‘संविधान समता दिंडी’के नाम पर पंढरपुर की वारी में घुसे सचिन माळी एवं शीतल साठे शहरी नस्कली ही हैं !

  • ये दोनों गृह विभाग द्वारा नक्सली संगठन घोषित किए गए ‘कबीर कला मंच’ के कार्यकर्ता भी !

  • तथाकाथिक विद्रोही विचारों के माध्यम से शहरी नक्सलियों का एजेंडा चलाने का प्रयास !

शीतल साठे तथा सचिन माळी

मुंबई, ६ जुलाई (संवाददाता) – ‘एक दिन तो बारी का अनुभव करें’, यह आवाहन करते हुए वर्ष २०२२ में ‘संविधान समता दिंडी’में सहभागी सचिन माळी तथा शीतल साठे यह पति-पत्नी गढचिरोली में चलनेवाली नक्सली गतिविधियों में सक्रियता से संलिप्त थे । उनकी नक्सली गतिविधों के ठोस प्रमाण उपलब्ध होने पर वर्ष २०१३ में ‘अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (युएपीए) के अंतर्गत इन दोनों को बंदी भी बनाया गया था । ये दोनों पति-पत्नी महाराष्ट्र राज्य के गृहविभाग द्वारा ‘नक्सली संगठन’ के रूप में घोषित ‘कबीर कला मंच’ के कार्यकर्ता हैं । ये दोनों भी नास्तिक हैं । इन दोनों का एक ओर नक्सली गतिविधियां चलाना तथा दूसरी ओर बारी में ‘संविधान समता दिंडी’में सहभागी होना संदेहास्पद है । इस वर्ष भी अंनिस के पदाधिकारी अविनाश पाटिल के नेतृत्व में ईश्वर को न माननेवाले अंनिस के कुछ कार्यकर्ता पंढरपुर की बारी में सहभागी थे ।


सचिन माळी एवं शीतल साठे ये दोनों विगत अनेक वर्षाें से विद्रोह गीत तथा लोकसंगीत के माध्यम से समाज में विद्रोह फैलाने का काम कर रहे हैं । ‘हमने पूजाघर हटाए’, ‘३३ करोड देवताओं का जत्था; परंतु एक का भी नहीं लग रहा पता’, ऐसे कुछ उनके गीत आज भी जालस्थल पर उपलब्ध हैं । एक ओर ‘ईश्वर को हटा दीजिए’, ऐसा खुलेआम आवाहन करनेवाले ये लोग अपने विद्रोही विचारों के द्वारा अपना शहरी नक्सलवाद का एजेंडा चलाने के लिए ही पंढरपुर की बारी में घुस गए हैं । उसके लिए वे अपनी सुविधा के अनुसार संविधान को आगे कर रहे हैं । पुलिस को इन संभावनाओं की गहन जांच करना आवश्यक है, ऐसा राष्ट्रप्रेमियों का कहना है ।

नक्सली गतिविधियों में सक्रिय सहभाग !

नवंबर २०११ एवं अप्रैल २०१२ की अवधि में महाराष्ट्र के गढचिरोली के जंगल में ये दोनों वहां के नक्सलियों के साथ काम कर रहे थे, इसके प्रमाण उपलब्ध होने की बात गढचिरोली के तत्कालिन पुलिस उपमहानिरीक्षक रवींद्र कदम ने माध्यमों को दी है । वर्ष २०१३ में शीतल साठे एवं सचिन माळी इन दोनों ने विधानभवन जाकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था । उस समय शीतल साठे गर्भवती थी; इसके कारण उसे कोई कष्ट न हो; इसके लिए ये दोनों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था, ऐसा बताया जा रहा है । उन्हें बंदी बनाए जाने पर शीतल साठे के साथ मारपीट न हो; इसके लिए फ्रांस, कैनडा, ब्रिटेन, थाइलैंड, पोर्तुगाल एवं जर्मनी इन देशों से ५० से अधिक पत्र मुंबई के कारागृह को तथा भायखळा के महिला कारागृह में भेजे गए थे, ऐसी जानकारी उस समय पुलिस की ओर से दी गई थी । कुल मिलाकर यह पूरी घटना संदेहजनक है ।

नास्तिक अंनिसवाले पंढरपुर की बारी में किसलिए ?

