वास्तविकता के आंकडों की भयावहता हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा के वर्षा सत्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधान परिषद में बताई कि पिछले वर्ष राज्य में ३७,६९५ महिलाएं और लडकियां लापता हुईं । यह केवल एक राज्य का आंकडा है । यदि पूरे देश के आंकडे देखें, तो स्थिति अत्यंत भयावह है । ये आंकडे केवल लापता होनेवालों के हैं । यदि यह पूछा जाए कि कितनी लडकियों के साथ अत्याचार हुआ ? कितनों को छेडछाड का सामना करना पडा ? कितनों ने आत्महत्या की अथवा उनकी हत्या हुई ? तो उत्तर और भी निराशाजनक होंगे । हो सकता है आज हम समाचारों में ऐसी घटनाएं पढकर अनदेखा कर देते हों या इसे ‘सामान्य’ मानते हों । परंतु सोचिए – यदि यही सब आपकी अपनी बेटी के साथ हो जाए, तो ? क्या यह विचार आपको विचलित नहीं करता ? यदि करता है, तो आप संवेदनशील अभिभावक हैं । इसलिए अब केवल विचार न करते हुए, समाधान की दिशा में ठोस प्रयास करना आवश्यक है । कुछ विचारणीय प्रश्न

१. अभिभावक २४ घंटे अपनी बेटियों के साथ नहीं रह सकते, तो उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए ?
यह एक यथार्थ प्रश्न है । कोई भी अभिभावक २४ घंटे अपनी बेटी के साथ नहीं रह सकता । तो क्या उनकी रक्षा संभव है ? क्या केवल साथ रहने से सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती है ? उत्तर है, नहीं । सुरक्षा केवल भौतिक उपस्थिति से नहीं होती । उसके लिए संस्कार, संबंधों में विश्वास और मूल्य-आधारित शिक्षा अत्यंत आवश्यक है । यही दीर्घकालिक सुरक्षा-कवच है ।
२. असुरक्षा की भावना और समाधान की दिशा में चिंतन
वर्तमान सामाजिक परिस्थिति को देखकर हमारे मन में असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है । यही कारण है कि जब हमारी अपनी बेटी सवेरे घर से बाहर जाती है, तो उसके रात में सुरक्षित लौटने तक चिंता होना स्वाभाविक है । परंतु क्या केवल ‘चिंता करना’ ही इसका उपाय है ? – निश्चित रूप से नहीं । इस समस्या के समाधान के लिए केवल पुलिस, प्रशासन, न्यायालय या सरकार पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है । इसलिए हमें यह विचार करना होगा कि हम स्वयं अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं ।
स्त्री स्वातंत्र्य का अर्थ मनमानी करणार नही है, यह लडकियों को स्पष्ट रूप से समझाए !

