‘लक्ष्मीमाता की कृपा से ही मनुष्य को धन, वैभव एवं सुखसंपत्ति की प्राप्ति होती है । श्री लक्ष्मी के ८ भिन्न-भिन्न रूपों को ‘अष्टलक्ष्मी’ कहा जाता है । ‘आदिलक्ष्मी’, ‘धनलक्ष्मी’, ‘विद्यालक्ष्मी’, ‘धान्यलक्ष्मी’, ‘धैर्यलक्ष्मी’, ‘संतानलक्ष्मी’, ‘विजयलक्ष्मी’ एवं ‘राजलक्ष्मी’, ये अष्टलक्ष्मियां हैं । अष्टलक्ष्मियों की आराधना से मनुष्य की सभी समस्याओं का नाश होता है तथा उसे समृद्धि, धन, यश, ऐश्वर्य एवं संपन्नता प्राप्त होती है । २६.९.२०२४ के भक्तिसत्संग में श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी ने अष्टलक्ष्मियों की महिमा विशद की; परंतु अष्टलक्ष्मियों के इन ८ रूपों का आध्यात्मिक रहस्य, साथ ही मैं ‘इन आठों तत्त्वों के उन्हीं में (श्रीसत्शक्ति [श्रीमती] बिंदा नीलेश सिंगबाळजी में) कार्यरत होने की अनुभूति कैसे कर पाई ?’, इसे मैं कृतज्ञभाव से उनके चरणकमलों में समर्पित कर रही हूं ।
इस वर्ष की नवरात्रि में ७.१०.२०२५ को भक्तिसत्संग को ९ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । उस निमित्त अपनी दिव्य, मधुर एवं चैतन्यमय वाणी द्वारा साधकों को प्रति सप्ताह भक्तिसत्संग रूपी भक्ति-प्रसाद प्रदान करनेवालीं अष्टलक्ष्मी स्वरूप श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !
१. आदिलक्ष्मी
‘हम कौन हैं ?, हम इस पृथ्वी पर क्यों आए हैं ? तथा मृत्यु के उपरांत हम कहां जाएंगे ?’, इस प्रकार से हमारे मूल स्रोत का ज्ञान होना’ ही ‘आदिलक्ष्मी’ हैं ! सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के मार्गदर्शन में गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करते समय जो प्रत्येक साधक का साधना के विषय में अखंड मार्गदर्शन करती हैं, वे ही ‘आदिलक्ष्मी’ स्वरूपिणी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी हैं !

२. धनलक्ष्मी
महालक्ष्मी धनसंपत्ति की देवी हैं; इसलिए उन्हें ‘धनलक्ष्मी’ कहा जाता है । ‘हमारे पास जो धन होता है, वह इन्हीं ‘धनलक्ष्मी’ का ही प्रसाद है, इस भाव से यदि हमने उसका सम्मान एवं सदुपयोग किया, तभी धनलक्ष्मी हमारे यहां स्थिर होती हैं । जो हमें माया के अशाश्वत धन की आसक्ति में बिना लिप्त हुए आध्यात्मिक गुण रूपी धन अर्जित करना सिखाती हैं, वे ‘धनलक्ष्मी’ श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी हैं ।
३. विद्यालक्ष्मी
विद्या एवं ज्ञान प्रदान करनेवालीं लक्ष्मी का रूप हैं ‘विद्यालक्ष्मी’ ! विद्या एवं ज्ञान के कारण ही हमारे जीवन में स्थिरता आती है । शिक्षा वास्तविक विद्या नहीं है; अपितु ‘हम जो सीखते हैं, उसके अनुसार आचरण करना’ वास्तविक विद्या है । वैसा करने से ही हमें ‘विद्यालक्ष्मी’ का आशीर्वाद प्राप्त होता है । महालक्ष्मी स्वरूपिणी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी सभी साधकों को अपने आचरण से सिखाती हैं कि ‘प्रत्येक सेवा अच्छे ढंग से तथा परिपूर्ण कैसे करनी है ?’ सेवा भावपूर्ण एवं परिपूर्ण कर उसे श्री गुरुचरणों में समर्पित करने की विद्या (आशीर्वाद) जो हमें प्रदान करती हैं, वे हैं ‘विद्यालक्ष्मी’ रूपी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी !
४. धान्यलक्ष्मी
धान्य अर्थात अन्न ! हमारे पास धन हो; परंतु धान्य न हो, तो हम जीवित कैसे रह पाएंगे ? इससे ‘धान्यलक्ष्मी’ की हमारे जीवन में आवश्यकता हमारे ध्यान में आती है । ‘जहां श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी हों, वहां साधकों को उनके आध्यात्मिक जीवन में किसी बात का अभाव नहीं होगा’, इसके प्रति हम साधक संपूर्ण श्रद्धा रखते हैं ।
५. धैर्यलक्ष्मी
हमारे पास धन, धान्य, संपन्नता इत्यादि सबकुछ है; परंतु यदि धैर्य न हो, तो जीवन के किसी भी प्रसंग का सामना करने का बल हममें नहीं रहता । श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी ने उनके जीवन में उत्पन्न हुए अनेक कठिन प्रसंगों का सामना कर उन पर विजय प्राप्त की है; इसीलिए जब साधक उनके पास अपनी समस्याएं लेकर जाते हैं, उस समय वे साधकों को साधना के उचित दृष्टिकोण देकर साधकों को स्वभावदोष एवं अहं पर धैर्य के साथ विजय प्राप्त करना सिखाती है । अतः श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी के रूप में हमें ‘धैर्यलक्ष्मी’ की अनुभूति होती है ।
६. संतानलक्ष्मी
जिनकी कृपा से सुख, समृद्धि एवं शांति प्रदान करनेवाली संतान प्राप्त होती है, वे ‘संतानलक्ष्मी’ हैं ! हम भी उन्हीं श्री लक्ष्मी की संतान हैं । (श्रीमती) सिंगबाळजी सनातन के प्रत्येक साधक को अपार वात्सल्य से, प्रीति से तथा प्रेम से संजोती हैं । उसके कारण साधकों को वे अपनी माता ही प्रतीत होती हैं; इसलिए श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी हमारी ‘संतानलक्ष्मी’ हैं ।
७. विजयलक्ष्मी
हम सभी का जन्म ईश्वरप्राप्ति का महान लक्ष्य प्राप्त करने हेतु ही हुआ है । जहां ईश्वर का अधिष्ठान होता है, वहां विजय निश्चित ही होती है; क्योंकि ईश्वर का ही दूसरा नाम ‘यश’ या ‘विजय’ है । श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी का जन्म ईश्वरीय कार्य के लिए ही होने के कारण उनके प्रत्येक कार्य में यश एवं विजय है । ऐसी श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी हमारे लिए ‘विजयलक्ष्मी’ ही हैं ।
८. राजलक्ष्मी
कोई भी राजा सफलतापूर्वक राज चला सके; इसके लिए उसके साथ ‘राजलक्ष्मी’ का होना आवश्यक होता है । सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी का संपूर्ण विश्व पर आध्यात्मिक आधिपत्य है, अर्थात वे विश्व के आध्यात्मिक राजा हैं तथा उनके कार्य में सहयोग करने हेतु अवतरित श्री राजलक्ष्मी अर्थात ही श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी हैं ।
किसी के पास ‘अष्टलक्ष्मियों’ का न होना, इसे ‘अष्टदरिद्रता’ कहा जाता है । साधकों के आध्यात्मिक जीवन की ‘अष्टदरिद्रता’ नष्ट कर उन पर कृपा करने हेतु ये अष्टलक्ष्मियां श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी के रूप में अवतरित हुई हैं, यही सत्य है !
साधको, ‘अष्टलक्ष्मियां ही श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी के रूप में हमारे लिए अवतरित हुई हैं’, इस भाव से हम उनमें विद्यमान अष्टलक्ष्मीतत्त्व को अनन्यभाव से कोटि-कोटि प्रणाम करते हैं !’
– श्रीमती वैष्णवी अमोल बधाले (आध्यात्मिक स्तर ६५ प्रतिशत, आयु २४ वर्ष), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (७.९.२०२४)

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?