अफ्रीका उपमहाद्वीप के सोमालिया से टूटकर बाहर निकले सोमालीलैंड को इजरायल ने मान्यता दे दी है । तीव्र गति से तथा आश्चर्यचकित करनेवाली कार्रवाईयां कर शत्रु के होश उडा देना ही इजरायल की विशेषता है ! केवल रक्षा के संदर्भ में ही नहीं, अपितु विभिन्न क्षेत्रों में भी उसकी यही नीति दिखाई देती है । वैसे देखा जाए, तो ‘सोमालीलैंड को मान्यता देना’ विश्वपटल पर लंबित विषय है ! वर्तमान समय में ‘रूस-यूक्रेन युद्ध’, ‘अमेरिका एवं वेनेजुएला के मध्य चल रही खींचतान’, ‘ऑस्ट्रेलिया में जिहादी आतंकियों द्वारा किया गया आक्रमण’ आदि विषयों की चल रही चर्चा में इजरायल ने अकस्मात ही सोमालीलैंड को मान्यता दे दी है । सोमालिया की भांति सोमालीलैंड भी मुस्लिम प्रधान देश है । ‘इस्लामी देशों में इजरायल की क्या प्रतिमा है ?’, यह बताने की आवश्यकता नहीं है; परंतु जिस क्षण इजरायल के विदेशमंत्री गिदोन सार ने सोमालीलैंड को मान्यता देकर उसके साथ राजनीतिक संबंध स्थापित करने की घोषणा की, सोमालीलैंड में उसी समय लोगों ने सडक पर उतरकर आनंदोत्सव मनाते हुए पटाखे जलाए । इजरायल को ‘मुस्लिम विरोधी’ बोलकर उसकी अवहेलना करनेवालों को मुस्लिम प्रधान सोमालीलैंड को अपने पक्ष में कर लेनेवाले इजरायल की कूटनीति की विजय स्वीकार करनी ही पडेगी ।
इसमें महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि इजरायल ने यह लंबित सूत्र अकस्मात ही क्यों अपने हाथ में लिया ? वैसे देखा जाए, तो सोमालीलैंड की अलग होने की प्रक्रिया को ३० वर्ष पूरे हो चुके हैं; परंतु संयुक्त राष्ट्र संघ के किसी भी देश ने उसे मान्यता नहीं दी है । सोमालीलैंड में सोमालिया जैसी अराजकता नहीं है । वहां लोकतंत्र है, साथ ही उसकी सेना भी है । वहां की प्रशासनिक व्यवस्था भी अच्छी है; परंतु तब भी ‘सोमालीलैंड को मान्यता देने से विश्व की राजनीति में उथल-पुथल होगी’, यह प्रत्येक देश का अनुमान है ! अफ्रीकी यूनियन को इसका एक अलग ही भय है ! इस यूनियन का कहना है कि ‘उपनिवेशवाद की अवधि में सुनिश्चित की गई प्रत्येक देश की सीमा यथास्थिति में ही रहे । टूटकर अलग हुए देशों को मान्यता देने से अफ्रीकी उपमहाद्वीप में अलगाववाद बढेगा ।’ यूरोपियन यूनियन इजरायल से सहमत नहीं है । यूरोपियन यूनियन को ऐसा भय है, कि इजरायल की इस कूटनीति के कारण अफ्रीकी देशों के आंतरिक कलह को बल मिलेगा तथा वहां के देशों में पुनः सीमा विवाद बढेगा । इस्लामी देशों को इसका भी भय है कि सोमालीलैंड में इजरायल की उपस्थिति बढने से मध्य पूर्व एवं अफ्रीकी देशों की सुरक्षा प्रभावित होगी । किसे क्या लगता है ? इसकी इजरायल को चिंता नहीं है; वह इस काम में लग गया है ।

इजरायल का लाभ

सोमालीलैंड ‘बाब अल-मंदेब’ जलडमरूमध्य के पास है । लाल सागर एवं एडन की खाडी को जोडनेवाले इस जलडमरूमध्य का व्यापारिक एवं सामरिक महत्त्व है । सोमालीलैंड अन्य इस्लामी देशों की भांति कट्टर इस्लामी देश नहीं है । सोमालीलैंड ने सोमालिया में सक्रिय आतंकी संगठन ‘अल शबाब’ का विरोध किया है । इस देश में अपने पैर जमाने से इजरायल को अफ्रीकी देशों एवं उनके द्वारा पोषित आतंकी संगठनों पर ध्यान रखना सुलभ होगा । इसीलिए इजरायल सोमालीलैंड में बंदरगाहों का विकास तथा वहां की मूलभूत सुविधाओं के विकास के साथ-साथ कृषि एवं साइबर क्षेत्रों में भी निवेश करेगा । इससे