हैं; जबकि बृहस्पति-मंगल, मंगल-शनि, रवि-शनि एवं बृहस्पति-शनि, ये अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग हैं । उनमें व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ३० प्रतिशत हैं, जबकि ७० प्रतिशत योग अव्यक्त भाव दर्शानेवाले हैं ।

आ. सद्गुरु राजेंद्र शिंदेजी : इनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा-शुक्र, चंद्रमा-बृहस्पति एवं शुक्र-बृहस्पति, ये व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग हैं; जबकि बुध-शनि, रवि-मंगल, रवि-बृहस्पति तथा बृहस्पति-मंगल, ये अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग हैं । उनमें व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ४० प्रतिशत हैं, जबकि अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ६० प्रतिशत हैं ।

इ. पू. (श्रीमती) अश्विनी पवारजी : इनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा-बुध, चंद्रमा-शुक्र, चंद्रमा-बृहस्पति, ये व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग; जबकि शुक्र-शनि, बृहस्पति-मंगल एवं बृहस्पति-शनि, ये अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग हैं । उनमें व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ५० प्रतिशत हैं तथा अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ५० प्रतिशत हैं ।

ई. पू. (कु.) दीपाली मतकरजी : इनकी कुंडली में चंद्रमा-बुध, चंद्रमा-शुक्र, चंद्रमा-बृहस्पति एवं चंद्रमा-मंगल व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग; जबकि बुध-बृहस्पति, बुध-शनि, रवि-बृहस्पति एवं रवि-शनि, ये अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग हैं । उनमें व्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ५० प्रतिशत हैं तथा अव्यक्त भाव दर्शानेवाले योग ५० प्रतिशत हैं ।’

– श्री. यशवंत कणगलेकर (ज्योतिष विशारद) एवं श्री. राज कर्वे (ज्योतिष विशारद), महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा.

(३.१२.२०२५)