
इस वर्ष मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी के दिन ८ सहस्र ८०० वर्षाें के उपरांत सीता स्वयंवर के मुहूर्त पर भारत के राष्ट्रनिर्माण का दिव्य स्रोत प्रदान करनेवाली अयोध्या नगरी के मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के मंदिर का निर्माण पूर्ण होकर अंत में कलश पर स्वर्ण किनार से युक्त चैतन्यमय धर्मध्वज की स्थापना हुई । यह अलौकिtक दैवी धर्मध्वज सनातन धर्म के पुनरुत्थान तथा पुनर्जागरण के आरंभ का प्रतीक सिद्ध होगा । सनातन धर्म में धर्मध्वज का महत्त्व अनन्यसाधारण है । ध्वज, राष्ट्र के अस्तित्व का सम्मानचिन्ह है । हमारी सनातन परंपरा कहती है, ‘राष्ट्र रामराज्य का प्रतीक होना चाहिए ।’ श्रीराम के सैन्यध्वज की भांति दैवी कोविदार वृक्ष, सूर्यवंशी रघुवंश का प्रतीक, तेजोयम सूर्य और ब्रह्मांड के बीजाक्षर, बीजमंत्र, बीजध्वनि ‘ॐ’ से चिन्हांकित धर्मध्वज श्रीराम मंदिर के कलश पर स्थानापन्न होना, आगामी काल में भारत की राष्ट्रीयत्व की भावना का परिपोष होने का शुभारंभ है । अब श्री रामलला केवल मंदिर में नहीं; अपितु दरबार में स्थानापन्न हुए हैं । आनेवाले समय में हिन्दू राष्ट्र के माध्यम से होनेवाली धर्मसंस्थापना के कार्य के लिए श्रीराम मंदिर के कलश पर फहरानेवाला यह धर्मध्वज श्रीराम का चैतन्यमयी दैवी तत्त्व वातावरण में प्रक्षेपित करता रहेगा और इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रभु के कृपाशीर्वाद से शीघ्र ही रामराज्य की स्थापना भी होगी !
प्रेरणा, गति और ऊर्जा प्रदान करनेवाला धर्मध्वज !

दिव्य, भव्य और नव्य (नई) अयोध्या नगरी में संत-महंतों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी के करकमलों द्वारा २५ नवंबर २०२५ को हुई धर्मध्वज की स्थापना, श्रीरामभक्तों तथा देशभक्तों के लिए परमभाग्यशाली दिन है । यह दिन वास्तव में ऐतिहासिक इसलिए है; क्योंकि इस धर्मध्वज के साक्ष्य से, चैतन्य से, परमपावन दर्शन से और अलौकिक दैवी अस्तित्व से आनेवाले समय में हिन्दुओं को राष्ट्र का पुनरुत्थान, पुनर्निर्माण एवं पुनर्रचना करने की प्रेरणा प्राप्त होगी । प्रभु श्रीराम को अभिप्रेत सनातन राष्ट्र वास्तव में तभी अस्तित्व में आएगा, जब वह पुन: एक बार रामराज्य होगा । यह राष्ट्र ‘रामराज्य’ अर्थात ‘आदर्श राज्य’ होने के लिए आवश्यक दैवी ऊर्जा यह धर्मध्वज अखंडित रूप से प्रत्यक्ष प्रभु श्रीराम द्वारा प्रदानकरेगा । जिस प्रकार श्रीराम मंदिर का निर्माण होने पर करोडों देशभक्तों को हिन्दू राष्ट्र की पुनर्स्थापना की निश्चिति हुई, उसी प्रकार अब उसके कलश पर विराजमान धर्मध्वज से हिन्दू राष्ट्र के कार्य को गति मिलेगी इसकी निश्चिति हुई है । इस निमित्त से यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी विदेशी दास्यत्व की मानसिकता को लताडकर स्वत्व, स्वदेशत्व तथा इस मिट्टी में विद्यमान मूल तत्त्वों का भान दृढ करने का केवल आवाहन ही नहीं किया; अपितु उसके लिए समयमर्यादा भी दी ।
अंतरंग में प्रभु श्रीराम को स्थापित करें !