भी आगे जाकर यदि अफ्रीकी महाद्वीप के इस्लामिक देशों ने अफ्रीकी संघ में इजरायल के विरुद्ध आवाज उठाई, तो इजरायल ऐसी स्थिति उत्पन्न करने का प्रयास करेगा, जहां सोमालीलैंड ढाल बनकर इजरायल का पक्ष लेगा । अब इन इस्लामी देशों की दोहरी नीति तो देखिए ! ये सभी देश ‘स्वतंत्र कश्मीर’ के लिए आग्रही हैं; परंतु इन्हीं इस्लामी देशों को मुस्लिम प्रधान सोमालिया देश से टूटकर बाहर हो चुके मुस्लिम प्रधान सोमालीलैंड को मान्यता देना अनुचित लगता है ।
वर्तमान समय में सोमालीलैंड के सूत्र पर स्थिति यह है कि पूरा विश्व एक ओर तथा इजरायल दूसरी ओर है; परंतु दूरदर्शिता से विचार कर इजरायल ने सोमालीलैंड को समर्थन दिया है । विश्व का इतिहास बदलने के लिए किसी देश के द्वारा उठाया जानेवाला पहला अनुचित अथवा उचित कदम महत्त्वपूर्ण होता है । इजरायल की इस भूमिका से पूर्व अफ्रीका के भू-राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं । वर्तमान में इजरायल को सोमालीलैंड का भी समर्थन प्राप्त है । उसके कारण पूरे विश्व के रोष को स्वीकार कर इस प्रकार की साहसिक भूमिका अपनानेवाला इजरायल प्रशंसा का पात्र है ।
भारत किसकी प्रतीक्षा कर रहा है ?
वर्तमान समय में सोमालिया में चीन की गतिविधियां बढ रही हैं, साथ ही सोमालिया एवं सोमालीलैंड के पडोस में स्थित छोटा-सा देश जिब्राऊटी चीन के हाथों का खिलौना बन गया है । चीन ने जैसे अन्य देशों को ऋण देकर अपने जाल में फंसा लिया, वही स्थिति जिब्राऊटी की है । उसका लाभ उठाकर चीन ने इस देश में अपनी नौसेना का शिविर बना लिया है । चीन पूर्व अफ्रीकी देशों में अपना वर्चस्व बढाने का प्रयास कर रहा है । उसके कारण इस परिसर में अमेरिका की गतिविधियां भी बढ रही हैं । वैसे देखा जाए, तो अफ्रीकी उपमहाद्वीप के इथोपिया, केनिया एवं तंजानिया जैसे देशों के भारत के साथ अच्छे संबंध हैं; परंतु इस उपमहाद्वीप में स्वयं का अस्तित्व दिखाई दे, ऐसा करना भारत के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है । व्यापारिक एवं सामरिक-दृष्टि से ‘बाब अल-मंदेब’ जलडमरूमध्य भारत के लिए भी महत्त्वपूर्ण है । भारत ने सोमालीलैंड को मान्यता दी, तो उससे भारत को भी सहयोग मिलेगा, भारत को उसका सामरिक लाभ मिल सकता है ।
‘मिडल इस्ट फोरम’ के नीति विभाग के निदेशक माइकेल रुबिन ने भारत का मार्मिक विश्लेषण किया है । शासनकर्ताओं को उसका अध्ययन कर भारत की नीतियों में परिवर्तन लाना अपेक्षित है । वे कहते हैं, ‘भारत में महासत्ता बनने की क्षमता है; परंतु भारत इस क्षमता का उचित उपयोग नहीं करता । अनेक घटनाओं के संदर्भ में उस विषय में प्रधानता लेने के स्थान पर घटना हो जाने के उपरांत भारत उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है । इस प्रकार विलंब से कदम उठाने के कारण विश्व स्तर पर उसका अल्प प्रभाव पडता है तथा उसके कारण राष्ट्रहित में भी बाधा आती है । इसलिए यदि भारत इजरायल का अनुकरण कर सोमालीलैंड को मान्यता देता है, तो उससे विश्व में यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि भारत अपने सहयोगी देशों के साथ खडा रहेगा तथा वह चीन की मनमानी के सामने नहीं झुकेगा ।’ तो इसे ध्यान में लेकर क्या भारत सोमालीलैंड को मान्यता देनेवाला दूसरा देश बन पाएगा ?
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