‘घर में, साथ ही खेत में आनेवाले उपद्रवी कीडों तथा प्राणियों को मारने से पाप लगता है अथवा नहीं’, इस संबंध में आध्यात्मिक विश्लेषण !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

प्रश्न : ‘घर में, साथ ही खेत में आनेवाले उपद्रवी कीडे अथवा पशु, उदा. मच्छर, खटमल, चूहे, बिच्छू आदि को स्वयं की अथवा वास्तु की रक्षा के लिए मारना पडता है । तो क्या उन्हें मारनेवाले व्यक्ति को पाप लगता है ?’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

‘घर में, साथ ही खेत में आनेवाले उपद्रवी कीडे अथवा पशु, उदा. मच्छर, खटमल, चूहे, बिच्छू, छिपकली आदि को स्वयं की अथवा वास्तु की रक्षा के लिए मारना पडता है । तो क्या उन्हें मारनेवाले व्यक्ति को पाप लगता है ?’ इस विषय में ईश्वर की कृपा से मुझे प्राप्त ज्ञान आगे दिया गया है ।

१. घर, मंदिर, आश्रम एवं खेत जैसे स्थानों पर उपद्रवी कीडों के तथा प्राणियों के आने के आध्यात्मिक कारण !

श्री. राम होनप

१ अ. पिछले जन्म की शत्रुता : अपने पूर्व जन्मों में व्यक्ति द्वारा किए कुछ अनुचित कर्मों से, जाने-अनजाने कुछ जीवों को आहत किया होता है । ऐसे जीव उस व्यक्ति के वर्तमान जन्म में उपद्रवी कीडे अथवा प्राणियों के रूप में जन्म लेकर उसे कष्ट पहुंचाते हैं । ऐसा कर वे जीव अपने मन में उस व्यक्ति के प्रति द्वेष अथवा क्लेश व्यक्त करते हैं । ऐसे कीडे अथवा प्राणी उस व्यक्ति के वर्तमान जन्म के शत्रु हो सकते हैं । अतः ऐसे कीडों अथवा प्राणियों को उस व्यक्ति के ‘गतशत्रु’ कहा गया है ।

१ आ. पूर्वजन्म की मित्रता : घर में, साथ ही खेत में विचरण करते समय कुछ उपद्रवी कीडे एवं प्राणी उस घर को अथवा वहां रहनेवाले व्यक्तियों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाते । उस घर के व्यक्तियों से ऐसे कीडों एवं प्राणियों की पिछले जन्म की मित्रता हो सकती है; इसलिए ऐसे कीडे एवं प्राणी वर्तमान जन्म में उसके मित्र के घर में बिना किसी को कष्ट पहुंचाए वास करते हैं; इसके कारण ऐसे जीवों को उस घर के व्यक्तियों का ‘गतमित्र’ कहा जाता है ।

१ इ. पिछले जन्म के हितचिंतक, संबंधी अथवा अतृप्त पूर्वज : कुछ उपद्रवी कीडे एवं प्राणी उस व्यक्ति के पिछले जन्म के हितचिंतक, संबंधी अथवा अतृप्त पूर्वज हो सकते हैं । पिछले जन्मों के पापकर्माें के कारण वर्तमान जन्म में उन्हें उपद्रवी कीडे अथवा प्राणी के रूप में जन्म मिला होता है । ऐसे जीवों को उसके प्रिय व्यक्ति, घनिष्ठ संबंधी अथवा उससे प्रेम रखनेवाले व्यक्तियों की गृहस्थी को निकटता से देखने की इच्छा होती है । इसलिए उपद्रवी कीडे अथवा प्राणी उस व्यक्ति के घर में अथवा खेत में रहते हैं; परंतु वे उस परिवार को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाते ।

१ ई. प्राकृतिक स्थिति : घर के आसपास सुंदर प्रकृति हो, तो भी घर में उपद्रवी कीडे अथवा प्राणी चले आते हैं ।

१ उ. मुक्ति की इच्छा : कुछ उपद्रवी कीडे अथवा प्रणियों को उस योनि से शीघ्र मुक्त होना होता है; इसलिए वे मंदिर अथवा आश्रम में रहने लगते हैं । ऐसे स्थानों पर किसी भी कारणवश मृत्यु हुई, तो उससे उन उपद्रवी कीडों अथवा प्राणियों को शीघ्र ही सद्गति प्राप्त होती है ।

१ ऊ. स्थानदेवता का कोप : गांव के लोगों में पापाचरण बढा अथवा यदि वे सनातन धर्म से दूर चले गए, तो उन पर वहां के स्थानदेवता का कोप होता है । उस समय उस स्थान पर स्थित घरों अथवा खेतों में उपद्रवी कीडों एवं प्राणियों की संख्या बहुत बढ जाती है । ऐसी स्थिति में वहां के लोगों ने अपने आचरण में सुधार कर स्थानदेवता की पूजा-अर्चना की, तो ये संकट अल्प होते हैं ।

२. उपद्रवी कीडों एवं प्राणियों को मारने का पाप न लगे; इसके लिए ध्यान में लेनेयोग्य सूत्र

२ अ. विवश होकर मारने की भावना महत्त्वपूर्ण : प्रत्येक कीटक एवं प्राणी का जन्म एवं मृत्यु उनके प्रारब्ध के अनुसार होता रहता है । यह गणित अत्यंत सूक्ष्म है । व्यक्ति के पास जो उपद्रवी कीडे एवं प्राणी होते हैं, वे ‘मेरे गतमित्र, गतशत्रु, हितचिंतक अथवा अतृप्त पूर्वज हैं’, इसका उसे ज्ञान नहीं होता । इसलिए वह व्यक्ति बिना द्वेषभाव रखे ‘उपद्रवी कीडों एवं प्राणियों को मारे, साथ ही उन्हें मारना ही पडे, तो मैं उन्हें विवशतावश, स्वरक्षा अथवा वास्तु की रक्षा हेतु मार रहा हूं’, इसका भान रखना महत्त्वपूर्ण है ।

२ आ. अहंरहित कृति होना आवश्यक : उपद्रवी कीडों अथवा प्राणियों को मारने की कृति नामजप के साथ होना आवश्यक है, साथ ही व्यक्ति को उसका कर्तापन ईश्वर को अर्पण करना महत्त्वपूर्ण है । अन्यथा अहंयुक्त कृति करने से उस व्यक्ति को ऐसी कृतियों के कारण पाप लग सकता है ।’

– श्री. राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (११.४.२०२५)