प.पू. भक्तराज महाराजजी की कृपा से साधक का विभिन्न व्यसनों से मुक्त होना

प.पू. भक्तराज महाराजजी

१. साधना में आने से पूर्व साधक को अनेक व्यसन होना

‘मैंने वर्ष १९९८ में घाटकोपर (मुंबई) से साधना आरंभ की । वर्ष २००० से मैं नवीन पनवेल (रायगड) में रहने के लिए आया । साधना में आने से पूर्व मुझे मदिरापान करना, पान एवं तंबाकू चबाना, सिगरेट एवं चिलम पीना इत्यादि व्यसन थे । उसमें भी सिगरेट पीना, पान खाना तथा मदिरापान करने का व्यसन अधिक मात्रा में था ।

२. साधना आरंभ करने पर मदिरापान का व्यसन छूट जाना; परंतु अन्य व्यसन चलते रहना

वर्ष १९९८ में साधना में आने के तुरंत उपरांत मैंने सत्संग में जाना आरंभ किया । उसके कुछ दिन उपरांत मेरा मदिरापान का व्यसन छूटा; परंतु पान खाना तथा सिगरेट पीना जारी था । साधना से मदिरापान का मेरा व्यसन छूटा, पर इससे मैं संतुष्ट नहीं था । मैंने मेरी संतुष्टि के लिए पान खाना तथा सिगरेट पीना जारी रखा ।

श्री. विलास सुर्वे

३. अनेक प्रयास करने पर भी साधक का पान खाने का व्यसन न छूटना

३ अ. पान खाने की आदत के कारण सेवा करते समय मन अस्वस्थ होना : एक दिन मैं पान खाते-खाते ही ग्रंथ प्रदर्शनी कक्ष पर सेवा कर रहा था । उस समय ‘पान खाते हुए प्रदर्शनी कक्ष पर सेवा करना उचित नहीं है’, इस विचार से मेरा मन अस्वस्थ हुआ । उसके उपरांत मैंने स्वयं ही यह सुनिश्चित किया कि सेवा करते समय पान खाना उचित नहीं है । जब मैं सेवा में नहीं होता, तब मैंने पान खाया, तो चलेगा । उसके उपरांत ‘पान खाना साधक के लिए अच्छा नहीं है’ जैसे विचार मेरे मन में आ रहे थे; परंतु तब भी पान खाने की आदत पर मैं नियंत्रण नहीं रख पा रहा था ।

३ आ. रेल में पान विक्रेता को पान बेचते देखकर पान खाने का मोह टाल न पाना : एक बार मैं तथा मेरा परिवार रेल से बहादुरगढ (हरियाणा) जा रहे थे । उस समय मैंने निश्चय किया, ‘रेलयात्रा में पान नहीं खाऊंगा’, यह सोचकर रेल में बैठ गया । सूरत रेलस्थानक पर एक पान विक्रेता गाडी में आया । उसे पान बेचते हुआ देखकर मैं पान खाने का मोह रोक नहीं पाया तथा मैंने पान खाया । पान खाने पर मुझे ‘पान न खाने का निश्चय करने पर भी मैं मन पर नियंत्रण नहीं रख सकता’, इस विचार से बुरा लग रहा था । मेरे मन में यह विचार भी आने लगा कि इस प्रसंग में ‘क्या प.पू. भक्तराज महाराजजी मेरी परीक्षा ले रहे हैं ?’ मैंने आज तक रेल में कभी कोई पान विक्रेता नहीं देखा था । यह प्रसंग घटित होने के पश्चात आगे हरियाणा पहुंचने पर मैंने पुनः पान न खाने का निश्चय किया; परंतु वहां भी मेरे मन का संयम टूट रहा था तथा उसका मुझे बुरा लग रहा था ।

३ इ. अनेक बार प्रयास करने पर भी पान खाने पर नियंत्रण रखना संभव न हो पाना : एक सप्ताह उपरांत हरियाणा से मुंबई लौटते समय मैंने मन में दृढ निश्चय किया कि ‘अब पान नहीं खाऊंगा ।’ रेलयात्रा में मैं जहां बैठा था, उस आसन के नीचे मुझे गुटका के दो पैकेट मिले । वह देखकर जब मैं ‘मुझे गुटका खाना चाहिए या नहीं’, इस विचार में था, तभी मैंने गुटका कब खाया, यह मेरे ध्यान में ही नहीं आया । उसके उपरांत मैंने मन में ऐसा निश्चय किया कि ‘अब मुंबई पहुंचने पर मैं बिल्कुल भी पान नहीं खाऊंगा’; परंतु तब भी दूसरे दिन मुंबई पहुंचते ही मैंने पान खा लिया । तब पश्चाताप करने के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं था ।