प्रधानमंत्री मोदी ने इस पावन अवसर को राष्ट्रनिर्माण के धागे में हलके से पिरोकर भारतीयों के लिए अत्यंत व्यापक राष्ट्रनिर्माण का ध्येय दिया । उन्होंने रामभक्तों के मन में न केवल भक्तिभाव के पुष्प खिलाए; अपितु उनमें राष्ट्रभक्ति के नए बीज भी बोए । आगे के १० वर्षाें में पाश्चात्यों के मानसिक दास्यत्व से भारत को मुक्त करने के मोदीजी द्वारा दिए गए ध्येय के आयाम राष्ट्र के शिक्षा संबंधी पाठ्यक्रम में परिवर्तन से आरंभ होकर नागरिकों के दैनिक आहार-विहार से सीधे धर्माचरण तक जाकर पहुंचते हैं । मोदीजी ने अंतरंग में श्रीराम का तत्त्व जागृत करने का आवाहन किया, जो भावी स्वयंपूर्ण भारत की नींव है । प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी ने अपने भाषण में कहा कि विश्व आज भारत की ओर ‘मार्गदर्शन करनेवाले देश’ के रूप में आशा से देख रहा है । यह दायित्व भारत को स्वयं में निर्माण करना होगा और इसके लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामतत्त्व का धर्मध्वज प्रत्येक भारतीय को अपने मनमंदिर में स्थापित करना होगा । ‘प्रभु श्रीराम का दरबार’ अब अस्तित्व में आया, अर्थात उनका राज्य आरंभ हुआ है । इसलिए अब वास्तविक अर्थ से भारत में रामराज्य अवतरित करने का दायित्व शासन सहित प्रजाजनों का भी है । प्रधानमंत्री ने नए से निर्मित सप्तर्षि सहित रामपरिवार के अन्य मंदिरों में जाने का आवाहन किया । प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आगे के १ सहस्र वर्षाें का विचार हमें करना है ।’ इसके लिए कितने भी संकट आएं, विचलित न होते हुए कार्यरत रहने का आवाहन सरसंघचालक ने किया । आध्यात्मिक दृष्टि से भी आगे के १ सहस्र वर्ष यह हिन्दू राष्ट्र अस्तित्व में रहेगा । ऐसा आदर्श राज्य चलाने की आदर्श व्यवस्था का निर्माण अब हिन्दुओं को आरंभ कर देना चाहिए और सबसे पहले स्वयं से करना चाहिए । इसके लिए रामभक्ति की नींव दृढ होनी चाहिए, तो ही प्रभु श्रीराम की कृपा से उन्हें अपेक्षित रामराज्य की दिशा में मार्गक्रमण करना संभव हो पाएगा ।
राममंदिर से राष्ट्रमंदिर की ओर !