आज अनेक स्थानों पर ‘स्त्री स्वतंत्रता’ के नाम पर माता-पिता अपनी बेटियों को टोकने से कतराते हैं । उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने टोका, तो वे ‘पुरानी सोच’वाले कहे जाएंगे । अनेक बार अन्य परिजन भी आधुनिकता के नाम पर लडकियों को अनुशासन से मुक्त रखने का समर्थन करते हैं, जिससे माता-पिता असहाय अनुभव करते हैं । जब लडकियों को बचपन से ही मनमाना आचरण करने की आदत डाली जाती है, तो वे आगे चलकर माता-पिता की बात नहीं मानतीं । ऐसी स्थिति से बचने के लिए आवश्यक है कि माता-पिता स्पष्ट रूप से समझाएं कि ‘स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं है ।’ अंततः, किसी भी संकट का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बेटी पर ही पडता है । इसलिए पहले से ही सजग रहते हुए सीमाओं का निर्धारण करना और आचार-विचार में विवेक बनाए रखना, अभिभावकों के लिए हितकारी होता है । अन्यथा यदि कोई अनुचित घटना घट जाती है, तो केवल पछतावा ही शेष रहता है और उस समय तथाकथित ‘स्त्री स्वतंत्रता’ का पाठ पढानेवाले रिश्तेदार या समाजसुधारक सहायता के लिए नहीं आते । यह सच्चाई हमें ध्यान में रखनी चाहिए । मनुस्मृति में कहा गया है कि स्त्री को बचपन में माता-पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए । इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री स्वतंत्र नहीं है; अपितु इसका उद्देश्य है स्त्री की सुरक्षा सुनिश्चित करना । मूलतः धर्म ने स्त्री की मर्यादा और पवित्रता की रक्षा की जिम्मेदारी उसके परिजनों को दी है ।
उचित समय पर बेटियों को विश्वास में लेकर, प्रेमपूर्वक उन्हें संस्कार देना – पुरुषों की दृष्टि, उनकी देहभाषा, छुअन के प्रकार आदि के भेद समझाना – यह सब हमारी ओर से किया गया सुरक्षा प्रयास हो सकता है । यदि लडके-लडकियां समूह में बाहर जा रहे हैं, तो यह सुनिश्चित करना कि उनके साथ कोई जिम्मेदार वयस्क है या वे दिन के समय जा रहे हैं – यह अभिभावकों की सतर्कता का भाग होना चाहिए । यदि लडकियां लंबे समय तक घर से बाहर रहती हैं, तो विशेष ध्यान रखना आवश्यक है । किसी लडकी पर हुआ आघात केवल उसी तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पूरे परिवार और समाज पर प्रभाव डालता है । इसकी गंभीरता इतनी होती है कि शब्दों में उसे बांधना कठिन है । इसलिए, एक सजग अभिभावक का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी बेटियों को सही आचार-विचार सिखाएं ।
– श्री योगेश जलतारे, समूह संपादक, ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक
३. युवावस्था में प्रवेश के उपरांत अभिभावकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए ?
अनेक घटनाओं में यह सामने आया है कि स्त्रियों या लडकियों पर होनेवाले अत्याचारों के पीछे उनके ही निकट संबंधी सहभागी होते हैं । अतः यह मानना कि हमारी बेटी हमारे किसी रिश्तेदार के साथ पूरी तरह सुरक्षित है – अब पूरी तरह आश्वस्त नहीं करता । पूर्वकाल के सामाजिक नियमों में यह बात स्पष्ट रूप से मानी जाती थी कि लडकी के युवावस्था में प्रवेश के उपरांत उसके पिता या भाई भी उसके साथ एक ही कक्ष में नहीं सोते थे । हमारे धर्मशास्त्रों और परंपराओं में यह उल्लेख मिलता है कि लडकी बडी होने पर उसके साथ व्यवहार और आचरण कैसा होना चाहिए, इस पर कुछ स्पष्ट सामाजिक मर्यादाएं निर्धारित की गई थीं । दुर्भाग्यवश, आज की ‘स्वतंत्रता’ की परिभाषा में इन मर्यादाओं की उपेक्षा हो रही है, जिससे हम सामाजिक और नैतिक दुष्परिणाम झेल रहे हैं । ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी और बढ जाती है । हमें चाहिए कि घर में इन पारंपरिक मर्यादाओं को फिर से लागू करें । यदि बेटियां इसे ‘रूढिवादिता’ कहें, तो भी उन्हें यह समझाना हमारा कर्तव्य है कि समाज में रहते हुए उनका आचरण, भाषा, और व्यवहार कैसा होना चाहिए । लडकी की मां को चाहिए कि वह बेटी को युवावस्था में ही यह समझाए कि कौन-सा स्पर्श सामान्य है और कौन-सा अनुचित । उसे विभिन्न प्रकार के स्पर्शों को पहचानने की शिक्षा देना आवश्यक है ।

४. अच्छा और बुरा स्पर्श कैसे पहचानें ?
हम सभी को जन्म से ही स्पर्श का अनुभव होता है । मां का स्पर्श ममता, प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक होता है । पिता का स्पर्श : सहारा और मार्गदर्शन देनेवाला होता है । भाई-बहनों का स्पर्श : स्नेह, मित्रता और खेल-भाव से भरा होता है । इस अनुभव के आधार पर बेटियों को यह सिखाना आवश्यक है कि वे बुरे या असामान्य स्पर्श को पहचान सकें । इसके लिए माता को उनका मार्गदर्शक बनना चाहिए । सामान्यतः बुरे उद्देश्य से किया गया स्पर्श असहजता या असुरक्षा की भावना उत्पन्न करता है । यदि कोई व्यक्ति बार-बार अनावश्यक रूप से छूने की कोशिश करे, एकांत में निजी अंगों को स्पर्श करने का प्रयास करे, आसपास किसी के होने या न होने की टोह लेकर ऐसा कार्य करे, तो यह स्पष्ट रूप से अनुचित और खतरनाक व्यवहार है । लडकियों को यह सिखाना होगा कि भले ही ऐसा व्यक्ति उनका परिचित, रिश्तेदार या मित्र हो – यदि उसका स्पर्श असहज अनुभव हो रहा हो, तो सावधान हो जाना चाहिए ।
५. ऐसी स्थिति में लडकियां क्या करें ?
यदि आपको किसी के स्पर्श से असहजता, डर या असुरक्षा अनुभव हो रही हो, तो स्पष्ट रूप से कहें, ‘‘मुझे यह स्पर्श अच्छा नहीं लगा । कृपया ऐसा न करें ।’’ अपनी सीमाएं स्पष्ट करें । यदि आवश्यक हो, तो वहां से हट जाएं । यह याद रखें कि किसी को भी, चाहे वह कितना भी परिचित क्यों न हो – आपको बिना आपकी अनुमति छूने का अधिकार नहीं है । आपकी सुरक्षा सबसे महत्त्वपूर्ण है । किसी भी पुरुष से संवाद करते समय अपनी सीमाएं स्पष्ट कर दें । यदि कोई व्यक्ति बार-बार अनावश्यक प्रशंसा करता है, महंगी वस्तुएं उपहार में देता है, बार-बार फोन करता है या आपका पीछा करता है, तो तुरंत सतर्क हो जाएं और यह बात अपने अभिभावकों को बताएं ।
लडकियों को स्मरण रखना चाहिए कि उनका चरित्र उनकी अमूल्य संपत्ति है : लडकियों को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि उनका चरित्र उनकी सबसे अनमोल संपत्ति है और उसका सम्मान बनाए रखना उनका अपना दायित्व है । इसलिए उन्हें सदैव सदाचारी, संस्कारी और नीतिवान व्यक्तियों का ही सान्निध्य चुनना चाहिए ।