४. प.पू. भक्तराज महाराजजी की समाधि के दर्शन करने हेतु कांदळी जाने पर वहां हुई अनुभूति

४ अ. प.पू. भक्तराज महाराजजी के समाधिस्थल के दर्शन करने हेतु जाते समय साधक को बस में महाराजजी के बार-बार दर्शन होना : एक बार हम सभी साधक प.पू. भक्तराज महाराजजी के समाधिस्थल के दर्शन करने कांदळी जाने के लिए बस से यात्रा कर रहे थे । यात्रा में सभी साधक प.पू. भक्तराज महाराजजी के भजन गा रहे थे । उसके ४ से ५ घंटे उपरांत जब हमारी बस घाटी में थी, उस समय मुझे गाडी में ‘प.पू. भक्तराज महाराजजी का मुखमंडल दिखाई दिया तथा वे निरंतर मेरी ओर देख रहे हैं’, ऐसा दृश्य दिखाई दिया ।

४ आ. बस में निरंतर प.पू. भक्तराज महाराजजी का मुखमंडल दिखाई देने से मन अस्वस्थ होकर वहां से घर वापस जाने की इच्छा होना : मेरे पीछे के आसन पर बैठे एक साधक के पास पान बनाने की सामग्री थी । उन्होंने मुझे पूछा, ‘सुर्वे, क्या आप पान खाएंगे ?’ उस समय मैंने उन्हें मना कर दिया । उस समय मुझे सामने प.पू. भक्तराज महाराजजी का मुखमंडल दिखाई दे रहा था । ‘यह क्या हो रहा है’, इस विचार से मैं अस्वस्थ था । अंततः क्रोधित होकर मैंने मेरे निकट बैठे साधकों से कहा, ‘मुझे अस्वस्थ लग रहा है । मैं अभी के अभी घर वापस जाऊंगा ।’ उस पर उन्होंने हंसकर मुझे कहा, ‘आप बैठिए सुर्वे काका ! सब कुछ ठीक होगा ।’ उसके उपरांत मैं शांति से बैठ गया । तब भी मुझे बार-बार प.पू. बाबा ही दिखाई दे रहे थे । वे निरंतर मेरी ओर देख रहे थे । कुछ समय पश्चात हम सभी साधक प.पू. बाबा के समाधिस्थल कांदळी पहुंचे ।

४ इ. प.पू. भक्तराज महाराजजी की आसंदी (कुर्सी) के दर्शन करते समय साधक द्वारा उन्हें पान खाना तथा सिगरेट पीना छोडने का आश्वासन देना : सभी साधक प.पू. भक्तराज महाराजजी के समाधिस्थल के पास गए । वहां समाधि की पिछली बाजू में प.पू.    भक्तराज महाराजजी द्वारा उपयोग की गई आसंदी (कुर्सी) रखी गई थी । सभी साधक एक कतार में प.पू. भक्तराज महाराजजी की आसंदी (कुर्सी) के दर्शन कर रहे थे । उसके उपरांत मेरी बारी आई । उस समय मेरी समझ में नहीं आया कि मुझे क्या हुआ । कदाचित ‘प.पू. बाबा यात्रा में मेरी ओर क्यों देख रहे थे’, इसका अर्थ मेरी समझ में आ गया था । तब मैंने एकदम से प.पू. बाबा की आसंदी (कुर्सी) को साष्टांग नमस्कार कर कहा, ‘बाबा, मैंने आज से पान खाना एवं सिगरेट पीना छोड दिया है ।’

४ ई. प.पू. भक्तराज महाराजजी की कृपा से सभी व्यसन छूटना : दूसरे दिन हमने वापसी की यात्रा आरंभ की । अब बस में मुझे
प.पू बाबा का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था । यात्रा में एक स्थान पर रुकने पर एक साधक ने मुझसे पूछा, ‘सुर्वे काका, क्या आप पान खाएंगे ?’ तब मैंने उनसे आनंद से कहा, ‘मैंने आज से पान खाना छोड दिया है, अतः इसके आगे कृपया आप मुझसे पान खाने के लिए मत पूछिए ।’ तब से गुरुकृपा से पान के साथ ही मेरे अन्य सभी व्यसन भी छूट गए ।

वर्ष १९९८ से वर्तमान में वर्ष २०२५ तक मैंने कोई भी व्यसन नहीं किया है । अब मुझे सौंफ खाने की भी इच्छा नहीं होती । प.पू. बाबा, ‘आप ही की कृपा से मेरे सभी व्यसन छूट पाए तथा मेरी सेवा जारी है’; इसके लिए आपके चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !’

– श्री. विलास सुर्वे (आयु ६९ वर्ष), सनातन संकुल, देवद, पनवेल (२३.५.२०२५)

इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । – संपादक