ईश्वरस्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी साधक को ध्यान में आई कुछ विशेषताएं तथा प्रतीत हुई अवतारत्व से संबंधित उनकी लीलाएं !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने सनातन के ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों से प्रश्न पूछा था कि ‘मेरी कौनसी गुण-विशेषताओं के कारण मुझे ‘अवतार’ कहते हैं ?’’ इस विषय में ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों को प्राप्त ज्ञान गुरुदेवजी की महिमा स्पष्ट करनेवाला है; परंतु उसी समय ऐसा भी प्रतीत हुआ कि गुरुदेवजी द्वारा लिखित ‘परमेश्वर एवं ईश्वर’ इस सनातन के ग्रंथ में ‘गुरु एवं ईश्वर एक ही होते हैं । ईश्वर के सगुण रूप हैं गुरु तथा गुरु का निर्गुण रूप हैं ईश्वर !’, ऐसा लिखा गया है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के अद्वितीय कार्य के कारण उन्हें ‘मोक्षगुरु’, ‘ज्ञानगुरु’, ‘राष्ट्रगुरु’, ‘जगद्गुरु’ आदि विशेषण भी लागू हैं । इसका अर्थ वे स्वयं ईश्वरस्वरूप हैं, तो उन्हें अवतारत्व की सभी गुण-विशेषताएं लागू होंगी ही ! इस पर थोडा अध्ययन करने पर मुझे उनकी कुछ विशेषताएं ध्यान में आईं, साथ ही उनके द्वारा की जा रही गुरुलीला का धुंधलासा अनुमान लगाना संभव हुआ । उन सूत्रों को मैं श्री गुरुचरणों में समर्पित कर रहा हूं ।

१. परमेश्वर, ईश्वर, अवतार एवं देव, इन संज्ञाओं का अर्थ !

(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘परमेश्वर एवं ईश्वर’)

२. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (गुरुदेवजी) के ईश्वरत्व के विषय में विश्लेषण !

श्री. सागर निंबाळकर

‘ऊपर दी गई सारणी में समाहित ईश्वर के लक्षण तथा गुरुदेवजी की विशेषताएं निम्न प्रकार से हैं’, ऐसा ध्यान में आया ।

२ अ.  निर्गुण तत्त्व : वर्ष २००७ से गुरुदेवजी रामनाथी, गोवा में स्थित सनातन के आश्रम से बाहर नहीं गए हैं । देश-विदेशों के अनेक साधकों ने उन्हें प्रत्यक्ष देखा भी नहीं है; परंतु तब भी ऐसे सहस्रों साधकों को गुरुदेवजी से संबंधित अनुभूतियां होती हैं । उन्हें घर बैठे गुरुदेवजी के निर्गुणत्व की अनुभूति होती है ।

२ आ.  प्रकट एवं कार्यरत शक्ति : गुरुदेवजी आश्रम से बाहर नहीं जाते, तब भी सनातन का कार्य अपनेआप ही बढ रहा है । उनके मात्र संकल्प के कारण सैकडों साधक गुरुदेवजी की शक्ति के कार्यरत होने की अनुभूतियां (उदा. धर्मकार्य में उत्पन्न बाधाएं दूर होना, धर्मप्रसार का अवसर अपनेआप मिलना आदि) कर रहे हैं ।

२ इ.  आनंद की अनुभूति : गुरुदेवजी के दर्शन से आनंद एवं शांति की अनुभूति होती है । उन्हें देखनेवाला स्वयं को भूल जाता है । उसके साथ ही उनके वास्तव्य से पावन बने सनातन के रामनाथी, गोवा के आश्रम में आते ही अनेक जिज्ञासुओं, हिन्दुत्वनिष्ठों, उद्योगपतियों आदि को आनंद एवं शांति की अनुभूति भी होती है । सर्वसामान्य व्यक्ति को भी आश्रम की यही विशेषता भाती है । अतः पुनः एक बार गुरुदेवजी का ईश्वरत्व प्रमाणित होता है ।

३. ‘गुरुदेव ही ईश्वर हैं’, इसके स्थूल से ध्यान में आनेवाले कुछ कारण

अ. वर्ष १९९६ में गुरुदेवजी ने ही सर्वप्रथम ‘ईश्वरीय राज्य की स्थापना’ का संकल्प लिया । उस समय उन्होंने त्रेतायुग के अनुसार ‘रामराज्य’ अथवा द्वापरयुग के अनुसार ‘धर्मराज्य’, ऐसा उल्लेख नहीं किया था ।