अश्वमेध यज्ञ करने के उपरांत पूर्ण पृथ्वी पादाक्रांत करनेवाले प्रभु श्रीराम ने १० सहस्र वर्ष राज्य किया । आज के भारत को केवल आर्थिक ही नहीं; किंतु आध्यात्मिक विकास साध्य करने से ही आगे के सहस्रोें वर्षाें की नींव रचना संभव होगा । तीसरी शताब्दी में राजा विक्रमादित्य ने और छठवीं शताब्दी में राजा स्कंधगुप्त ने अयोध्या में श्रीराम का मंदिर बनाया था । बारहवीं शताब्दी में राजा मेघसेतु ने यहां मंदिर बनाया, जो बाबर ने ध्वस्त किया । पिछले ५०० वर्षाें में करोडों रामभक्त, देशभक्त और संतों द्वारा श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए किए असीम त्याग से आज का श्रीराम मंदिर बन पाया । श्रीराम मंदिर के लिए संघर्ष और प्राणों की आहुति दिए सैकडोें नागरिकों की आत्मा को अब शांति मिली होगी, इसमें कोई दो राय नहीं; परंतु जिस प्रकार भारत को केवल स्वतंत्रता मिली इसी बात पर संतुष्ट रहना उचित नहीं था, किंतु देश का विकास करने का कार्य महत्त्वपूर्ण था, ठीक इसी प्रकार केवल देवतातत्त्व कार्यरत हुआ, इसलिए देवता और देश भक्तों को संतुष्ट रहना उचित नहीं होगा, किंतु उन्हें आदर्श राष्ट्रनिर्मिति के लिए तन और मन अर्पण करना होगा । देश के कोने-कोने में ‘आदर्श व्यवस्था’ निर्माण करने के लिए उन्हें कार्यरत रहना होगा । रामराज्य में सभी को समान न्याय था, महिलाएं सुरक्षित थी, कठोर आज्ञापालन होता था । यह सब प्रत्यक्ष में लाने के लिए शासन को कठोर मेहनत करनी होगी । राजा को प्रजा के प्रति और प्रजा को राजा के प्रति भय और प्रेम, दोनों भी था । ऐसी स्थिति लाने के लिए शासन और जनता, दोनों को भी परिश्रम करने होंगे ।

सुरक्षा, राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य होता है । इस दिशा में भारत के प्रयत्न आरंभ हुए ही हैं; परंतु अभी भी सर्व प्रकार के अंतर्गत जिहादरूपी रावणों को मिटाने के लिए शासन की ‘शून्य सहनशक्ति’ की भूमिका तीव्र नहीं हुई है । हत्या, बलात्कार, अपराध और भ्रष्टाचार परमसीमा पर हैं । इन अपराधियों को रामनाम का अखंड जप करने का दंड दिए जाने पर ही उनमें अंतर्बाह्य परिवर्तन आ सकता है । ऐसी आशा इस निमित्त से करना अनुचित नहीं होगा कि ‘आज श्रीराम मंदिर पर फहराया यह धर्मध्वज ही यह प्रेरणा शासन, प्रशासन और जनता को प्रदान करेगा ।’ ‘मोदीजी को वर्ष २०४७ में अपेक्षित ‘विकसित भारत’, ‘विश्वगुरु भारत’ होना चाहिए’, ऐसा इस धर्मध्वज से प्रक्षेपित होनेवाली वायुतरंगें बता रही हैं । सम्मानपूर्वक फहरानेवाला यह धर्मध्वज बता रहा है कि ‘आनेवाले कुछ वर्षाें में ‘आर्थिक महासत्ता’ बननेवाला भारत ‘आध्यात्मिक महासत्ता’ कहलाएगा । उसकी पुकार सुनकर उसका यथोचित सम्मान रखने के लिए अब शासन के साथ प्रत्येक देशभक्त और देवभक्त को संगठित रूप से रामनाम का जयघोष अपने अंतरंग में बसाना चाहिए !


Waqf Board Scam : समाजवादी पार्टी के शासनकाल में ‘वक्फ बोर्ड’ की भूमि में अरबों रुपये का घोटाला ! — मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी बरेलवी
UP Poster Row : मथुरा (उत्तर प्रदेश) में ‘दिल में बाबर, जुबान पर राम’ लिखा पोस्टर लगाए जाने से समाजवादी पार्टी के नेता अप्रसन्न ।
मुंबई पर २६/११ का आतंकवादी आक्रमण कांग्रेस और आई.एस.आई. (ISI) ने मिलकर कराया था ! – R.V.S. Mani
यदि मुसलमान अपने पूर्वजों की परंपराओं को स्वीकार करें, तो उन्हें हिन्दू राष्ट्र में किसी प्रकार का कोई संकट नहीं होगा ! – Yogrishi Ramdev baba
Sri Mahakaleshwar Temple : मंदिर के पास ४७२ करोड रुपये की सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट) तथा ३०० करोड रुपये मूल्य का स्वर्ण-रजत !
France 24 Media : (और इनकी सुनिए…) ‘छत्रपती शिवाजी महाराज की प्रतिमाएं स्थापित कर मुसलमानों को लक्षित किया जा रहा है !’