श्री. आप्पा परब, अर्थात श्री. बाळकृष्ण सदाशिव परब ! ८ मई १९४० को मुंबई में इनका जन्म हुआ था । बचपन से ही उन्हें शिवकालीन गढ-दुर्गाें के प्रति प्रखर आकर्षण था ! अपने विद्यार्थी जीवन से ही उन्होंने गढ-दुर्ग पादाक्रांत करना आरंभ कर दिया । मैट्रिक करने के पश्चात पिताजी के देहावसान के उपरांत बहन का विवाह एवं अन्य पारिवारिक दायित्व निभाते हुए भी उन्होंने गढ-दुर्ग भ्रमण करना छोडा नहीं । आज उनकी आयु ८४ वर्ष है । उन्होंने कुल २५० गढ-दुर्गाें का भ्रमण किया है । उनके समान गढ-दुर्ग भ्रमण करनेवाला देश में शायद ही कोई अन्य हो । दुर्गभ्रमण करनेवाले तथा उसमें रुचि रखनेवाले अनेक लोग हैं; परंतु श्री. आप्पा की विशेषता यह है कि उन्होंने इन अबोल पत्थर-मिट्टी के गढ-दुर्गाें से हिन्दुओं के पराक्रम का इतिहास, सैनिकों (मावळों) का शौर्य, छत्रपति शिवाजी महाराज एवं छत्रपति शंभु महाराजजी का पराक्रम, महाराष्ट्र के लाखों युवकों तक पहुंचाया तथा उनमें हिन्दुत्व को जागृत किया । श्री. आप्पा का यह योगदान अतुलनीय है । शिवकालीन गढ-दुर्गाें ने छत्रपति शिवाजी का शौर्य एवं प्रताप देखा; परंतु इन अबोल मर्द सैनिकों (मावळों) को यह इतिहास न तो लिखना आता था, न पोवाडा अर्थात शौर्यगीतों के माध्यम से बताना आता था । श्री. आप्पा ने स्वयं उनकी भावनाओं का अध्ययन किया, सत्यता की छानबीन के लिए उनका शोध किया तथा महाराष्ट्र के साथ पूरे देशवासियों तक संदर्भ सहित शिवप्रताप पहुंचाया । इस लेख के माध्यम से आधुनिक सैनिकों का यह शिवकार्य उनके ही शब्दों में देखेंगे ।

विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराजजी के हिन्दवी स्वराज्य के लिए मावळे (शिवाजी के सैनिकों) एवं योद्धाओं द्वारा किया त्याग सर्वोच्च है, उस अनुसार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘योद्धा’ के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्मरक्षा के संघर्ष की जानकारी देनेवाले ‘हिन्दुत्व के योद्धा’ स्तंभ द्वारा अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से हमारी चिंता दूर होकर उत्साह जागृत होगा ! – संपादक
१. जिन्होंने अपना रक्त बहाकर इतिहास रचा, उनका इतिहास बताने के लिए पैसे लेना कदापि मान्य नहीं !

