योगशास्त्र में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए विविध आसन बताए हैं । योगसाधना में नाडीशोधन के लिए आसन करना आवश्यक होता है । आसनों के कारण मनुष्य स्वस्थ और फूर्तीला बनने से उसे प्राणायाम करना सरल होता है । हठयोग का प्रथम अंग है आसन । हाथ-पैर एक विशिष्ट अवस्था में रखते हुए शरीर सीधा और स्थिर रखकर आसनस्थ होकर ध्यानधारणा करने से मन एकाग्र होने में सहायता मिलती है ।

आसन कैसा होना चाहिए ?
पतंजलि ने आसन की व्याख्या इस प्रकार की है – ‘जिसमें सुख और स्थिरता है, उसे आसन कहते हैं ।’ आसन में जागृतावस्था आवश्यक है । इसलिए सोने की स्थिति को आसन नहीं कह सकते । प्राणायाम, ध्यान इत्यादि के लिए स्थिरता और सुख दोनों की आवश्यकता है । आसनों के कारण ध्यान-धारणा आदि को अनुकूल परिपक्वता आती है ।
सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन, भद्रासन इत्यादि विशिष्ट आसन साधक को बंध की ओर और बंध से कुंडलिनी की जागृति की ओर प्रेरित करते हैं ।
आसनों का वर्गीकरण
वर्तमान में प्रचलित आसन कालानुसार विकसित हुए हैं और उत्तरोत्तर नए आसनों की निर्मिति को चालना मिल रही है । आसनों की कृति तथा उनके परिणामों के अनुसार आसनों का वर्गीकरण आगे दिए अनुसार कर सकते हैं ।
१. शरीर संवर्धनात्मक आसन :
उत्तम योगसाधना हेतु, विशेषकर ध्यानधारणा हेतु शरीर और मन की विशिष्ट योग्यता आवश्यक होती है । ऐसा परिवर्तन लानेवाले आसन शरीरसंवर्धनात्मक आसनों के वर्ग में आते हैं । इसके उपवर्ग आगे दिए अनुसार हैं ।
अ. मेरुदंड पर परिणाम करनेवाले आसन : भुजंगासन, धनुरासन, वक्रासन, उष्ट्रासन इत्यादि आसनों से मेरुदंड प्रभावित होता है ।
आ. शरीरांतर्गत अवयवों की संवेदनाओं पर परिणाम करनेवाले आसन : गोमुखासन, मत्स्यासन, वज्रासन, भद्रासन, सुप्तव्रासन, नौकासन इत्यादि आसन विविध अवयवों की संवेदनाओं पर परिणाम करते हैं ।
इ. चेतासंस्था और ग्रंथियों पर परिणाम करनेवाले आसन : पश्चिमोत्तानासन, मत्स्येंद्रासन, भुजंगासन, हलासन, पवनमुक्तासन इत्यादि आसनों से चेतासंस्था को चालना मिलती है और साथ ही विशिष्ट ग्रंथियां प्रभावित होकर उनके कार्य में सुधार होता है ।
ई. शरीर के सुनियंत्रित कार्य के लिए आसन : शरीर के सुनियंत्रित कार्य के लिए शीर्षासन, सर्वांगासन, विपरीत करणी, वृक्षासन, कुक्कुटासन, बकासन और मयुरासन जैसे आसन बताए हैं । इससे आंख, कान और तलुवों का कार्य सुचारु रूप से चलता है ।
उ. सुखकारक आसन : शवासन और मकरासन जैसे आसनों का उद्देश्य शारीरिक थकान दूर करना, शरीर और मन शिथिल करना तथा उन्हें आराम देना होता है ।
२. ध्यानोपयोगी आसन :
ध्यान के लिए स्थिर और सुखदायी बैठक महत्त्वपूर्ण होती है । सिद्धासन, पद्मासन, समासन, स्वस्तिकासन, ये आसन ध्यान के लिए उचित हैं ।
(संदर्भ : समय-निरामय पंचांग, कलियुग वर्ष ५१२७)
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