१. सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी से सीखने के लिए मिले सूत्र

१ अ. निरंतर शिष्यभाव में रहना : सद्गुरु पिंगळेजी सदैव कहते रहते हैं, ‘मैं एक कठपुतली हूं तथा मेरे माध्यम से बोलनेवाले मेरे गुरुदेवजी ही हैं । मैं प्रसार में जाते समय किसी को ज्ञान देने नहीं जाता; अपितु मैं अपने गुरुदेवजी के भक्तों से मिलने जाता हूं । मैं ‘पोस्टमैन’ की भांति हूं । मेरे पास जो है, वह सब मेरे गुरुदेवजी का है ।’ इससे मुझे प्रतीत होता है कि ‘वे निरंतर शिष्यभाव में रहते हैं ।’
१ आ. गुरुदेवजी के प्रति भाव : मार्गदर्शन करते समय सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी ने ‘गुरुस्मरण का महत्त्व, गुरुकृपायोग का महत्त्व तथा गुरुदेवजी की दिव्यता’ के विषय में बताया । वे जब ‘गुरुदेवजी के प्रति भाव तथा गुरुचरणों का तीर्थ’, इससे संबंधित अनुभूतियां बता रहे थे, उस समय ‘मेरा मन गुरुचरणों में कब लीन हुआ’, यह मेरी समझ में ही नहीं आया ।

२. सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के मार्गदर्शन के समय हुईं अनुभूतियां
२ अ. मार्गदर्शन सुनने के लिए ऋषि-मुनि, दिव्यात्माओं तथा पशु-पक्षियों का आना : ‘सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी का मार्गदर्शन सुनने के लिए ऋषि-मुनि तथा कुछ दिव्यात्मा आए हुए हैं’, ऐसा मुझे लग रहा था । ‘प्रकृति भी आनंद की अनुभूति कर रही है’, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ । उस समय पशु-पक्षी मंजुल स्वर में गा रहे थे । मोर सेवाकेंद्र के सामने आकर निर्भयता से तथा आनंदित होकर अपने पंख फैलाकर नाच रहा था । गिलहरियां आनंदित होकर यहां-वहां घूम रही थीं ।
२ आ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एवं प.पू. भक्तराज महाराजजी के दर्शन होना : कर्तापन न लेनेवाले तथा सबकुछ गुरुचरणों में अर्पण करनेवाले सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी के स्थान पर अनेक बार मुझे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एवं प.पू. भक्तराज महाराजजी के दर्शन होते हैं, उस समय मैं आनंद अनुभव करती हूं ।
२ इ. मार्गदर्शन के कारण मन शुद्ध होकर आंतरिक आनंद मिलना : सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी द्वारा दिए जानेवाले शब्दजन्य ज्ञान के साथ ही मुझे उसमें एक भिन्न प्रकार का आंतरिक आनंद मिलता है । ‘उनका सहजता से बोलना’ बोधामृत होता है । उससे ज्ञानवृद्धि एवं आनंदवृद्धि होती है । उससे मुझे साधना का अमूल्य मार्गदर्शन मिलता है तथा मेरा मन शुद्ध होता है ।
‘हम सभी अज्ञानी एवं अबोध जीवों को सद्गुरु पिंगळेजी का सत्संग मिलना अनंत गुरुकृपा है’, ऐसा मुझे निरंतर लगता है । उसके लिए मैं श्री गुरुचरणों में कृतज्ञता व्यक्त करती हूं ।’
– श्रीमती स्मिता कानडे (आध्यात्मिक स्तर ६६ प्रतिशत, आयु ५८ वर्ष), मथुरा सेवाकेंद्र, उत्तर प्रदेश. (४.४.२०२५)
साधिका को सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के आसपास चैतन्य का वलय दिखाई देकर उनकी बातों में आनंद की तरंगें प्रतीत होना सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी की बातों से आनंद की तरंगें प्रक्षेपित होना
सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी जब बोलते हैं, उस समय उनकी बातों से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, वह वातावरण में आनंद की तरंगें प्रक्षेपित करती हैं । उसके कारण मेरे मन को एक भिन्न प्रकार का आनंद मिलता है ।
सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के चैतन्यमय वलय में रहने का मुझे अवसर मिला; इसके लिए मैं गुरुदेवजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता व्यक्त करती हूं ।’
– श्रीमती स्मिता कानडे (७.५.२०२५)
साधकों द्वारा अनुकूल स्थिति में अनुभव की जा रही ईश्वर की कृपा,प्रतिकूल स्थिति में अनुभव की जा रही परमकृपा !‘साधना के आरंभिक काल में जब हम कोई कृति करते रहते हैं तथा जब वह अपने मन के अनुसार होती है, तब वह अनुकूलता होती है । उस प्रसंग में हम ईश्वरेच्छा से आचरण करते हैं । इसमें जो साधना होती है, वह कृपा होती है । इस प्रकार अनुकूलता में कृपा होती है; परंतु स्थिति प्रतिकूल होने पर ऐसा साधक प्रतिक्रिया देता है तथा क्रोध करता है । प्रतिकूलता यदि निरंतर रही, तो कुछ शौकिया लोग साधना छोड भी सकते हैं । साधना तथा सेवा करते समय जब हमें किसी प्रसंग में हमारी वृत्ति एवं विचारधारा के विरुद्ध सेवा अथवा दृष्टिकोण मिलता है, वह प्रतिकूलता है । इसका अर्थ जब हमारे मन के विरुद्ध कुछ होता है, तब हम उस प्रसंग में ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध आचरण करते हैं अथवा हमारी साधना की दृष्टि में मन के संस्कारों अथवा रुचि के विरुद्ध प्रसंग घटित होता है । उस प्रसंग में हमारी साधना हो, इसके लिए गुरु ही आवश्यक मनोलय कराते रहते हैं तथा उस माध्यम से साधकों पर कृपा करते हैं । यह कृपा जिसके ध्यान में आती है, उसे वह ईश्वर की परमकृपा लगनी चाहिए; क्योंकि मनोलय से होनेवाली साधना शाश्वत होती है । ‘अनुकूलता में कृपा देखते समय प्रतिकूलता में भी परमेश्वर की कृपा देखना संभव होना’ ही भक्ति है ! सर्वसामान्य व्यक्ति के जीवन में जब अनुकूल प्रसंग आते हैं, उस समय ईश्वर के प्रति उसकी श्रद्धा बनी रहती है; परंतु प्रतिकूलता आते ही ईश्वर, धर्म अथवा गुरु के प्रति उसकी श्रद्धा डगमगा जाती है । कभी-कभी साधना भी छूट जाती है; परंतु अत्यंत प्रतिकूल प्रसंग में भी जब ईश्वर की कृपा देखना संभव होता है तथा ‘स्वयं का उद्धार होनेवाला है’, यह अटल विश्वास होता है, वही भक्ति होती है । इसलिए प्रतिकूलता में होनेवाली कृपा ही परमकृपा होती है ।’ – सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिति. (२२.७.२०२५) |
हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी द्वारा अध्यात्म के विभिन्न विषयों पर किया गया अमूल्य मार्गदर्शन !

