Ram Mandir Dhwajarohan : ५०० वर्ष पुराने यज्ञ की पूर्णाहुति ! – प्रधानमंत्री मोदी

अयोध्या में श्रीराम मंदिर पर ध्वजारोहण !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी

अयोध्या (उत्तर प्रदेश) – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने श्रीराम मंदिर के ध्वजारोहण समारोह में ये उद्गार व्यक्त किए – ‘‘आज अयोध्या नगरी भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र के एक उच्च बिंदु की साक्षी बनी है । संपूर्ण भारत एवं संपूर्ण विश्व राममय है । अद्वितीय संतोष, असीम कृतज्ञता एवं अपार अलौकिक आनंद है । सदियों से चले आ रहे घाव भर रहे हैं । सदियों की पीडा आज शांत हो गई है । सदियों से किया गया संकल्प आज पूर्ण हो रहा है । ५०० वर्ष पुराने यज्ञ की आज पूर्णाहुति हो रही है । आज भगवान श्रीराम के गर्भगृह में अनंत ऊर्जा स्रोत दिव्य-भव्य मंदिर में राम दरबार प्रतिष्ठित हो गया है ।’’

धर्मध्वज व उसपर अंकित प्रतीक

धर्मध्वज

भगवे रंग के इस धर्मध्वज पर कोविदार वृक्ष, ॐ एवं सूर्य चित्रित किए गए हैं । भगवान श्रीराम के वंश के लिए ‘कोविदार वृक्ष’ (जिसे कुछ लोग कांचन, रक्त कांचन, देवकांचन, वनराज, रक्तपुष्प भी कहते हैं) प्रतीक के रूप में इस ध्वज पर अंकित है । इस वृक्ष पर बैंगनी (जामुनी) फूल आते हैं । साथ ही, श्रीराम सूर्यवंशी होने के कारण सूर्यनारायण का चिन्ह भी इस ध्वज पर रेखांकित किया गया है ।

यह धर्मध्वज अनेक किलोमीटर दूर से ही दिखाई देता है । यह ध्वज २२ फुट लंबा एवं ११ फुट चौडा है । ध्वजदंड ४२ फुट ऊंचा है । इस ध्वज का वजन २ से ३ किलो है । इसे १६१ फुट ऊंचे मंदिर शिखर पर फहराया गया । इसके लिए ३६० डिग्री कोण में घूमनेवाले बॉल-बेयरिंग का उपयोग हुआ है ।

इस ध्वज को हाथ से सिलने में २५ दिन लगे । यह ध्वज ‘एविएशन ग्रेड पैराशूट नाइलॉन’ तथा रेशम से तैयार किया गया है । पैराशूट ग्रेड नाइलॉन में सिल्क सैटिन के धागे का उपयोग किया गया है । इसलिए तेज हवाएं, मुसलाधार वर्षा एवं मौसम के परिवर्तन का इस पर तुरंत प्रभावनहीं होगा ।

कोविदार वृक्ष का महत्त्व

कोविदार वृक्ष के विषय में ऐसा माना जाता है कि यह मंदार एवं पारिजात के संकरण (क्रॉस ब्रीडिंग) से उत्पन्न हुआ । यह वर्णन भी मिलता है कि इस वृक्ष को ऋषि कश्यप ने उत्पन्न किया था । इसके गुणों को देखते हुए इसे आयुर्वेद में अत्यंत उपयोगी माना जाता है । इस वृक्ष के फूल, पत्ते एवं छाल अनेक रोगों के लिए औषधि के रूप में उपयोग किए जाते हैं । ऐसा भी माना जाता है कि यह वृक्ष देवताओं को प्रिय है तथा इसके परिसर में निरंतर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है । इसे कांचनार, कचनार या कचनाल जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है । उत्तर भारत में, विशेष रूप से हिमालय के दक्षिणी भाग में यह वृक्ष बडी मात्रा में पाया जाता है । कालिदास के ‘रघुवंश’ एवं ‘मेघदूत’ काव्यों में भी इसका उल्लेख है । प्राचीन भारतीय वैद्यक ग्रंथों में भी कोविदार का विस्तृत वर्णन मिलता है ।