सचिन माळी जैसे ‘कबीर कला मंच’में सहभागी था, उसी प्रकार वह अंनिस में भी सक्रिय था । ‘हमने पूजाघर हटा दिए’, इस यू ट्यूब पर प्रसारित वीडियों में उसने स्वयं यह बताया है कि ‘मैं वर्ष २००१ में जब इस आंदोलन में आया, उस समय मैं अंनिस का काम कर रहा था ।’ इस वीडियो में उसने अंनिस के संस्थापक डॉ. दाभोलकर के कार्य का समर्थन करने का आवाहन भी किया है । वर्ष २०११ में महाराष्ट्र गुप्तवार्ता विभाग के उपायुक्त ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों तथा आयुक्तों को नक्सली गतिविधियों के साथ सीधा संबंध रखनेवाले ७, जबकि नक्सलवाद से संबंध रखनेवाले ५५ ऐसे कुल ६२ संगठनों के नाम भेजे थे । इसमें नक्सलवाद से संबंध रखनेवाले संगठनों में ५० वें स्थान पर महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (अंनिस) का नाम है । अंनिस के गोंदिया जिले के कार्याध्यक्ष नरेश बनसोड को ८ मई २००७ को पुलिस ने अरुण फेरीरा एवं धमेंद्र भुरले इन नक्सलियों के साथ बंदी बनाया था । ये सभी घटनाएं अंनिस के कार्य के विषय में संदेह व्यक्त करनेवाली हैं ।

संपादकीय भूमिका

इन शहरी नक्सलियों का पंढरपुर की वारी में क्या काम ? वारी में सहभागी होकर समाज को तोडने का अथवा वारी में किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने का उनका उद्देश्य क्यों नहीं हो सकता ? महाराष्ट्र की पुलिस इन पर क्या कार्रवाई करनेवाली है ?

सत्ता में होते समय ‘नक्सली’ घोषित करनेवाले संगठनों को अब कांग्रेसप्रणित महाविकास अघाडी से मिल रहा है समर्थन !

पंढरपुर की बारी में घुसे शहरी नक्सलियों का प्रकरण

मुंबई, ६ जुलाई (संवाददाता) : कांग्रेस गठबंधन सरकार के कार्यकाल में अर्थात वर्ष २०११ में ही महाराष्ट्र के तत्कालिन गृहमंत्री रा.रा. पाटिल ने केंद्र सरकार को कबीर कला मंच‘नक्सली संगठन’, जबकि महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ‘नक्सलियों से संबंध रखनेवाला संगठन’ होने का ब्योरा भेजा था । पंढरपुर की वारी के ‘संविधान समता दिंडी’ में अब इसी संगठन के कार्यकर्ता सहभागी हैं । इन संगठनों के नक्सली संगठनों के साथ के संबंधों को ध्यान में लेते हुए कुछ वारकरियों ने (श्री विठ्ठलभक्तों ने) सरकार से इन शहरी नक्सलियों की जांच करने की मांग की है । कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब कांग्रेस ने ही पहले इन संगठनों को नक्सली ठहराया था; परंतु अब जब वारकरी इन संगठनों की जांच की मांग कर रहे हैं, तब कांग्रेसप्रणित महाविकास अघाडी ने इन संगठनों का समर्थन किया है । २ जुलाई को कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस तथा शिवसेना उद्धव बाळासाहेब ठाकरे इन राजनीतिक दलों के विधायकों ने विधासभा की सीढियों पर इन संगठनों के समर्थन में आंदोलन किया ।

कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जब रा.रा. पाटिल गृहमंत्री थे, तब उन्होंने महाराष्ट्र के ऐसे ७२ संगठनों के नाम केंद्रीय गृहमंत्री को भेजे थे तथा इन संगठनों के नाम लोकसभा में भी प्रस्तुत किए गए हैं । राज्य के गुप्तवार्ता विभान ने भी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही इन संगठनों का नक्सलियों से संबंध होने का ब्योरा तत्कालिन गृहमंत्री रा.रा. पाटिल को सौंपा था । इसमें ७ संगठनों को सक्रिय नक्सली के रूप में चिन्हित किया गया था । ‘कबीर कला मंच’ उनमें से ही एक संगठन है तथा पंढरपुर की वारी में इसी संगठन के कार्यकर्ता सहभागी हुए हैं ।

संपादकीय भूमिका

तो क्या इससे ‘कांग्रेसप्रणित महाविकास अघाडी को नक्सलवाद स्वीकार है’, ऐसा माना जाना चाहिए ?