भारतवर्ष – आर्यावर्त का विस्तार !

(आर्यावर्त अर्थात कुल, वंश एवं वंशपरंपरा का इतिहास)

भारतीय आर्ष वाङ्मय विश्व का सर्वाधिक प्राचीन साहित्य है, जिसमें ‘ऋग्वेद’ को सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है । भारतीय आर्ष वाङ्मय में विश्व के सभी प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं । 

आर्यावर्त के ऋषियों ने तपस्या तथा अध्यात्मविद्या के माध्यम से संपूर्ण विश्व एवं ब्रह्मांड के रहस्यों को जाना । उन्होंने संपूर्ण विश्व का दिग्दर्शन कर उनका संशोधन तथा निष्कर्ष आर्ष ग्रंथों में किया । विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति से पहले की स्थिति का वर्णन है : नासदीय सूक्त बताता है – ‘सृष्टि से पहले न सत् था, न असत्, न अंधकार था, न प्रकाश । पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, पदार्थ कुछ भी नहीं था । केवल एक विराट चैतन्ययुक्त तत्त्व, विराट ब्रह्म ही था, जिसके संकल्प से सृष्टि उत्पन्न हुई ।’ 

अर्थात, परमात्म की चेतना (डिवाइन एनर्जी) से सृष्टि की उत्पत्ति हुई – सूक्ष्म से स्थूल की, चेतना से पदार्थ की निर्मिति हुई । आज का आधुनिक विज्ञान तथा पश्चिम देश के वैज्ञानिक भी इसी सत्य की खोज में हैं ।

परमात्मा की ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ संकल्पना से सृष्टिचक्र का आरंभ हुआ । ओंकार (ॐ) स्वरूप विराट ब्रह्म, परमात्मा ने त्रिदेवों के रूप में स्वयं को प्रकट किया तथा उन त्रिदेवों से ही सृष्टिचक्र की संतति निर्माण प्रक्रिया आरंभ हुई ।

आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किञ्चन मिषत् ।

स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ।।

– ऐतरेयोपनिषद्, अध्याय १, खंड १, श्लोक १

अर्थ : ‘प्रारंभ में केवल एकमेव आत्मा (परमात्म चैतन्य) थी । उसके अतिरिक्त इस संसार में और कोई भी नहीं था । उसने (परमात्म चैतन्य ने) सोचा, ‘‘मैं स्वयं ही लोकों की निर्मिति करूंगा ।’ 

अर्थात, पहले केवल एक आत्मा थी, अन्य कोई भी तत्त्व नहीं था । उसने अपनी इच्छा से लोकों की रचना की । सभी प्राणियों में व्याप्त यही (परमात्म चैतन्य) जानने योग्य है ।

१. आर्य कौन हैं ? 

सनातन धर्म के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं ऋषियों की संतानें आर्य हैं । ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश के अनेक पुत्र-पुत्रियां थीं । इन सभी पुत्र-पुत्रियों से ही देव (सुर), दैत्य (असुर), दानव, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, वानर, नाग, निषाद, मातंग, ऋक्ष, भिल्ल, किरात, अप्सरा, विद्याधर, सिद्ध, निशाचर, वीर, गुह्यक, कुलदेव, स्थानदेव, ग्रामदेवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वैताल, क्षेत्रपाल, मानव इत्यादि की उत्पत्ति हुई ।

वंशलेखक, तीर्थ-पुरोहितों, पंडों तथा वंशपरंपरा के वाचक- संवाहक द्वारा संपूर्ण आर्यावर्त के निवासियों को एकत्रित रखने के लिए किया यह अभूतपूर्व प्रयास निश्चित ही वैदिक ऋषि परंपरा का एक अद्यतन तथा आदर्श उदाहरण माना जा सकता है । पुराणों के अनुसार द्रविड, चोल, पांड्ये जातियों की उत्पत्ति में राजा नहुष का बडा योगदान माना जाता है । वे इलावर्त के चंद्रवंशी राजा थे । पुराण भारतीय इतिहास का उद्गम जलप्रलय तक ले जाते हैं तथा उसी स्थान से वैवस्वत मन्वंतर का आरंभ होता है ।