आ.  वर्ष १९९९ से सनातन के ग्रंथों से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की निम्न पंक्तियां प्रकाशित की जा रही हैं ।

‘स्थूल देह को है स्थल-काल की मर्यादा ।

कैसे रहूं सदा सभी के साथ ।।

सनातन धर्म मेरा नित्य रूप ।

इस रूप में सर्वत्र में हूं सदा ।।’  

इसमें उन्होंने ‘सनातन धर्म मेरा नित्य रूप ।’, ऐसा कहा है । ‘धर्म’ शब्द का अर्थ है ‘ईश्वर’; इसलिए प.पू. गुरुदेवजी ईश्वर ही हैं ।

इ.  वर्ष २००४ में एक साधक ने गुरुदेवजी से उनका जन्मदिवस मनाने के विषय में पूछा । उस समय वे कहने लगे, ‘‘मैं तो अनादि-अनंत हूं । मेरा जन्म-मृत्यु नहीं है, तो मैं मेरा जन्मदिवस कैसे मनाऊं ?’’

ई.  गुरुदेवजी द्वारा बताई ‘गुरुकृपायोग के अनुसार साधना’ कर १०.४.२०२५ तक १३१ साधक संत बने; इसका अर्थ वे ‘गुरु’ पद पर विराजमान हुए हैं । आज तक किसी भी अवतार ने इतनी बडी संख्या में गुरुपद के अधिकारी शिष्य तैयार नहीं किए हैं अथवा उद्धार नहीं किया है ।

४. स्वयं ईश्वरस्वरूप होते हए भी गुरुदेवजी द्वारा स्वयं के अवतारत्व के सूत्र पूछे जाने के संभावित कारण   

अ.  समाज को ईश्वर के निर्गुण एवं निराकार रूप की अपेक्षा ईश्वर का अवतारी एवं साकार रूप अधिक भाता है । ईश्वर की तुलना अवतारीरूप की महिमा ध्यान में आना सुलभ होता है ।

आ.  अवतारीरूप के कार्य का परिणाम स्थूल से दिखाई देता है, साथ ही उसका कार्यकारणभाव ध्यान में आना भी सुलभ होता है । उसके कारण सर्वसामान्य लोगों में उनके प्रति शीघ्र श्रद्धा उत्पन्न होती है ।

इ.  ‘गुरुकृपायोग के अनुसार साधना’ के अंतर्गत ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां तथा उतने साधनामार्ग’, इस सिद्धांत के अनुसार जाे भक्तिमार्ग से चलनेवाले साधक अथवा नए जिज्ञासु हैं, उनकी श्रद्धा इस शीर्षक के कारण बढने में सहायता मिलती है ।

संत ज्ञानदेव महाराजजी ने वर्णन करते हुए कहा है, ‘जो जें वांछील तो तें लाहो । प्राणिजात ।।’ – ज्ञानेश्वरी, अध्याय १८, ओवी (श्लोक) १७९६ अर्थात ‘जो-जो प्राणि जो-जो इच्छा व्यक्त करेगा, उसकी वह इच्छा पूर्ण हो ।’ प.पू. गुरुदेवजी ने सनातन संस्था में ऐसा वातावरण बनाया है, जिसके कारण जिसे जिस पद्धति से साधना करनी है, उसे उस प्रकार की साधना करना संभव हो; इसके लिए तत्पर गुरुदेवजी ने ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधकों से ‘मेरी कौनसी गुण-विशेषताओं के कारण मुझे अवतार कहा जाता है ?’, यह प्रश्न पूछा था ।

गुरुदेवजी, आपकी लीलाएं समझ में आना, हम अज्ञानी बालकों के कल्पनाविश्व से परे है । ऐसा होते हुए भी मन में आए इन विचारों को मैं आपके चरणों में समर्पित कर रहा हूं, इसलिए मैं आपसे क्षमा मांगता हूं ।‘हम सभी पर आपकी कृपादृष्टि सदैव बनी रहे’, यह आपके चरणों में प्रार्थना !

– श्री. सागर निंबाळकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२.६.२०२४)

सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।