आरोपी पर असत्य आरोप लगाकर अयोग्य प्रमाण प्रस्तुत किए गए !

चेन्नई (तमिलनाडु) – अमली पदार्थ विरोधी प्रकरण में असत्य प्रमाण सिद्ध कर एवं अयोग्य साक्ष्य देकर अपराध सिद्ध करने के कारण मद्रास उच्च न्यायालय के मदुराई खंडपीठ ने ३ पुलिस अधिकारियों पर १० लाख रुपये का दंड लगाया है । न्यायालय ने कहा कि इन अधिकारियों ने अमली पदार्थ एवं मनोचिकित्सकीय पदार्थ अधिनियम (अमली पदार्थ नियंत्रण अधिनियम) के अंतर्गत अनुचित दोषारोपण करने के लिए षड्यंत्र रचा था ।
🚨 Madras HC slams 3 police officers for framing an innocent man!
The court found they fabricated evidence and gave false testimony in a fake NDPS case, sentencing an innocent person to 10 years in jail.
👉 Shouldn’t these officers face criminal trial & jail time for such a… pic.twitter.com/LpK0k5vEZL
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) October 28, 2025
न्यायालय ने आरोपी को निर्दोष ठहराया
विशेष न्यायालय ने २४ किलोग्राम गांजा रखने का आरोप लगाकर एक व्यक्ति को १० वर्ष का सश्रम कारावास एवं १ लाख रुपये का दंड, ऐसी शिक्षा सुनाई थी । उच्च न्यायालय ने इस आरोपी को निर्दोष ठहराते हुए कहा कि –
१. सरकारी पक्ष के तर्क पूर्णतया काल्पनिक थी एवं विश्वसनीय प्रमाणों से सिद्ध नहीं होती थी । पुलिस ने न्यायालय के समक्ष असत्य प्रमाण प्रस्तुत कर दंड प्रदान करने के लिए आपसी संगठित प्रयास किया था । संपूर्ण अभियोग बनावट दस्तावेजों एवं अधिकारियों की परस्परविरोधी साक्ष्यों पर आधारित था ।
२. जिसे गुप्त सूचना प्राप्त हुई थी, उस उपनिरीक्षक ने कहा कि उसने वह सूचना हस्तलिखित रूप में लिखी थी; परंतु न्यायालय में प्रस्तुत प्रतिवेदन टंकलिखित था ।
३. दूसरे अधिकारी ने कहा कि उसने उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे; परंतु प्रमाणों के अनुसार वह हस्ताक्षर किसी अन्य व्यक्ति का था ।
४. इससे स्पष्ट होता है कि अभियोग में असत्य प्रमाण प्रस्तुत किए गए थे । यह आचरण आरोपी के निष्पक्ष अन्वेषण एवं न्यायप्रक्रिया के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है । सरकारी पक्ष कानून की धारा ४२ का प्रमाण प्रस्तुत करने में तो असफल रहा ही, साथ ही अयोग्य प्रमाणों के माध्यम से दंड दिलाने का भी प्रयास किया गया । इन विरोधाभासों से साक्षियों के मध्य दंड दिलाने हेतु किया गया एकमत स्पष्ट दिखाई देता है ।
५. तीनों पुलिस अधिकारी एक मास के भीतर आरोपी को संयुक्त रूप से १० लाख रुपये की क्षतिपूर्ति दें । साथ ही पुलिस महानिदेशक इन अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई आरंभ करें । संबंधित प्राधिकरण इस निर्णय में उल्लिखित निरीक्षणों की स्वतंत्र जांच करे ।
संपादकीय भूमिका
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