एक बार सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी ने उनकी धर्मपत्नी डॉ. (श्रीमती) मधुवंती पिंगळे का मार्गदर्शन किया था । उस मार्गदर्शन के कुछ अमूल्य सूत्र यहां दिए हैं ।
१. संतों एवं सद्गुरुओं के साथ व्यवहार करते समय अथवा बात करते समय हममें कैसा भाव होना चाहिए ?
अ. ‘गुरु जो करते हैं, वह उचित ही करते हैं’, यह विचार होना चाहिए । ‘गुरु जो करते हैं, उससे हमारा उद्धार होता है’, हममें ऐसा भाव होना चाहिए ।
आ. गुरु जो बताते हैं, उसपर श्रद्धा रख उसे स्वीकार करना चाहिए ।
इ. गुरु शिष्य का मनोलय कराते हैं । अतः ‘घटित हो रहा प्रत्येक प्रसंग हमारा मनोलय कराने के लिए ही है’, यह भाव रखकर उसे स्वीकार करना चाहिए ।
ई. संत कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करते ।
उ. ‘गुरु’ गुरुपद के योग्य हैं ?’, इसे देखने की अपेक्षा ‘क्या मैं शिष्य पद के लिए योग्य हूं ?, यह देखना चाहिए ।
ऊ. शिष्यपद पर आसीन होने का अर्थ है संपूर्ण श्रद्धा होना ! यहां श्रद्धा महत्त्वपूर्ण है । हमने गुरु के प्रति श्रद्धा रखी, तो ईश्वर उसका फल प्रदान करते हैं ।
ए. संतों के प्रति मन में शंका नहीं आनी चाहिए ।
२. सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी द्वारा ‘मृत्यु की ओर देखने का हमारा दृष्टिकोण कैसे होना चाहिए ?’, इस विषय में किया गया मार्गदर्शन !
एक साधक की आकस्मिक मृत्यु होने पर मुझे थोडा बुरा लगा । उस विषय में मैंने सद्गुरु डॉ. पिंगळेजी से बात की, तब उन्होंने मुझे ‘मृत्यु की ओर देखने का हमारा दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए ?’, यह बताया ।
जैसे हम प्रतिदिन कपडे बदलते हैं अथवा किसी व्यक्ति ने कपडे बदले, तो क्या हमें उसका कुछ लगता है ? हमें उसका बुरा नहीं लगता, उसी प्रकार जब किसी की मृत्यु होती है, तब वह जीव परमात्मा में विलीन होने के लिए पुनः नई देह धारण करता है; इसलिए हमें उसका बुरा नहीं लगना चाहिए । मृत्यु की कल्पना को हमने सुस्पष्ट किया, तो उससे अमरता (टिप्पणी) प्राप्त होती है ।
(टिप्पणी : देह एवं प्रकृति का लय होता रहता है अर्थात मृत्यु होती रहती है । देह एवं कर्म को उत्पत्ति, स्थिति लागू होती है । ‘मैं देह नहीं हूं, अपितु आत्मा हूं’, इसे जान लेना आवश्यक है । जो आत्मा है, उसका कभी नाश नहीं होता । अतः मृत्यु देह की होती है । ‘मृत्यु किसकी होती है ?’ तथा ‘मृत्यु क्या है ?’, यह स्पष्ट होने पर अमरता का भान होता है ।)’
– डॉ. (श्रीमती) मधुवंती पिंगळे (सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की धर्मपत्नी), मंगळूरु सेवाकेंद्र, कर्नाटक. (१०.७.२०२५)

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?