सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

बुद्धिवादियों एवं विज्ञाननिष्ठों का ज्ञान अति सीमित होने के कारण

‘बुद्धिवादियों एवं विज्ञाननिष्ठों में यह अहंकार होता है कि ‘मुझे जो पता है, वही सत्य है’ और नया कुछ समझने की उनमें जिज्ञासा नहीं होती । इसके विपरीत, ऋषियों में अहंकार न होने के कारण तथा जिज्ञासा होने के कारण उनके ज्ञान की श्रेणी बढती जाती है और वे अनंत कोटि ब्रह्मांड के असीमित ज्ञान की भी जानकारी दे सकते हैं !’


संतों की तुलना में नेताओं का महत्त्व शून्य है !

‘नेता जनता को पैसा देकर अथवा वाहन की सुविधा देकर सभा में बुलाते हैं । इसके विपरीत, संतों के पास तथा धार्मिक उत्सव में बिना बुलाए लाखों की संख्या में भक्त आते हैं और धन अर्पण करते हैं । इससे यह ध्यान में आता है कि संतों की तुलना में नेताओं का महत्त्व शून्य है ।’


धर्मांध अपने धर्म की सीख का पालन करते हैं, इसलिए पूरे संसार पर हावी हो गए हैं । इसके विपरीत, तथाकथित आधुनिकतावादी, बुद्धिवादी तथा विद्रोही हिन्दुओं में धर्म के विषय में संदेह उत्पन्न कर, फूट डालकर, हिन्दुओं को दुर्बल करते हैं । इस कारण हिन्दुओं को भारत में भी कोई नहीं पूछता !’