सरकारी अनुदानों का दुरुपयोग : छद्म (बनावटी) अल्पसंख्यक विद्यालयों का पता लगाने के लिए अब विद्यालयों का डिजिटल पंजीकरण होगा !

शिक्षामन्त्री दादाजी भुसे

मुम्बई, २२ अक्तूबर (वार्ता) – सरकार से मिलनेवाला अनुदान एवं सुविधाएं हडपने के लिए छद्म छात्र संख्या दिखाकर राज्य में बडे स्तर पर ‘अल्पसंख्यकों के बनावटी विद्यालय’ कार्यरत हैं । ऐसे छद्म विद्यालयों का पता लगाने के लिए अल्पसंख्यक विभाग द्वारा अल्पसंख्यक विद्यालयों का नए सिरे से डिजिटल पंजीकरण आरम्भ किया गया है । ‘अल्पसंख्यक विद्यालय’ की श्रेणी दिए गए सभी विद्यालयों का २० नवम्बर तक ‘डिजिटल पंजीकरण’ पूर्ण करने के निर्देश सरकार द्वारा दिए गए हैं । इस कारण राज्य के बनावटी अल्पसंख्यक विद्यालयों की वास्तविकता उजागर होनेवाली है ।

‘अल्पसंख्यक विद्यालयों’ की श्रेणी में रहनेवाले प्रत्येक विद्यालय का पंजीकरण पडताल करने का निर्देश अल्पसंख्यक विकास विभाग द्वारा जिलाधिकारियों को दिया गया है । वर्तमान में यह कार्य युद्धस्तर पर जारी है । जुलाई २०२५ में हुए विधिमण्डल के बजट से संबंधित अधिवेशन में भाजपा के विधायक प्रशांत बम्ब ने इस विषय में तारांकित प्रश्न उपस्थित किया था । उस पर शिक्षामन्त्री दादाजी भुसे ने ‘अल्पसंख्यकों के बनावटी विद्यालयों का पता लगाने के लिए विशेष मुहिम चलाई जाएगी’, ऐसा आश्वासन दिया था । तदनुसार यह खोज मुहिम आरम्भ की गई है ।

बडा अपहार: शासकीय अधिकारियों के सहभाग की भी सम्भावना ।

अल्पसंख्यक विद्यालय की श्रेणी प्राप्त होने पर प्रतिवर्ष उस स्कूल को मूलभूत सुविधाओं के लिए २लाख रुपये तक का अनुदान प्राप्त होता है, साथ ही ‘शिक्षा का अधिकार कानून’ के अनुसार पिछडे समाज के विद्यार्थियों को विद्यालय में आरक्षण देने का नियम लागू नहीं होता है । यह लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ संस्थाचालकों ने इस योजना में बडा घोटाला किया है, ऐसा दिखाई दिया है । इस में कुछ शासकीय अधिकारी भी सम्मिलित होने की सम्भावना है ।

संपादकीय भूमिका

  • केवल छद्म विद्यालयों का अल्पसंख्यक श्रेणी निरस्त कर के नहीं चलेगा, अपितु जिन संस्थाचालकों ने झूठा श्रेणी पाने के लिए आवेदन किया है एवं झूठा श्रेणी देनेवाले अधिकारी हैं, उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए ।
  • राज्य में इतने बडे स्तर पर अल्पसंख्यकों के झूठे विद्यालय खडे हुए ही क्यों ? वे खडे ही न हों, इस के लिए सुरक्षा तंत्र कार्यरत क्यों नहीं है ?