६. अभिभावक अपनी बेटियों को बचपन से ही उचित वेशभूषा के लिए प्रेरित करें
जब भी वेशभूषा की बात आती है, तो बुद्धिजीवी वर्ग अकसर यह तर्क देते हैं: “कौन क्या पहने, यह तय करनेवाले आप कौन होते हैं?” या फिर “लडकियों पर ही क्यों बंधन ?” जैसे प्रश्न उठाए जाते हैं। हम यहां यह नहीं कह रहे कि आप अपनी बेटियों को साडी पहनने के लिए बाध्य करें; लेकिन यह आवश्यक है कि बचपन से ही उन्हें ऐसी वेशभूषा पहनने की आदत डलवाई जाए, जिससे उनका पूरा शरीर ढका रहे और जो शालीनता एवं मर्यादा को दर्शाए। तंग, शरीर से चिपके हुए या अत्यधिक छोटे कपडे अनावश्यक शरीर प्रदर्शन का कारण बनते हैं, जिससे अवांछनीय ध्यान आकर्षित होता है और संकट की संभावना बढ जाती है । अतः माता-पिता को इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए । स्त्री की स्वतंत्रता के नाम पर अति लाड-प्यार करना बाद में पश्चाताप का कारण न बने, यह ध्यान में रखें ।

७. लडकियों को बचपन से ही यह सिखाएं कि वे दुर्बल नहीं, सामर्थ्यशाली हैं
जब अभिभावक अपनी बेटियों को मर्यादा और आचार-विचार सिखाएं, तो यह भी ध्यान रखें कि इससे उनका आत्मविश्वास कम न हो । अधिकतर माता-पिता बेटियों को राजकुमारी की भांति लाड-प्यार से पालते हैं, परंतु कभी-कभी यह नाजुक समझकर दिया गया प्यार उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से दुर्बल बना देता है । यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि ‘स्त्री स्वयं शक्तिस्वरूपा है ।’ अतः माता-पिता को चाहिए कि वे उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, जीजामाता, तारारानी, अहिल्याबाई होळकर जैसी वीरांगनाओं की कहानियां सुनाएं, जिससे उनमें शौर्य, आत्मबल और आत्मसम्मान का जागरण हो । लडकियों को यह बोध कराना आवश्यक है कि हम दुर्बल नहीं, समर्थ हैं । इसके अतिरिक्त, स्वरक्षा (Self-Defense) का प्रशिक्षण देना भी अत्यंत आवश्यक है, जिससे वे संकट की स्थिति में स्वयं की रक्षा कर सकें ।
८. लडकियों को धर्म का ज्ञान दें और साधना के लिए प्रेरित करें
चाहे हम अपने स्तर पर कितनी भी सावधानियां बरतें – अंततः हमारी सुरक्षा ईश्वर के ही हाथ में होती है । ईश्वर ही सबके सच्चे और अचूक रक्षक हैं । इसलिए अभिभावकों को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को बचपन से ही धर्म की शिक्षा दें, जिससे वे ईश्वर, अध्यात्म और साधना से जुडें । जब लडकी साधना करती है, तो उसमें न केवल आध्यात्मिक बल आता है, अपितु उसके आचार-विचारों की नींव भी मजबूत होती है और जब जीवन धर्माधारित होता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा के लिए सक्रिय हो जाते हैं । इसलिए अभी से अपनी बेटियों को साधना, नामजप, प्रार्थना, और धर्मशास्त्रों के ज्ञान के संस्कार दें । उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि ईश्वर सदैव उनके साथ हैं । हम अभिभावक यदि यह आज ही आरंभ करें, तो हम अपनी बेटियों की रक्षा के लिए एक अदृश्य परंतु अटूट कवच निर्मित कर सकते हैं । अंत में यही प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें यह सद्बुद्धि, प्रेरणा और शक्ति प्रदान करें, जिससे हम अपने बच्चों को सही दिशा दे सकें ।
– श्री. योगेश जलतारे, समूह संपादक, ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन