इस्लामी (जिहादी) मानसिकता को कुचलना ही है उपाय !

मुसलमानों की जिहादी मानसिकता कुरआन से ही तैयार हुई है । जो अल्लाह को नहीं मानते तथा जो मूर्तिपूजक है, उसे मार देने की सीख दी जाती है । मुसलमान समाज गैरमुसलमानों को केवल २ ही विकल्प देता है । एक तो इस्लाम पंथ का स्वीकार करना, अन्यथा मृत्यु स्वीकार करना ! जम्मू- कश्मीर के पहलगाम में हुआ नरसंहार इसका ताजा उदाहरण है ।

श्री. दुर्गेश परुळकर

१. पहलगाम का आक्रमण जिहादी आक्रमण ही था !

देश की स्थिति अब एक अलग मोड पर आ पहुंची है, यह उसका संकेत है । यह जिहाद बंगाल से आरंभ हुआ, ऐसा कहा जा सकता है; परंतु ‘इस जिहाद का कारण बना है वक्फ संशोधन विधेयक’, यह संदेह अब पक्का होता जा रहा है । फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे देशों की ओर देखा जाए, तो पूरे विश्व में ही जिहादी प्रवृत्तियां अपना सिर उठा रही है । ‘हमारे देश में होनेवाली सभी घटनाओं को ध्यान में लेते हुए, यह जिहादी आक्रमण ही है’, यही निष्कर्ष निकलता है । इसलिए अब यह चिंता का विषय बन गया है ।

२. महाभीषण संकट से देश से बाहर निकालने के लिए इस्लामी मनोवृत्ति को कुचलना आवश्यक !

देश के विभाजन के समय दिए गए ‘हंसकर लिया पाकिस्तान, लडकर लेंगे हिन्दुस्थान’ जैसे नारों की अनदेखी नहीं की जा सकती । ‘हिन्दुस्थान को इस्लामी राष्ट्र बनाने की दिशा में बढाया हुआ यह कदम है’, यह निष्कर्ष निकालकर समय रहते ही इस इस्लामी मनोवृत्ति को कुचल देना आवश्यक है, अन्यथा हिन्दू धर्म, संस्कृति, संप्रभुता आदि का अस्तित्व नहीं बचेगा । यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है । समय रहते ही इसकी ओर तुरंत ध्यान देकर हमें कठोर कार्यवाही करनी चाहिए, तभी इस महाभीषण संकट से हम बाहर निकल पाएंगे ।

३. जिहादी मानसिकता का यही है रामबाण उपाय !

इस्लामी आक्रांताओं ने हमारे देश पर निरंतर ऐसे ही आक्रमण कर रक्तपात कराया है । ‘इस्लाम के अनुयायियों द्वारा होनेवाला प्रत्येक आक्रमण एवं प्रत्येक कृति जिहादी है’, यह हमारा सहस्रों वर्षाें का अनुभव है । ‘देश के सभी मुसलमानों की वैसी मानसिकता है’, इस विचार को भले ही हमने स्वीकार कर लिया, तब भी जिनकी मानसिकता जिहादी मानसिकता है, उनसे हमारी रक्षा होने हेतु हमें कठोर कार्यवाही करनी ही पडेगी । देश के कुछ मुसलमान जिहादी मानसिकता के नहीं हैं; इसलिए क्या हम जिहादी मानसिकता रखनेवाले मुसलमानों के हाथों मृत्यु स्वीकार करें ?, यह वास्तविक प्रश्न है । समय रहते ही कठोर कदम उठाए गए, तो भविष्य में इससे कठिन प्रसंग निर्माण नहीं होंगे तथा हम अपने अस्तित्व को टिकाए रख पाएंगे । यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है; इसलिए उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती । अतः हमारा अस्तित्व बनाए रखने हेतु इस्लामी (जिहादी) मानसिकता को पूरी तरह कुचल देना ही एकमात्र रामबाण उपाय है । इसका अन्य कोई उपाय नहीं है ।

– श्री. दुर्गेश  जयवंत परुळकर, हिन्दुत्वनिष्ठ व्याख्याता, डोंबिवली, मुंबई (२२.४.२०२५)