
प्राणायाम करने के लिए प्रयत्नपूर्वक, सुनियंत्रित, दीर्घ; परंतु योग्य मात्रा में श्वास ली जाती है । इसे ‘पूरक’ कहते हैं । यही मापदंड श्वास छोडते समय लगाए जाते हैं, जिसे ‘रेचक’ कहा जाता है । पूरक के अथवा रेचक के उपरांत कुछ क्षण श्वास रोक लिया जाता है । इसे ‘कुंभक’ कहते हैं । सामान्यतया पूरक-कुंभक-रेचक के लिए १:२:२ और १:४:२ ऐसा अनुपात होता है । ‘प्राणायाम के न्यूनतम १० आवर्तन करने चाहिए’, ऐसा संकेत है । प्राणायाम के उपरांत ओंकार जप करने से शीघ्रता से ध्यानस्थ होना संभव होता है ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?