अनेक इतिहासकार, व्याख्याता पारिश्रमिक (पैसे) लेकर राष्ट्रपुरुषों का इतिहास बताते हैं । ऐसा नहीं है कि ये सभी लोग व्यावसायिक होते हैं, परंतु पारिवारिक दायित्व होने से उसके लिए व्याख्याता पारिश्रमिक लेते हैं । कुछ लोग व्याख्यान के लिए व्यावसायियों के समान भारी-भरकम पारिश्रमिक लेते हैं; परंतु आर्थिक स्थिति दयनीय होते हुए भी श्री. आप्पा ने इतिहास बताने के लिए कभी भी पैसे नहीं लिए । इतिहास बताने की सेवा के लिए प्रदर्शन के आयोजक जो मानधन देते, कभी उसका भी एक रुपया तक नहीं लिया । १० वर्ष की आयु में जब वे सिंहगढ गए थे, तभी उन्होंने शपथ ली थी; ‘शिवकाल में जिन वीरों ने अपना रक्त बहाकर इतिहास रचा, उनका इतिहास बताने अथवा लिखने का यदि कभी अवसर मिला तो मानधन नहीं लूंगा । पूरा जीवन उन्होंने इस शपथ का यथावत पालन किया । राष्ट्र के प्रति स्वाभिमानी एवं प्रखर राष्ट्रनिष्ठ ही ऐसा कर सकता है । राष्ट्रनिष्ठा की डींगें (गप्पें) मारनेवाले अनेक होते हैं; परंतु व्यक्तिगत जीवन में उसे आत्मसात करनेवाले गिने-चुने ही होते हैं । श्री. आप्पा उनमें से एक कर्मयोगी हैं ।
२. विविध संदर्भाें का गहन अध्ययन
उनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी । पिताजी के निधन के पश्चात घर के खर्च चलाने के लिए उन्होंने दादर (पश्चिम) में पुस्तक की बिक्री आरंभ की । इसे संभालते हुए छुट्टी के दिन वे गढ-दुर्गाें पर जाते थे । यह कोई पर्यटन नहीं था, अपितु शोधकार्य की दृष्टि से वे वहां जाते थे । शिवकालीन संदर्भ, उपन्यास, बखरी (सरकारी कागद-पत्र), पीढी-दर-पीढी संजोए गए कागदपत्र आदि का श्री. आप्पा ने सखोल अध्ययन किया । विविध संदर्भ अपने पास लिखकर रखे तथा जांच कर उनकी सत्यता की निश्चिती की । महाराष्ट्र के ऐसे सैकडों गढ-दुर्गाें के संदर्भ में उन्होंने अपने पास लिखित स्वरूप में रखा । श्री. आप्पा की पुस्तकें तथा उनमें वीररसयुक्त इतिहास, उनके गहन अध्ययन के फल हैं ।
३. निर्धनता स्वीकारी; परंतु व्रत नहीं छोडा !
मैट्रिक तक शिक्षा होने पर तथा पिताजी की मृत्यु के पश्चात पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए घर-घर समाचारपत्र वितरण का काम करना, गर्मियों में परीक्षा का रिजल्ट (परिणाम) आने पर पुस्तक की दुकान में नौकरी करना, इस प्रकार अर्थार्जन कर श्री. आप्पा ने परिवार का दायित्व निभाया । उनके पिताजी जिस मिल में नौकरी करते थे, उसमें श्री. आप्पा की नौकरी लग गई; परंतु चक्की के कर्मचारियों की हडताल के पश्चात मिल्स बंद हो गईं । तदुपरांत श्री. आप्पा ने पुरानी पुस्तकें एवं पत्रिकाओं की बिक्री का कार्य आरंभ किया । इससे उन्होंने अपनी बहन के विवाह का दायित्व निभाया । इस काल में अनेक संस्था, संगठनों के साथ गढ-दुर्गाें का भ्रमण कर, श्री. आप्पा ने अनेक युवकों तक छत्रपति शिवाजी महाराजजी के पराक्रम का इतिहास पहुंचाया । उन्होंने यह सब सेवाभाव से किया । इसके लिए उन्होंने कभी भी मानधन नहीं लिया ।
केवल इतिहास ही नहीं, अपितु संस्कार अंकित करनेवाले श्री. आप्पा !
