…अंतत : कलंक मिट गया !

जिस अभियोग में १४ आरोपियों को फंसाया गया, ७ आरोपियों पर अभियोग चला, जो अभियोग १७ वर्ष चला, जिस अभियोग में ३ आरोपपत्र प्रविष्ट किए गए, जो अभियोग ५ ‘बेंच’ में चलाया तथा जिस अभियोग का निर्णय १ सहस्र से अधिक पृष्ठ का था; ऐसे ‘मालेगांव बमविस्फोट २००८’ प्रकरण का ऐतिहासिक निर्णय अंततः ३१ जुलाई को आया । राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एन.आई.ए.) के विशेष न्यायालय के इस निर्णय ने उन राजनेताओं तथा विभागों के षड्यंत्र की पोल खोल दी, जिन्होंने सीना तानकर यह झूठ बोला था कि ‘इन आरोपियों ने षड्यंत्र रचकर मालेगांव बमविस्फोट कराया ।’ इसके कारण ‘भगवा आतंकवाद’ की झूठी कहानी रचनेवालों का सपना मिट्टी में मिल गया है । हिन्दूद्वेषी कांग्रेस के नेताओं ने तथा जांच संस्थाओं ने हिन्दुओं के लिए पवित्र ‘भगवा’ नाम के आगे ‘आतंकवाद’ शब्द जोडकर समस्त हिन्दुओं का जो मानभंग किया था तथा उन पर जो कलंक लगाया था, वह अंततः आज मिट गया । आरोपियों को मांस के टुकडे खिलाना, घिनौनी गालियां देना, अश्लील फिल्में दिखाना, अमानवीय मारपीट करना, आरोपियों के साथ ही उनके परिजनों को भी मानसिक कष्ट पहुंचाना, झूठे साक्ष्य-प्रमाण तैयार करना आदि दुष्कृत्य कर पुलिस तथा उसके कर्ता-धर्ता नेताओं में मिलकर हिन्दुओं को ‘आतंकवादी’ घोषित करने का एक बहुत बडा षड्यंत्र रचा था । हिन्दुओं के विरुद्ध रचा यह कुटिल षड्यंत्र अब न्यायालय में सिद्ध हो चुका है । इसलिए किसी राष्ट्रभक्त के मन में ऐसा विचार आ जाए कि षड्यंत्र रचनेवालों को ही दंडित किया जाना चाहिए’, तो उसमें आश्चर्य कैसा ? ऐसे नेता तथा ऐसी व्यवस्था पुनः किसी राष्ट्रभक्त के हिस्से में न आए, इसीलिए हिन्दू राष्ट्र चाहिए !

वर्ष २००९ के लोकसभा चुनावों को सामने रखकर तथा अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के लिए वर्ष २००८ में मालेगांव में हुए बमविस्फोट प्रकरण में तत्कालीन आतंकवाद विरोधी दल ने कल्पना से परे झूठे प्रमाण इकट्ठे कर उनके कांग्रेसी तथा ‘राष्ट्रवादी’ नेताओं को प्रसन्न किया; परंतु यह सब झूठ सिद्ध होने से विशेष न्यायालय ने अपने निर्णय में आरोपियों को ‘यू.ए.पी.ए.’ (गैरकानूनी देशद्रोही गतिविधियों को रोकनेवाला कानून) में फंसाया नहीं जा सकता, ऐसा कहकर फटकार लगाई । इससे पूर्व ही न्यायालय ने इन आरोपियों पर ‘मकोका’ (संगठित अपराध रोकनेवाला कानून) भी लगाया नहीं जा सकता, ऐसा कहा था । अब निर्णय आने पर भी प्रसारमाध्यमों ने ‘प्रमाण न होने से आरोपी निर्दोष मुक्त’ जैसे शीर्षक चलाकर यह समाचार प्रसारित किया । तकनीकी दृष्टि से भले ही यह सत्य भी हो, तब भी वास्तव में ‘झूठे प्रमाण प्रस्तुत करने के कारण’, ऐसा कहा जाना उचित होता । विगत अनेक वर्षों से ‘हिन्दू आतंकवाद का अस्तित्व है’, ऐसा भ्रम फैलानेवाले माध्यमों को इस विषय में उक्त टिप्पणी करना उचित नहीं लगा ।

अत्यंत झूठे प्रमाण देनेवाली हिन्दूद्वेषी व्यवस्थाएं !

