ऐसा क्यों कहा जाता है कि अपने घर में श्राद्ध करने से तीर्थक्षेत्र में श्राद्ध करने की तुलना में आठ गुना पुण्य प्राप्त होता है ?

५० प्रतिशत पितरों का निवास उनकी पारम्परिक वास्तु में ही होने के कारण घर में श्राद्ध करने से तीर्थक्षेत्र में किए गए श्राद्ध की तुलना में आठ गुना लाभ होना ‘लगभग ५० प्रतिशत पितर साधना के अभाववश एवं वासनाओं की अधिकता से प्राप्त जडत्व के कारण गति प्राप्त नहीं कर पाते । इसलिए उनका वास उनकी पारम्परिक वास्तु में ही अधिक होता है । अतः श्राद्ध आदि विधि इसी क्षेत्र में करने से पितर स्वयं का हविर्भाग सहज प्राप्त कर सकते हैं । इस कारण वे तुलनात्मकरूप से अधिक सन्तुष्ट होते हैं एवं इसके फलस्वरूप वंश को पितरों के आशीर्वाद भी अधिक प्राप्त होते हैं । अतएव ऐसा कहा जाता है कि ‘तीर्थ की अपेक्षा घर में आठ गुना पुण्य प्राप्त होता है ।’ इसके अतिरिक्त इस विधि से पितरों का वास्तु के साथ रहा घनिष्ठ सम्बन्ध न्यून होने में सहायता मिलती है, जिससे उन्हें मर्त्यलोक में प्रवेश करने हेतु बल प्राप्त होता है और भूतल पर एक ही स्थान पर बंदी बनकर भोगनीय यातनाओं की मात्रा घट जाती है ।

श्राद्ध के लिए वर्जित स्थान

‘गोठ (गोशाला), हाथी बांधने का स्थान, अस्तबल, पत्थर का चबूतरा एवं जल, ऐसे स्थानों पर श्राद्ध न करें । यदि ऐसे स्थानों पर श्राद्ध किया गया, तो पितर उस श्राद्धकर्म का विघात कर देते हैं ।’

(संदर्भ : ‘सनातन का ग्रंथ : श्राद्ध का महत्त्व एवं अध्यात्मशास्त्रीय विवेचन’)