वर्ष २०२३ के चतुरंग रंगसम्मेलन में श्री. आप्पा के कार्य पर ‘त्रिवेणी’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई । इसमें श्री. आप्पा के जमाता श्री. अरविंद शिंदे ने उन पर एक लेख लिखा है ‘एक आधारवड मित्र’ अर्थात आधार देनेवाला मित्र ! उसमें उन्होंने आप्पा के विषय में एक प्रसंग लिखा है । श्री. आप्पा ने उनसे कहा था ‘एक बार मेरी बेटी को भूखा रखा तो भी कोई बात नहीं; परंतु कभी भी अनुचित मार्ग से पैसे मत कमाना !’ इससे श्री. आप्पा की सज्जनता ध्यान में आती है । उन्होंने स्वयं भी अपने जीवन में इसका यथावत पालन किया । श्री. आप्पा ने अपने बच्चों एवं नाती-पोतों पर भी अच्छे संस्कार किए तथा उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराजजी का इतिहास भी बताया । ‘अपनी भावी पीढी शिक्षित नहीं, अपितु सुसंस्कृत होने के लिए प्रयत्न करने चाहिए’, श्री. आप्पा की कृति से सभी को इसका बोध लेना चाहिए ।
गढ-दुर्ग भ्रमण के साथ ही व्याख्यान, लेखन, मार्गदर्शन द्वारा श्री. आप्पा ने पूरा जीवन सभी तक शिवकालीन इतिहास पहुंचाने का प्रयत्न किया । इसके लिए श्री. आप्पा ने अथक परिश्रम किया । उनके इन अथक प्रयत्नों से अगली पीढी के लिए अनमोल धरोहर प्राप्त हुई है । श्री. आप्पा के इस निरपेक्ष कार्य एवं राष्ट्रप्रेम से लाखों युवकों में राष्ट्रकार्य करने की प्रेरणा निर्माण हुई है, ऐसा निश्चितरूप से कहा जा सकता है ।
४. हिन्दुत्व का अभिमान तथा स्वराज्य का स्वाभिमान निर्माण करनेवाला इतिहास बताने की शैली !
‘गढ की दहलीज लांघ कर अंदर प्रवेश करने से पहले एक बात ध्यान में रखें । हिन्दवी स्वराज्य संस्थापक एवं स्वतंत्रता का मंत्र बतानेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज; शत्रु के मन में भय उत्पन्न कर, स्वधर्म के लिए कैसे मरना है, यह बतानेवाले छत्रपति संभाजी महाराज; चारों ओर से शत्रु द्वारा घिर जाने पर भी कैसे लडना चाहिए, यह बतानेवाले छत्रपति राजाराम महाराज, अपने प्रधानमंत्री को(बाजीराव पेशवा (प्रथम को) ) सीमा के पार झंडा फहराने के लिए भेजनेवाले छत्रपति शाहू महाराज तथा इन चारों छत्रपतियों को संस्कार देनेवाली राजमाता जीजाबाई का पदस्पर्श इस दहलीज को हुआ है । उनके पदस्पर्श से यह भूमि पावन हो गई है । उनके आदर्शाें की कम से कम एक किरण अपने चरित्र में समाहित करें एवं तत्पश्चात ही इस दहलीज के अंदर अपना कदम रख गढ के भीतर प्रवेश करें’, इन शब्दों में श्री. आप्पा किले रायगढ के महाद्वार का वर्णन करते हैं । ‘हिन्दुत्व का अभिमान एवं स्वराज्य का स्वाभिमान निर्माण करनेवाला यह इतिहास ऐसे ही ओठों पर नहीं आता, अपितु अंत:करण में अंकित होने पर ही आता है ।’ ऐसे श्री. आप्पा का अंत:करण ही तेजस्वी इतिहास का संग्रहालय है ।
५. भावी पीढीतक शिवप्रताप पहुंचाने का महान कार्य !