झूठे प्रमाणों की पोल खोलते हुए विशेष न्यायालय ने आतंकवाद विरोधी दल पर प्रचंड रोष व्यक्त किया । ११वें क्रमांक के कथित आरोपी समीर कुळकर्णी ने भी ५ राज्यों के आतंकवाद विरोधी दलों ने उनके साथ मारपीट करने की बात कही थी । केवल १-२ ही नहीं, अपितु सभी प्रमाण झूठे होने की बात न्यायालय ने कही है । इससे शासनकर्ताओं ने तत्कालीन आतंकवाद विरोधी दलों की व्यवस्था में हिन्दूद्वेष कितना भर दिया था, यह स्पष्ट होता है । न्यायालय ने साध्वी प्रज्ञा सिंह की मोटरसाइकिल की सत्यता तथा विभिन्न स्थानों पर की गई बैठकों में षड्यंत्र रचे जाने के आरोप के साथ कर्नल पुरोहित द्वारा ‘आर.डी.एक्स.’ लाया जाना, इस बमविस्फोट के लिए ‘अभिनव भारत’ संगठन के पैसों का उपयोग करना तथा इन विषयों में प्रस्तुत किए किसी भी प्रमाण में सत्यता न होने की बात कही । केवल इतना ही नहीं, अपितु इस व्यवस्था ने स्वयं ही एक कथित आरोपी चतुर्वेदी के घर ‘आर.डी.एक्स.’ रखे जाने की बात स्वीकार की, साथ ही उन्होंने किस प्रकार साक्षियों को धमकाया, यह भी बताया । केवल ‘भगवा आतंकवाद’ सिद्ध करने के लिए अभियोजन के द्वारा आरोपपत्र में इन सभी प्रमाणों का उल्लेख करना, इससे ये व्यवस्थाएं हिन्दूद्वेष से कितनी ग्रसित थी, यह सिद्ध हुआ । साध्वी का घोर उत्पीडन करनेवाले हेमंत करकरे जैसे आतंकवाद विरोधी दल के अधिकारी का किस प्रकार अंत हुआ ? इसे पूरे देश ने देखा । मुंबई सत्र न्यायालय के राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण के विशेष न्यायालय ने स्वयं ही ‘झूठे प्रमाण देकर आरोपियों को फंसाने का षड्यंत्र रचे जाने’ की बात कही ।

अभी भी अनेक प्रश्न हैं अनुत्तरित !

कथित आरोपी समीर कुळकर्णी का अपहण करनेवालों को जिन्होंने ‘इंडिया बुल्स’ का विमान उपलब्ध कराया तथा जिन्होंने इस विमान का उपयोग किया, उन्हें क्या दंड मिलेगा ? फोरेंसिक प्रयोगशाला के लोगों ने पुलिस को घटनास्थल पर उपलब्ध प्रमाण इकट्ठा करने के लिए कहा, तो क्या उनकी भी जांच होगी ? जिस अभियोग में मूलतः ब्योरा भी तैयार नहीं किया गया तथा आरोपियों ने अपराध नहीं किया है, यह ज्ञात होते हुए भी जिन पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों के मुंह से हिन्दुओं का नेतृत्व करनेवाले नेताओं के नाम उगलवाने के लिए उनके साथ मारपीट की, उन पर कौन अपराध पंजीकृत करेगा ? इस अभियोग में न्यायालय ने १०१ घायलों के झूठे प्रमाणपत्र तैयार किए जाने की जांच के आदेश दिए; परंतु इन प्रमाणपत्रों को तैयार करने के आदेश किसने दिए ? पूर्व गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने वर्ष २०२४ में उनके दल ने ही (‘हाइकमांड’ ने ही) ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का उपयोग करने के लिए कहा, यह बात स्वीकार की थी । ‘हिन्दू आतंकवाद’ का हौवा खडा करने का दूसरा अर्थ है ‘आतंकवादियों को पालना-पोसना’; परंतु कांग्रेस को स्वयं के स्वार्थ से परे देशहित समझ में आएगा, यह कोई अपेक्षा ही नहीं कर सकता । आतंकियों की सहायता करनेवाली कांग्रेस पर अब प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए ? जैसे प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं । हिन्दुओं को उनके उत्तर चाहिए ।