वेदों में पंचनद का उल्लेख है – भारत के वंशों का विस्तार पांच प्रमुख कुलों से हुआ ।

डॉ. नितीन सहारिया

२. विभाजित वंश 

वर्तमान में संपूर्ण हिन्दू अथवा सनातनी वंश गोत्र, प्रवर, शाखा, वेद, शार्मा, गण, शिखा, पाद, तिलक, छत्र, माळा, देवता (शिव, विनायक, कुलदेवी, कुलदेवता, इष्टदेवता, राष्ट्रदेवता, गोष्ठदेवता, भूमिदेवता, ग्रामदेवता, भैरव, यक्ष) आदि में विभाजित हैं । समाज बढने के साथ गण तथा गोत्र में अनेक भेद निर्माण हुए । परतंत्रता के समय अथवा समय बीतने पर अनेक समाज तथा लोगों ने ये सब छोड दिया तथा ऐसे लोगों की पहचान कश्यप गोत्र मानी जाती है ।

संपूर्ण अखंड भारत अर्थात अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, बर्मा इत्यादि के हम सभी निवासी मानव, प्रमुख वंशों से ही संबंधित हैं । समय के साथ उनकी जाति, धर्म तथा प्रांत में परिवर्तन होता गया; परंतु वे सभी एक ही कुल तथा वंश के हैं ।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं : ‘जब कोई व्यक्ति कुलधर्म छोडता है, तब कुल का नाश होता है । इस प्रकार वह व्यक्ति अपना मूल तथा पूर्वजों को सदा के लिए भूल जाता है । जो अपना कुलधर्म तथा परंपरा को छोडकर अन्य कुल, धर्म एवं परंपरा को स्वीकारता है, वह कुलहंता कहलाता है । जो वृक्ष अपनी जडों से ईष्या करता है, उसका कभी विकास नहीं हो सकता ।’

३. ब्रह्मकुल 

ब्रह्माजी की तीन प्रमुख पत्नियां थीं । उन तीनों से ही उन्हें पुत्र तथा कन्याएं प्राप्त हुईं । साथ ही उनके मानस पुत्र भी थे, जिनमें से प्रमुख मानसपुत्र हैं : १. अत्रि, २. अंगिरस, ३. भृगु, ४. कर्दम, ५. वसिष्ठ, ६. दक्ष, ७. स्वयंभुव मनु, ८. कृतू, ९. पुलह, १०. पुलस्त्य, ११. नारद, १२. चित्रगुप्त, १३. मरीचि, १४. सनक, १५. सनंदन, १६. सनातन, १७. सनत्कुमार

४. स्वयंभुव मनुकुल 

अ. स्वयंभुव मनु तथा शतरूपा के कुल में ५ संतानें हुईं । दो पुत्र – प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा ३ कन्या – आकूति, देवहुति, प्रसूति ।

आ. आकूति का विवाह ऋचि प्रजापति से हुआ । प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ । देवहुति का विवाह प्रजापति कर्दम से हुआ । ऋचि तथा आकूति को १ पुत्र हुआ, जिसका नाम यज्ञ रखा गया । उनकी पत्नी का नाम दक्षिणा था । देवहुति ने ९ कन्याओं को जन्म दिया जिनका विवाह प्रजापति अथवा सप्तर्षि से हुआ ।

इ. देवहुति को एक पुत्र प्राप्त हुआ जो महान कपिल ऋषि के रूप में जाने जाते हैं । उनका जन्म भारत के कपिलवस्तु में हुआ था तथा वे तत्त्वज्ञानप्रणाली सांख्यदर्शन के प्रवर्तक थे । उन्होंने ही सगर राजा के १०० पुत्रों को अपने शाप से भस्म किया था ।

ई. स्वयंभुव मनु तथा शतरूपा के २ पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपाद ! राजा उत्तानपाद की २ पत्नियां थीं, सुनीति एवं सुरुचि । सुनीति से ध्रुव नाम का पुत्र और सुरुचि से उत्तम नाम का पुत्र हुआ । ध्रुव ने तपश्चर्या और अटल निश्चय से अपार कीर्ति प्राप्त की ।

उ. स्वयंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्माजी की कन्या बहिष्मती से विवाह किया । उन्हें अग्निध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि, ऐसे १० पुत्रों की प्राप्ति हुई । प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस एवं रैवत नामक ३ पुत्र हुए, जो उनके नाम के मन्वंतरों के अधिपति हुए । महाराज प्रियव्रत के १० पुत्रों में से कवि, महावीर एवं सवन नामक ३ निष्ठावान ब्रह्मचारी थे तथा उन्होंने संन्यासधर्म स्वीकार किया था ।

ऊ. महाराज मनु ने सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर अनेक वर्ष राज्य किया । उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी । उन्हीं के हाथों से मनुस्मृति की रचना हुई, जो आज मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं; इसलिए कभी- कभी प्रचलित विधानों में विरोधाभास दिखता है; परंतु फिर भी वह संपूर्ण मानवजाति के आचरण की संहिता है, इसमें कोई संदेह नहीं ।

प्रजा का पालन करते हुए जब महाराज मनु को मोक्ष की इच्छा हुई, तब उन्होंने संपूर्ण राज्य अपने बडे पुत्र उत्तानपाद को सौंप दिया तथा एकांतवास के लिए नैमिषारण्य तीर्थक्षेत्र की ओर अपनी पत्नी शतरूपा के साथ प्रस्थान किया; परंतु उत्तानपाद की अपेक्षा उनके दूसरे पुत्र प्रियव्रत की कीर्ति अधिक थी । महाराज मनु ने सुनंदा नदी के किनारे १०० वर्ष तपश्चर्या की । पति-पत्नी दोनों ने ही नैमिषारण्य के पवित्र तीर्थक्षेत्र में गोमती नदी के किनारे दीर्घकाल तपश्चर्या की । (शेष पृष्ठ १४ पर)

५. प्रियव्रत कुल

राजा प्रियव्रत के बडे पुत्र अग्निध्र जंबू द्वीप के अधिपति बने । अग्निध्र के ९ पुत्र जंबू द्वीप के ९ खंडों के स्वामी माने गए । उनके नौ पुत्रों के नाम पर नौ खंड बने : १. इलावृत वर्ष, २. भद्राश्व वर्ष, ३. केतुमाल वर्ष, ४. कुरु वर्ष, ५. हिरण्यमय वर्ष, ६. रम्यक वर्ष, ७. हरिवर्ष, ८. किंपुरुष वर्ष, ९. हिमालय से लेकर समुद्र तक के भूभाग को नाभिखंड कहते हैं ।

नाभि और कुरु, ये दोनों वर्ष धनुष्य के आकार के हैं, ऐसा वर्णन किया गया है । नाभि का पुत्र ऋषभ हुआ और उससे भरत और बाहुबली का जन्म हुआ । भरत के नाम पर आगे इस नाभिखंड को ‘भारतवर्ष’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा । बाहुबली को वैराग्य प्राप्त होने के उपरांत ऋषभ ने भरत को चक्रवर्ती सम्राट बनाया ।

आगे भरत को भी वैराग्य आया, इसलिए उसने अपना राज्य उसके बडे पुत्र को सौंप दिया तथा वह वनवास चला गया । स्वयंभुव मनु के काल के ऋषि अर्थात मरीचि, अत्रि, अंगीरस, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य तथा वसिष्ठ । उन्हीं के प्रयासों के कारण मानव को सभ्य, सुविधायुक्त तथा सुसंस्कृत बनाने का महान कार्य किया गया । इस प्रकार भारतवर्ष की स्थापना में इन महान वंशों का अमूल्य तथा अविस्मरणीय योगदान है ।

– डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल, मध्य प्रदेश.