अनेक शिवप्रेमी, दुर्ग संवर्धक संस्था गढ-भ्रमण के लिए श्री. आप्पा से संपर्क कर गढ-दुर्गाें का इतिहास जानने के लिए मार्गदर्शक के रूप में उन्हें आमंत्रित करते हैं । तब श्री. आप्पा उनके साथ बडे उत्साह से जाते हैं । गढ की सीढियों से ही पूरा इतिहास बताना आरंभ कर देते हैं । एक अंत:करण से अन्यों के अंत:करण में जानेवाला यह इतिहास, महाराष्ट्र तथा भारत की भावी पीढी का भविष्य ही था । ‘इतिहास का आकलन केवल पुस्तकें पढने से नहीं होता, अपितु उसके लिए स्वयं उस स्थान पर जाकर वहां की भौगोलिक रचना देखनी होती है’, यह श्री. आप्पा का घोषवाक्य है । वे अथक एवं अखंड उत्साह से युवाओं को शिवप्रताप बताते हैं तथा युवा पीढी उतनी ही तन्मयता से यह इतिहास सुनती है ।
श्री. आप्पा की ग्रंथसंपदा

श्री. आप्पा ने वर्ष २००४ में अपनी पहली पुस्तक, ‘छत्रपति शिवाजी के आरमारी सुभेदार मायाजी नाईक भाटकर’, लिखी । तदुपरांत ‘शिवजन्म’, ‘किल्ले पन्हाळा औरंगहणाख्यान’, ‘किल्ले रायगड प्रदक्षिणेच्या वाटेवर’, ‘शिवरायांच्या अष्टराज्ञी’, ‘किल्ले राजगड प्रदक्षिणेच्या वाटेवर’, ‘श्री भवानी तलवार’, ‘किल्ले राजगड बखर’, ‘घोडखिंडीची साक्ष’ आदि ३४ पुस्तकें श्री. आप्पाजी ने लिखी हैं । अब भी ६ पुस्तकों का प्रकाशन शेष है । ये सभी पुस्तकें श्री. आप्पा ने गढ-दुर्गाें का भ्रमण कर, ऐतिहासिक कागदपत्रों का संदर्भ एवं उनका गहन अध्ययन कर लिखी हैं । उनकी इन पुस्तकों के माध्यम से पूरे देश के लाखों युवकों तक छत्रपति शिवाजी महाराजजी के पराक्रम का इतिहास पहुंचा है ।
६. शिवकार्य प्रसार में परिवारवालों का अनमोल सहयोग !

जब किसी महान पुरुष की महानता का वर्णन किया जाता है, तब उसके पीछे निश्चितरूप से उसके परिवारवालों का विशेष त्याग होता है । शिवकार्य का प्रसार श्री. आप्पा का व्यवसाय नहीं था, अपितु कर्तव्य भावना एवं आत्मीयता से किया गया कार्य है । इसके लिए श्री. आप्पा अनेक बार गढ-दुर्गाें पर अनेक दिनों के लिए जाते थे । इससे कोई भी अर्थार्जन न होने से परिवारवालों को आर्थिक अडचनें आती थीं; परंतु श्री. आप्पा की पत्नी अथवा बच्चों ने कभी कोई शिकायत नहीं की । श्री. आप्पा का शिवकार्य प्रसार के कार्य में एक प्रकार का अमूल्य योगदान ही है ।
७. अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

‘गिरीमित्र’ सम्मेलन में ‘जीवनगौरव’ पुरस्कार, ‘वैद्य पाटणकर काढा जीवनगौरव’ पुरस्कार, ‘मुंबई कॉईंस कलेक्टर जीवनगौरव’ पुरस्कार, ‘चतुरंग जीवनगौरव’ पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों से श्री. आप्पा को सम्मानित किया गया है । महाराष्ट्र की अनेक संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा कार्यकर्ताओं के साथ श्री. आप्पा ने एक पैसा भी मानधन लिए बिना गढ-दुर्गाें का भ्रमण कर सबको उनकी जानकारी दी है ।
परिवार व्यवस्था, धर्मसंस्था एवं शिक्षाप्रणाली को साम्यवाद से संकट !
अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास का महत्त्व !
Savarkar Sadan : डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के लंदन स्थित घर के समान महाराष्ट्र के ‘सावरकर सदन’ को खरीद कर उसका संवर्धन किया जाए !
गढ -किलों पर से अतिक्रमण हटाने के लिए जनवरी मास में निकाले गए परिपत्रक पर ५ मास के उपरांत भी कोई कार्रवाई नहीं !
छत्रपती के मंदिर के लिए प्राप्त होनेवाला अनुदान क्रूरकर्मा औरंगजेब की कब्र की देखभाल के लिए दिए जा रहे अनुदान की तुलना में अत्यल्प !
संतों के जन्मदिन पर ही भारत तथा बंगाल स्वतंत्र होने का एक दैवी संकेत ।