इस हानि की भरपाई कैसे हो पाएगी ?

आज भले ही अनेक अंगों से उसका गुब्बारा फूट गया हो, तब भी हिन्दुत्वनिष्ठ युवकों के जीवन के व्यर्थ हो चुके १७ अमूल्य वर्ष तथा उनके परिजनों को जो तीव्र शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक एवं सामाजिक कष्ट सहने पडे, वो शब्दों से परे हैं । इस प्रकरण के आरोपी अरबों हिन्दुओं के प्रतिनिधि हैं । शहरी नक्सलवादी विचारधारा के शासनकर्ताओं ने ‘आतंकवाद’ की संकल्पना का आधार लेकर उनके क्रूर मानसिकता से ग्रस्त अधिकारियों के माध्यम से हिन्दुओं पर केवल घोर अत्याचार ही नहीं किए; अपितु पूरे हिन्दू धर्म, संस्कृति, परंपरा एवं नागरिकों का ‘न भूतो न भविष्यति’, इस प्रकार से तेजोभंग किया है । ‘बीबीसी’ जैसे तथा भारत के कुछ अपवादों को छोडकर अधिकांश प्रसारमाध्यमों ने ‘मीडिया ट्रायल’ चलाकर हिन्दुओं का आत्मसम्मान मिट्टी में मिला दिया । राजनेता, प्रशासन, पुलिस, कथित विचारक तथा माध्यमों का हिन्दूद्वेषी ‘इकोसिस्टम’ (एक-दूसरे की सहायता करनेवाली व्यवस्था) विगत अनेक वर्षों से चली आ रही थी, यह इस उदाहरण से पुनः-पुनः सिद्ध होता है । जिन्होंने यह सब करवाया, उन्हें जब तक कठोर से कठोर दंड नहीं मिलता तथा हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्मियों को ध्वस्त करने चले आसुरी आतंकी एवं साम्यवादी नक्सली प्रवृत्तिवाले लोग मिट्टी में नहीं मिल जाते, तब तक राष्ट्रभक्तों की लडाई का यह चक्र पूर्ण नहीं होगा । न्यायतंत्र हिन्दुओं के संयम की परीक्षा ही लेता है तथा हिन्दू संयमी होते हैं; इसलिए वे न्यायतंत्र पर विश्वास करते हैं; परंतु ऐसे प्रकरणों के कारण यहां के नेताओं से लेकर पुलिस तंत्र तक सभी व्यवस्थाएं हिन्दू विरोधी हैं, यह पुनः रेखांकित होता है । अब हिन्दुओं को दृढता के साथ यह कहना पडेगा कि अब इन सबमें परिवर्तन लाने हेतु हिन्दू राष्ट्र की ही आवश्यकता है । इन दोनों अन्वेषणों में कार्यरत अधिकारी समान थे । ‘सरकार चाहे किसी की हो; परंतु व्यवस्था साम्यवादी है’ । ‘सरकार भी (हिन्दू) धर्मनिष्ठ है तथा व्यवस्था भी धर्मनिष्ठ है’, यह स्थिति जब तक नहीं आती, तब तक अर्थात हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने तक हिन्दुओं की यह लडाई जारी ही रहेगी !

हिन्दुओं को आतंकवादी बताकर उन पर अत्याचार करने वालों तथा पूरे विश्व में हिन्दू समुदाय की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वालों को कब दंड मिलेगा ?